‘मैं वापस आऊंगा’, लेकिन इस तरह नहीं!

नफ़रत के इस ‘धुरंधर’ दौर में ‘मैं वापस आऊंगा’ का प्रेम उमस भरी प्रचंड गर्मी में एक ठंडी फुहार सी है। 95 साल की उम्र में इशर सिंह ग्रेवाल उर्फ कीनू (नसीरुद्दीन शाह) का मरने से इंकार करना, क्योंकि उसे विभाजन से पहले अपने प्यार ‘जिया’ से किया गया वादा कि ‘मैं वापस आऊंगा’ निभाना है।

डिमेंशिया की बीमारी में उसका वर्तमान ‘इरेज’ हो चुका है। दिमागी तौर पर वह विभाजन और विभाजन के पहले दौर में हैं। 

मुझे आबिद सुरती का उपन्यास ‘कथावाचक’ ध्यान आता है। बाबरी मस्जिद बचाने के प्रयास में घायल पुजारी कोमा से वापस आने से इंकार कर देता है। उसे आश्वासन चाहिए कि बाहर ‘विभाजन’ खत्म हो चुका है। लेकिन यह आश्वासन उसे कौन दे।

लेकिन इस फिल्म में इशर सिंह ग्रेवाल का पोता (दलजीत दोसांझ) अपने दादा का जिया से किया वादा पूरा करता है और फिल्म के अंत में इशर सिंह चैन से अंतिम साँस लेता है। 

इम्तियाज अली की यह फिल्म विभाजन को पृष्ठभूमि के रूप में इस्तेमाल करते हुए एक खूबसूरत प्रेमकथा को पर्दे पर उतारती है। और आज के प्रेम (पोते निर्वैर और उसकी गर्ल फ्रेंड (Banita Sandhu) से उसकी तुलना करते हुए उसे एक आध्यात्मिक ऊंचाई देने का प्रयास करती है। हालांकि यह भी एक स्टीरियोटाइप ही है जो फिलहाल इम्तियाज अली का सिग्नेचर बन चुका है। 

लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब भी बॉलीवुड विभाजन की ओर देखता है तो प्रायः एक स्टीरियोटाइप का शिकार हो जाता है। ज्यादातर भौंडे रूप में और कभी कभी इस फिल्म की तरह बेहद सोफिस्टिकेटेड रूप से।

फिल्म में जो सिख मुस्लिमों को मार रहे हैं, उनके चेहरे ढके हुए हैं और जो मुस्लिम सिखों को मार रहे हैं, उन्हें आप पहचान सकते हैं। फिल्म में उनके नाम भी हैं। सिख महिलाओं के कपड़े फाड़ते, उन्हें बालों से, पैरों से बेरहमी से घसीटते, ‘अपवित्र’ करते हुए बहुत कम अंतराल के मगर ग्राफिक विजुअल्स हैं। लेकिन इसके बरक्स सिखों का मुस्लिम महिलाओं पर हमला गायब है। शायद इसीलिए प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक शुभ्रा गुप्ता ने इस फिल्म की समीक्षा करते हुए बेहद मासूमियत से लिख दिया कि मुस्लिमों के बर्बर हमले की प्रतिक्रिया में सिखों ने भी मुस्लिमों को मारा। आप यह कह सकते हैं कि यह कहानी की माँग थी, लेकिन कहानी कोई इंसान ही तो लिखता है!

क्या हम विभाजन जैसी घटना को क्रिया प्रतिक्रिया की नज़र से देख सकते हैं? या देखना चाहिए?

अफसोस कि इम्तियाज अली जैसे फिल्मकार भी इस नैरेटिव के शिकार हुए हैं। तर्क दिया जा सकता है कि फिल्म में ‘रेडक्लिफ’ के बहाने यह बताया गया है कि यह विभाजन साम्राज्यवादी साजिश थी। लेकिन शब्द से ज्यादा स्मृति में विजुअल्स ठहरते हैं। इसलिए आज के बेहद ध्रुवीकरण वाले माहौल में हमें अतिरिक्त सावधान रहना चाहिए।

लेकिन इसके बावजूद मैं इम्तियाज अली को सैल्यूट करना चाहूंगा कि उन्होंने फिल्म के अंत में “कमाल है” गाने के जरिए गाजा, रोहिंग्या और अन्य रिफ्यूजियों को याद किया। और यह उस समय है जब गाजा के समर्थन में कुछ बोलना अपने ऊपर देशद्रोह को आमंत्रित करना है। हां, यह अलग बात है यह हिस्सा फिल्म से सहज रूप से नहीं निकलता बल्कि फिल्म से अलग एक ‘म्यूजिक एलबम’ लगता है।

दरअसल बॉलीवुड ने अभी तक विभाजन पर फिल्म बनाते हुए प्रायः सिर्फ मध्यम या उच्च वर्ग के ज़ख़्मों को ही ध्यान में रखा है। इसलिए अधिकांश फिल्में विभाजन को प्रेम और एक तरह के suppressed ‘नास्टैल्जिया’ के लेंस से ही देखने की आदी रही हैं। 

इसके बरक्स अगर आप ऋत्विक घटक की फिल्में देखेंगे तो आपको विभाजन के दूसरे पहलू नजर आएंगे। जिस तरफ अभी तक बॉलीवुड की नज़र नहीं गई है।

भारत-पाक विभाजन इतना भीषण, बर्बर और व्यापक रहा है कि वह आज भी हमारे वर्तमान और भविष्य को गढ़ रहा है, इसलिए आप वर्तमान पर पर्दा डालकर विभाजन पर कोई भी सार्थक बात नहीं कर सकते। Benedetto Croce ने यूं ही नहीं कहा था कि सभी इतिहास समकालीन इतिहास हैं। 

2020 में दिल्ली दंगे में जलाकर मार डाली गई 88 साल की गरीब अकबरी की कहानी कौन कहेगा जो विभाजन की विभीषिका से तो किसी तरह बच गई थी, लेकिन आज के ‘नए विभाजन’ में जला कर मार डाली गई।

भारत पाक सीमा पर रहने वाली उस गरीब सारी की कहानी कौन कहेगा जिसका सिख बाप विभाजन के दौरान सारी की मां को किडनैप करके भारत लाया। उसके साथ बलात्कार किया। इसी बलात्कार से सारी पैदा हुई, लेकिन जब सारी महज एक साल की थी तो किडनैप हुई महिलाओं को खोजकर उनके वतन भेजने की एक योजना के तहत सारी की मां को पाकिस्तान भेज दिया गया। 

और आज भारत पाक सीमा पर स्थित सारी की झोपड़ी भी ‘सुरक्षा’ के नाम पर गिरा दी गई। 78 साल बाद वह फिर बेघरबार हो गई। 

सच तो यह है कि 47 के इस विभाजन में जो गरीब, दलित (विशेषकर ‘नामशूद्र’) बुरी तरह पीसे गए थे, उनकी कहानी तो अभी आनी बाकी है। 

उन्हें उनका ‘इम्तियाज अली’ कब मिलेगा? उनकी कहानी पर्दे पर वापस कब आएगी?

(मनीष आजाद लेखक और एक्टिविस्ट हैं।)

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