लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता बदलती रहती है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाएँ स्थायी होती हैं। इसलिए सत्ता पक्ष और विपक्ष के आचरण का मूल्यांकन राजनीतिक सुविधा से नहीं, एक समान लोकतांत्रिक कसौटी पर होना चाहिए। संसद इस कसौटी की सबसे महत्वपूर्ण जगह है। भाजपा की जिस संसदीय और राजनीतिक संस्कृति का कांग्रेस विरोध करती रही है, अगर वही संस्कृति उसकी भाषा, व्यवहार और राजनीतिक तौर-तरीकों में भी दिखाई देने लगे, तो फिर वह भाजपा का विकल्प नहीं, उसका दूसरा संस्करण भर रह जाएगी।
आजकल कॉंग्रेस उसी राह पर है।
संसद भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च विधायी मंच है। यहाँ चुने हुए प्रतिनिधि केवल सरकार का समर्थन या विरोध करने के लिए नहीं आते, बल्कि उनकी ज़िम्मेदारी जनता के सवालों पर विचार करने की भी होती है। सरकार से जवाब माँगना, नीतियों पर सवाल उठाना, उसके फैसलों की आलोचना करना और ज़रूरत पड़ने पर उसके खिलाफ तीखा राजनीतिक प्रतिरोध दर्ज कराना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है।
लेकिन इस अधिकार के साथ एक दूसरी ज़िम्मेदारी भी जुड़ी है। वह है, संसद की गरिमा, मर्यादा और परंपरा को बनाए रखने की। इस मामले में सत्ता पक्ष बीते एक दशक से अधिक समय से नाकाम रहा ही है, अब विपक्ष भी उसी दिशा में आगे बढ़ता दिख रहा है। यह संसद के भीतर राजनीति के निरंतर गिरते स्तर की ओर इशारा करता है।
हाल ही में कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों द्वारा संसद परिसर में बंदर का खिलौना लेकर प्रदर्शन और ’56 इंच का छोटा बंदर, जल्दी आओ सदन के अंदर’ जैसे नारे इसी सवाल को हमारे सामने लाते हैं। किसी राजनीतिक नेता की नीतियों, दावों और राजनीतिक छवि पर व्यंग्य लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा हो सकता है।
लेकिन जब किसी प्रधानमंत्री को पशु-प्रतीक के माध्यम से व्यक्तिगत उपहास का लक्ष्य बनाया जाता है और वह भी संसद जैसे संस्थागत परिसर में, तब सवाल केवल विरोध के अधिकार का नहीं रह जाता। सवाल यह भी पैदा होता है कि राजनीतिक विरोध की भाषा कहाँ तक लोकतांत्रिक व्यंग्य है और कहाँ से वह संसदीय राजनीतिक मर्यादा को कमजोर कर स्वयं को भी उपहास के केंद्र में ले आती है।
विपक्ष का दायित्व केवल सत्ता की गलतियाँ गिनाना नहीं है। उसे यह भी दिखाना होता है कि सत्ता में आने पर वह राजनीतिक संस्कृति को किस दिशा में ले जाएगा। कॉंग्रेस का राजनीतिक इतिहास इस मामले में समृद्ध रहा है।
संसद में असहमति कोई नई बात नहीं है। भारतीय संसदीय लोकतंत्र के शुरुआती सालों में भी सत्ता और विपक्ष के बीच तीखे मतभेद होते थे। 1959 में लोकसभा में सदस्यों के आचरण और सदन में अव्यवस्था पर चर्चा के दौरान प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने शोर-शराबे और दूसरे सदस्यों को अपनी बात रखने से रोकने वाले व्यवहार को सदन की प्रक्रिया और गरिमा के विरुद्ध बताया था।
उस समय राजनीति कम संघर्षपूर्ण नहीं थी, लेकिन संसद को राजनीतिक तमाशे में बदल देने का विचार लोकतांत्रिक व्यवहार अथवा परंपरा का हिस्सा नहीं बना था।
थोड़ा और पहले जाएँ तो एच.जी. मुद्गल का मामला याद आता है। 1951 में उन पर संसद की समिति ने सदन की गरिमा को प्रभावित करने वाले आचरण का दोषी पाया और उनके विरुद्ध कार्रवाई की सिफारिश की। प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें लोकसभा से निष्कासित करने का प्रस्ताव रखा। लेकिन प्रस्ताव पर निर्णय होने से पहले ही मुद्गल ने इस्तीफा दे दिया।
इसके बाद सदन ने उनके निष्कासन का प्रस्ताव पारित किया और उनके इस्तीफे को सदन की अवमानना माना। इस प्रकरण ने शुरुआती दौर में ही संसद के समक्ष यह सवाल रख दिया था कि निर्वाचित प्रतिनिधि की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संसद की गरिमा के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए।
1992 में भी संसदीय अनुशासन और मर्यादा को लेकर गंभीर चिंता सामने आई, जब सितंबर में नई दिल्ली में पीठासीन अधिकारियों, दलों के नेताओं, संसदीय कार्यमंत्रियों, व्हिपों और संसद तथा राज्य विधानसभाओं के वरिष्ठ अधिकारियों का अखिल भारतीय सम्मेलन हुआ। विषय था, ‘डिसिप्लिन एंड डेकोरम इन द पार्लियामेंट एंड द स्टेट लेजिस्लेचर्स’।
इसका उद्घाटन करते हुए तत्कालीन उपराष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने संसदीय अव्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। यानी, संसद में अनुशासन और मर्यादा का संकट या सवाल नया नहीं है।
इसी दिशा में संसदीय संस्थाओं ने आगे भी कदम उठाए। 1997 में राज्यसभा और 2000 में लोकसभा में एथिक्स कमेटी का गठन हुआ। इन समितियों का उद्देश्य सदस्यों के नैतिक आचरण और कदाचार से जुड़े मामलों पर नजर रखना था। यानी संसद ने बहुत पहले यह स्वीकार कर लिया था कि सांसदों का आचरण केवल उनका निजी मामला नहीं, बल्कि संसद की गरिमा और मर्यादा से जुड़ा सवाल है।
संसदीय शिष्टाचार और मर्यादा केवल किसी पर हमला करने या गालियाँ देने से ही भंग नहीं होती, बल्कि सदन के भीतर सदस्यों के व्यक्तिगत और सामूहिक गैर-संसदीय आचरण से भी होती है। लोकसभा की कार्यव्यवस्था और कार्यप्रणाली के नियमों में सदस्यों के आचरण को लेकर स्पष्ट प्रावधान हैं। नियम 349 के तहत सदन में नारे लगाने, बैज पहनने तथा झंडे या प्रतीक चिन्ह प्रदर्शित करने जैसे आचरण पर रोक है। इन प्रावधानों का उद्देश्य सदन की कार्यवाही को अनावश्यक प्रदर्शन और व्यवधान से बचाना है।
इसके बावजूद अलग-अलग समय में सत्ता और विपक्ष, दोनों के सदस्यों द्वारा ऐसे नियमों की अनदेखी के उदाहरण सामने आते रहे हैं।
ख़ासकर सत्ता पक्ष द्वारा बीते वर्षों में इस नियम की अनदेखी के कई उदाहरण सामने आए हैं। संसद के भीतर किसी धर्म विशेष या एक सदस्य को लक्ष्य बनाकर व्यक्तिगत नारेबाजी की ऐसी घटनाएँ भी संसदीय मर्यादा के सवाल को गंभीर बनाती हैं। सवाल यह नहीं है कि नारा किसने लगाया या प्रतीक किसने इस्तेमाल किया। सवाल यह है कि क्या संसद और उसके परिसर को राजनीतिक प्रदर्शन, व्यक्तिगत उपहास और नारेबाजी का मंच बनने दिया जाना चाहिए?
नियमों की कसौटी अक्सर राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलती हुई दिखाई देती है। हाल के सालों में संसद के भीतर नारेबाजी, प्रतीकात्मक प्रदर्शन और कार्यवाही बाधित करने की घटनाएँ बार-बार सामने आई हैं। सत्ता पक्ष ने विपक्ष के ऐसे व्यवहार की आलोचना की है, जबकि विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक प्रतिरोध बताया है। लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका को लेकर भी विपक्षी पार्टियों ने सवाल उठाए हैं।
दलों के इस दोहरे मापदंड और मौजूदा सरकार द्वारा संसदीय परंपराओं की निरंतर अनदेखी की ज़िद ने संसदीय मर्यादा के सवाल को और गम्भीर बना दिया है।
विपक्ष में रहते हुए लगभग हर बड़े राजनीतिक दल ने कभी न कभी सदन में व्यवधान को राजनीतिक हथियार बनाया है और सत्ता में आने के बाद उसी व्यवहार की आलोचना की है। 2008 का कैश-फॉर-वोट्स प्रकरण हो या 2जी और कोयला आवंटन जैसे विवादों के दौरान संसद की कार्यवाही का बाधित होना, संसदीय विरोध की इस संस्कृति का कोई एक राजनीतिक रंग नहीं है।
इसलिए आज विपक्ष के प्रदर्शन की आलोचना करते हुए भाजपा या किसी दूसरे दल के पुराने आचरण को भूल जाना भी उतना ही सुविधाजनक होगा जितना यह मान लेना कि विपक्ष का हर विरोध लोकतांत्रिक मर्यादा के भीतर ही है।
असली सवाल यहीं से पैदा होता है कि क्या संसद में विरोध का अधिकार इतना व्यापक है कि उसके नाम पर हर प्रकार का प्रतीक, नारा और प्रदर्शन स्वीकार्य हो जाए? यदि ऐसा है तो फिर संसदीय मर्यादा का अर्थ क्या रह जाता है? और यदि मर्यादा आवश्यक है तो उसका पैमाना सत्ता और विपक्ष के बदलने के साथ क्यों बदलना चाहिए?
प्रधानमंत्री की आलोचना पर कोई रोक नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या कोई और, उनकी नीतियों, निर्णयों, भाषणों, दावों और राजनीतिक विचारों की कठोरतम आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है। राजनीतिक व्यंग्य भी लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा हो सकता है। सत्ता में बैठा कोई भी व्यक्ति व्यंग्य से ऊपर नहीं होता। होना चाहिए भी नहीं। लेकिन व्यक्ति की राजनीतिक आलोचना और व्यक्ति को अपमानित करने के लिए पशु-प्रतीक का इस्तेमाल, इन दोनों को एक ही तराजू पर रखना भी उचित नहीं होगा।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद केवल राजनीतिक दलों का अखाड़ा नहीं है। वह उस जनता की संस्था है, जिसके प्रतिनिधि वहाँ बैठे हैं। संसद में किया गया प्रत्येक राजनीतिक प्रदर्शन केवल उस क्षण उपस्थित कैमरों और सोशल मीडिया के लिए नहीं होता। वह संसदीय राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा भी बनता है। आज जिस भाषा और प्रतीक को हम अपने राजनीतिक विरोधी के लिए उचित मानेंगे, कल वही भाषा हमारे अपने नेता के विरुद्ध भी इस्तेमाल होगी।
राजनीति में मर्यादा का कोई अर्थ तभी है जब वह सुविधानुसार बदलने वाली चीज न हो।
यहाँ राहुल गांधी और कांग्रेस के नेतृत्व की भूमिका पर भी सवाल उठना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर राहुल गांधी की राजनीतिक भाषा कई बार तीखी आलोचना से आगे निकलकर व्यक्तिगत कटाक्ष तक पहुँची है। इन घटनाओं ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि विपक्ष का सबसे बड़ा नेता अपनी भाषा की सीमा कहाँ तय करता है। सरकार की आलोचना जितनी तीखी होनी चाहिए, भाषा उतनी ही संयत भी हो सकती है।
राहुल गांधी और कांग्रेस के नेताओं को यह समझना होगा कि कार्यकर्ता अपने नेता से केवल राजनीतिक विचार नहीं, राजनीतिक आचरण भी सीखते हैं। यदि नेतृत्व स्वयं संवाद की भाषा को लगातार अधिक कटु, व्यक्तिगत और अपमानजनक बनाता जाएगा तो नीचे तक वही संस्कृति पहुँचेगी। तब कांग्रेस और उस राजनीतिक संस्कृति में क्या अंतर रह जाएगा, जिसकी आलोचना वह भाजपा के संदर्भ में करती रही है?
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा ने राजनीतिक भाषा को लगातार अधिक आक्रामक और व्यक्तिगत बनाने वाली संस्कृति को बढ़ावा दिया है। पार्टी ने बदज़बान नेताओं की एक पूरी जमात खड़ी कर दी है। कांग्रेस को उसकी नकल करने के बजाय उससे अलग राजनीतिक मानक प्रस्तुत करना चाहिए। विपक्ष का दायित्व केवल सत्ता की गलतियाँ गिनाना नहीं है। उसे यह भी दिखाना होता है कि सत्ता में आने पर वह राजनीतिक संस्कृति को किस दिशा में ले जाएगा।
अगर राहुल गांधी और कांग्रेस भाजपा की बदज़बान और व्यक्तिगत आक्रामकता वाली राजनीति का केवल एक दूसरा संस्करण बन जाते हैं, तो फिर राजनीतिक विकल्प का आधार ही कमजोर पड़ जाएगा। सवाल इसलिए बड़ा है कि क्या राहुल गांधी कांग्रेस को उसी राजनीतिक संस्कृति का एक और संस्करण बनाना चाहते हैं, जिसकी आलोचना वे स्वयं करते हैं?
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बंदर का खिलौना लेकर किया गया प्रदर्शन कांग्रेस ने किया या भाजपा करती तो क्या होता। सवाल यह होना चाहिए कि क्या हम ऐसी राजनीतिक संस्कृति चाहते हैं जिसमें संसद के भीतर तर्क और तथ्य की जगह प्रतीकात्मक अपमान, नारे और कैमरे के लिए तैयार किए गए दृश्य लेने लगें? संसद के बाहर राजनीतिक आंदोलन की अपनी भाषा और अपनी शैली हो सकती है। सड़क पर व्यंग्य, पोस्टर, नारे और प्रतीक लोकतांत्रिक प्रतिरोध के प्रभावी माध्यम हो सकते हैं।
लेकिन संसद में प्रवेश करते ही वही राजनीतिक संघर्ष संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है। वहाँ सरकार को घेरने का सबसे प्रभावी हथियार शोर नहीं बल्कि सवाल और तर्क है।
विपक्ष का काम सरकार को असहज करना है, लोकतंत्र को असहज करना नहीं। सत्ता पक्ष का काम बहुमत के बल पर विपक्ष की आवाज दबाना नहीं, बल्कि उसे सुनना और उसका जवाब देना है। दोनों पक्षों की जिम्मेदारी अलग हो सकती है, लेकिन संसद के प्रति उनकी जवाबदेही समान है।
भारतीय राजनीति में संसदीय मर्यादा का संकट इसलिए भी गंभीर है कि यह केवल सदन की कुछ मिनटों या कुछ घंटों की कार्यवाही का सवाल नहीं है। जब संसद बार-बार नारे, हंगामे और प्रदर्शन का मंच बनती है तो धीरे-धीरे जनता के मन में यह धारणा मजबूत होती है कि उसके प्रतिनिधि वह सब नहीं कर रहे जिनके लिए उन्हें चुना गया।
सरकार कठघरे में हो सकती है। प्रधानमंत्री से जवाब माँगा जा सकता है। नीतियों का विरोध किया जा सकता है। राजनीतिक व्यंग्य भी किया जा सकता है। लेकिन संसद स्वयं कठघरे में खड़ी न हो, यही लोकतांत्रिक राजनीति की पहली शर्त होनी चाहिए।
संसद को सत्ता और विपक्ष के बीच शोर की प्रतियोगिता नहीं, असहमति के बीच तर्क खोजने का मंच बने रहना होगा। लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं, अपनी संस्थाओं के आचरण से भी जीवित रहता है। अगर संसद तर्क, सवाल और जवाब की जगह लगातार शोर, नारे और राजनीतिक तमाशे का मंच बनती गई, तो देश में लोकतंत्र दिखाई तो देगा, लेकिन उसकी सबसे महत्वपूर्ण संस्था भीतर से खोखली होती जाएगी। इसका खामियाज़ा अंततः किसी एक दल को नहीं, लोकतंत्र और इस देश को ही भुगतना पड़ेगा।
सवाल यह है कि क्या हमारा देश इस स्थिति के लिए तैयार है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और एक दशक तक पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की पत्रिका यंग इंडियन के प्रभारी रहे हैं)