भारत में गंगा को मां कहा जाता है। उसी तरह सरस्वती नदी को विद्या की देवी कहा जाता है। बचपन में जब हम पुस्तक खोलते थे तो पहले उसे प्रणाम करते थे। पांव लग जाए तो अपराध बोध से ग्रसित हो जाते थे और प्रणाम करके क्षमा याचना करते थे। उसी सरस्वती नदी के बारे में किंवदंती है कि वह पहाड़ों से निकली और वहीं गुम हो गई और फिर सीधे प्रयागराज में गंगा और यमुना के संगम पर निकली, जिसकी वजह से उसे त्रिवेणी संगम नाम भी दिया गया। ऐसी नदी का उद्गम देखने का जब अवसर आया तो बढ़ी उम्र के बावजूद यह लोभ मैं रोक नहीं सका।
सरस्वती नदी का उद्गम देवताल से माना जाता है। जब आप बद्रीनाथ जाते हैं तो उससे तीन किलो मीटर दूर माणा गांव है। इसी रास्ते पांचों पांडव और द्रौपदी स्वर्ग की यात्रा पर निकले थे। लेकिन स्वर्गारोहिणी सिर्फ युधिष्ठिर ही पहुंच पाये। बाकी चारों भाई और द्रौपदी रास्ते में ही मृत्यु को प्राप्त हो गये। ऐसा पौराणिक कथाओं में कहा जाता है। दरअसल यह रास्ता ही इतना कठिन है कि उम्रदराज लोगों के लिए काल बन जाता है। इसी रास्ते पर जब आप माणा गांव पार करते हैं तो सरस्वती नदी अपने वेगवान रूप में दिखती है। जैसे ही आप माणा गांव पार करके भीम पुल पर पहुंचते हैं, वैसे ही दाईं तरफ झक सफेद सरस्वती ऊपर से दो हिस्सों में विभाजित होकर नीचे गिरती है। बाईं ओर देखें तो भी थोड़ी दूर तक यह नदी दिखती है और फिर गुम हो जाती है। बाद में जाकर यह अलकनंदा में केशव प्रयाग नामक स्थान पर मिल जाती है। सरस्वती नदी के बारे में आम लोगों को बस इतनी ही भौगोलिक जानकारी है।
पिछले कुछ सालों से श्री सुभाष थलेणी जी के प्रयासों से “ श्रीदेवताल माणा पास सीमा दर्शन विरासतीय यात्रा “ शुरू हुई है। इस यात्रा का मकसद लोगों को अपनी सीमा (भारत की) और सरस्वती नदी का उद्गम दिखाना है। मुझे जब इसकी जानकारी मिली तो मैंने भी इसे देखने की इच्छा जाहिर की। श्रीनगर, उत्तराखंड के कवि मित्र नीरज नैथानी ने इसकी पूरी जानकारी दी। माणा से ऊपर देवताल तक का पूरा क्षेत्र सुरक्षा बलों के अधीन है। यहां जाने के लिए स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती है। प्रशासन जब परमिट जारी करता है तभी सुरक्षा बल आगे जाने देते हैं। और प्रशासन तब परमिट जारी करता है जब आप मेडिकल सर्टीफिकेट, पुलिस वेरिफिकेशन और एफिडेविड देते हैं। मैंने ये सब काम किया। बाकी काम थलेड़ी जी और जोशीमठ के ख्याति प्राप्त पत्रकार राजेश नंबूरी ने प्रशासन से मिलकर करा लिया। थलेड़ी जी भी ऑल इंडिया रेडियो में बड़े पदों पर रहे हैं और वहां से रिटायर होने के बाद देहरादून में रह रहे हैं।
17 और 18 दो दिन के लिए प्रशासन ने परमिट जारी किया। परमिट मिलने का मतलब यह नहीं कि आप देवताल पहुंच ही जाएंगे। यह मौसम पर निर्भर करता है। मौसम साफ है, बारिश न हो बर्फबारी न हो तभी आप जा सकते हैं, जो कि एक बहुत मुश्किल काम है। देवताल बहुत ऊंचाई पर स्थित है। तेज ठंडी हवाएं चलती हैं और करीब-करीब रोज ही बर्फ पड़ती है। तो सिर्फ सौभाग्यशाली लोग ही देवताल तक पहुंच पाते हैं।

चूंकि सत्रह, अठारह सितंबर दो दिन के लिए परमिट मिला था तो सब लोगों ने 15 सितंबर को बद्रीनाथ पहुंचना तय किया। एक दिन वहां रुकने की योजना बनी ताकि शरीर कठिन और बदले वातावरण को आत्मसात कर सके। इसलिए मैं 14 तारीख को गाजियाबाद से निकल पड़ा और शाम को श्रीनगर पहुंच गया। 15 तारीख को वहां से बद्रीनाथ पहुंचा। वहां 16 तारीख को उत्तराखंड के सबसे ऊंचे प्रपात वसुधारा जाने की योजना बन गई। और सत्रह तारीख को देवताल। कहां गाजियाबाद, जहां मैं रहता हूं और कहां श्रीनगर, बद्रीनाथ, वसुधारा और देवताल।
गाजियाबाद बमुश्किल समुद्र तल से 700 फीट की ऊंचाई पर है और यहां का तापमान 26 से 33 डिग्री के बीच है। जबकि श्रीनगर करीब 1800 फीट की ऊंचाई पर है और वहां तापमान इस समय 18 से 30 डिग्री के बीच है। बद्रीनाथ की ऊंचाई जहां दस हजार फीट से ऊपर है वहीं वहां का तापमान -2 डिग्री से लेकर सात-आठ डिग्री था। वसुधारा की ऊंचाई जहां 12 हजार फीट से लेकर 12500 फीट तक है वहीं वहां का तापमान बद्रीनाथ से भी दो तीन डिग्री कम था। देवताल का तो पूछिये ही मत। वह करीब 18000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और तापमान माइनस दो से पांच से लेकर पांच छह डिग्री के बीच रहता है। सिर्फ सितंबर एक ऐसा महीना होता है जब यहां की बर्फ पिघलती है। ऐसे में शरीर वातावरण के अनुसार इतना जल्दी कैसे ढाल सकता था। इसलिए परेशानी सभी को हुई लेकिन जिनकी उम्र ज्यादा थी, उन्हें बहुत ज्यादा हुई। कुछ लोगों को तो ऑक्सीजन देना पड़ा।
बद्रीनाथ से आगे बढ़ने पर बाईं तरफ आप जाते हैं तो माणा है और उससे थोड़ा पहले ही दाईं तरफ एक सड़क कटती है, जो आपको देवताल ले जाती है। इस स़ड़क पर आम लोग नहीं चलते। यह पूरा क्षेत्र सुरक्षा बलों के हवाले है। यहां गढ़वाल रेजीमेंट, आईटीबीपी और सेना तैनात है। सड़क पर थोड़ा आगे बढ़ते ही सरस्वती नदी दिखती है। ठीक उसी तरह जैसे माणा में दिखती है। माणा में इसकी दो धाराएं दिखती हैं जबकि यहां तीन। उससे पहले ही चेकपोस्ट है। यहां सभी के परमिट की जांच की गई और चेहरा मिलाकर ही आगे बढ़ने दिया गया। आगे दो और जगह चेकिंग हुई। ऐसा लगा एक जगह गढवाल रेजीमेंट की ओर से चेकिंग की गई, दूसरी बार आईटीबीपी की ओर से और तीसरी बार सेना की ओर से। जो क्षेत्र जिसके अधीन है, वहां शुरू में ही चेकिंग हुई। हम कुल ग्रुप में 18 लोग थे। देवताल पहुंचने से थोड़ा पहले ही हमें रोक दिया गया। बताया गया आगे बर्फ पड़ रही है। ऊपर से आदेश है कि हमें आगे न जाने दिया जाए।

यहां ऊपर का मतलब बड़े नेता या सरकारी अफसर से नहीं बल्कि ऊपर तैनात सुरक्षा बल शायद सेना की चेतावनी की वजह से हमें रोका गया। हम निराश हुए। लगा सारी मेहनत बेकार जाएगी। यहां तक पहुंचकर भी देवताल के दर्शन नहीं हो पायेंगे। पिछली यात्रा में गये कवि नीरज नैथानी ने बताया कि हमें तो पिछली बार इससे पहले ही रोक दिया गया था और हम बिना दर्शन किये ही लौट आये थे। लेकिन कुछ देर रुकने के बाद उन्होंने हमें आगे जाने की इजाजत दे दी। सभी के चेहरे खुशी से खिल उठे। कारवां आगे बढ़ा। अब सांस लेने में दिक्कत आने लगी थी। पेट फूलने लगा, सीने में भारीपन महसूस होने लगा। लेकिन हम लोग आगे बढ़ते रहे। जब देवताल पहुंचने ही वाले थे कि सेना के जवानों ने हमें एक बार फिर रोक दिया। कहा कि अब बस 500 मीटर दूर है देवताल। आप वहां गाड़ी से नहीं जा सकते। लेकिन चूंकि आप लोग यहां तक आ गये हैं तो ज़रूर वहां जाइये। पैदल।
हम उत्साह में पैदल ही चल पड़े। लेकिन ऑक्सीजन की कमी के कारण वहां एक एक कदम बढ़ाना मुश्किल हो रहा था। पहले राक्षस ताल पड़ा, फिर मानव ताल और आखिर में देवताल। मुझसे तो चला ही नहीं जा रहा था। तभी सेना की एक छोटी गाड़ी आई। उस गाड़ी की खासियत ये थी कि वो बर्फ पर भी चल सकती थी। मेरी स्थिति देखकर उन्होंने मुझे बैठा लिया और देवताल पहुंचा दिया। वहां सेना ने ही हनुमान मंदिर बना रखा है। जिस शेड में हनुमान जी थे उस पूरी शेड की सतह पर बर्फ जमी हुई थी। तेज कंटीली हवाएं चल रही थीं। वहां रुकना मुश्किल था। मैं अपने ड्राइवर का सहारा लेकर किसी तरह पांच सौ मीटर की दूरी तय करके वापस आया और गाड़ी खुलवाकर बीच वाली सीट पर लेट गया। थोड़ा नीचे उतरने पर सेना के लोगों ने हमें चाय पिलाई, गोल बने घरों में हीटर जलाकर थोड़ी देर बैठाया, जरूरतमंद लोगों को ऑक्सीजन दिया तब जाकर जान में जान आई।
(अमरेंद्र कुमार राय वरिष्ठ पत्रकार हैं।)