दिल्ली में मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि मतदाता सूची से मतदाताओं को हटाने के आधार के रूप में “तार्किक विसंगति” को शामिल करने की संवैधानिक वैधता पर अभी फैसला लिया जाना बाकी है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब उसने बिहार में एसआईआर की वैधता को बरकरार रखा था, तब यह मुद्दा उसके सामने नहीं था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने भारतीय चुनाव आयोग से कहा है कि वह दिल्ली में मतदाता सूची के ड्राफ्ट से हटाए गए उन मतदाताओं को फॉर्म जमा करने की अनुमति देने पर विचार करे, जो पहले फॉर्म नहीं भर पाए थे। इन फॉर्म को जमा करने की अंतिम तिथि 17 अगस्त थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभी तक मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ के दौरान मतदाताओं की जांच के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ‘तार्किक विसंगति’ श्रेणी की वैधता पर कोई फैसला नहीं लिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस प्रक्रिया के लिए दी गई पिछली अनुमति केवल एक अंतरिम व्यवस्था थी, और इसका मतलब यह नहीं है कि पुनरीक्षण से जुड़े सभी मुद्दों पर अंतिम फैसला ले लिया गया है।
कोर्ट ने सुझाव दिया है कि भारत निर्वाचन आयोग को दिल्ली में मतदाता सूची के मसौदे से हटाए गए मतदाताओं को अपने फॉर्म जमा करने का मौका देने पर विचार करना चाहिए, भले ही वे अस्थायी रूप से बाहर होने या पता बदलने के कारण पहले फॉर्म न भर पाए हों।
कोर्ट ने चुनाव आयोग के उस फैसले पर भी सवाल उठाया है, जिसमें मतदाताओं को अपना पता अपडेट करने के लिए फॉर्म 8 का इस्तेमाल करने देने के बजाय, फॉर्म 6 (जो पहली बार मतदान करने वालों के लिए है) का उपयोग करके फिर से पंजीकरण करने को कहा गया है।
कोर्ट ने चुनाव आयोग से आग्रह किया है कि वह इन चिंताओं पर गौर करे और सुधारात्मक कदम उठाए, जिसमें फॉर्म जमा करने की समय-सीमा बढ़ाना भी शामिल है।
‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के अनुसार, मतदाता सूची के एसआईआर में, ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ एक ऐसी श्रेणी है जिसका इस्तेमाल चुनाव आयोग उन मतदाता रिकॉर्डों को चिह्नित करने के लिए करता है, जिनमें विसंगतियां या स्पष्ट कमियां होती हैं और जिनकी आगे जांच (सत्यापन) की आवश्यकता होती है। ‘अनमैप्ड’ मतदाताओं के विपरीत—जिनका विवरण मतदाता सूची के पिछले गहन पुनरीक्षण से नहीं जोड़ा जा सकता—तार्किक विसंगति मामलों में आमतौर पर ऐसे मतदाता शामिल होते हैं जिनके रिकॉर्ड तो जुड़े हुए हैं, लेकिन उनमें कुछ ऐसा विवरण है जिसे चुनाव आयोग विसंगतिपूर्ण मानता है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि बिहार एसआईआर मामले में कोर्ट का फैसला, इस पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े हर मुद्दे पर कोई अंतिम निर्णय नहीं था।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “बिहार मामले का फैसला इन कार्यवाही में उठने वाले हर सवाल पर कोई अंतिम निर्णय नहीं है। बिहार में, चुनाव आयोग ने शुरुआत में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ को एक श्रेणी के रूप में शामिल नहीं किया था। हमने पश्चिम बंगाल में इसे एक अंतरिम व्यवस्था के तौर पर अनुमति दी थी। हमने ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ प्रक्रिया की वैधता पर अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।”
न्यायाधीश ने आगे कहा कि पीठ इस मुद्दे पर और कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती, क्योंकि संवेदनशील मामलों में की गई मौखिक टिप्पणियों को अक्सर उनके संदर्भ से हटाकर पेश किया जाता है और उन्हें अंतिम न्यायिक निर्णय के रूप में दिखा दिया जाता है।
(जनचौक ब्यूरो)