समकालीन हिंदी पत्रकारिता में डाॅ मुकेश कुमार लीक से कुछ हटकर काम करने वाले पत्रकार हैं। सत्तर और अस्सी दशक के कुछ महत्वपूर्ण हिंदी संपादकों की तरह उनके व्यक्तित्व-कृतित्व में विविधता (हालांकि उस दौर में हमारे यहां डिजिटल मीडिया नहीं था) दिखती है, जो उन्हें आज के दौर का एक विशिष्ट पत्रकार बनाती है। पिछले दो-ढाई दशकों से मैं उन्हें एक साथ कई विधाओं और कई क्षेत्रों में सक्रिय एक समर्थ और संजीदा पत्रकार के रूप में देखता आया हूं। लेकिन मूलत: वह एक पत्रकार ही हैं। एक दौर में वह अखबार के पत्रकार रहे। फिर टेलीविजन के कामयाब एंकर और संपादक रहे। उनके कार्यस्थलों में दिल्ली, पटना और गुवाहाटी जैसे अलग-अलग रंग और ढंग के इलाके शुमार हैं। एक विश्वविद्यालय में वह मीडिया-शास्त्र के लोकप्रिय प्रोफेसर भी रहे हैं।
इन दिनों वह एक स्वतंत्र डिजिटल मीडिया न्यूज एवं व्यूज के मंच ‘सत्य हिंदी’ के संपादक और उसके यूट्यूब चैनल के प्राइम-टाइम कार्यक्रम के प्रस्तोता हैं। समाचार की कोलाहल भरी दुनिया में रहते हुए भी उनकी साहित्यिक रचनाशीलता लगातार जारी है। काव्य और गद्य, दोनों विधाओं में उन्होंने महत्वपूर्ण काम किये हैं। अब तक उनकी एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हैं। उन्होंने मीडिया शास्त्र पर भी किताबें लिखी हैं।
डाॅ मुकेश कुमार अपनी नई किताब में बिल्कुल एक नये ढंग का कंटेंट लेकर आये हैं। मीडिया पर व्यंग्य की यह संभवत: पहली किताब है: “मीडिया का कैरेक्टर ढीला!’ (शिवना प्रकाशन, सम्राट कांप्लेक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर, मध्यप्रदेश, प्रकाशन वर्ष-2026, मूल्य-300, पृष्ठ: 170)।
मीडिया की शास्त्रीय आलोचना में जो बहुत सारी बातें नहीं आ पातीं, व्यंग्य की अपनी इस किताब में मुकेश कुमार ने उन्हें बहुत चुटीले ढंग से पेश किया है। किताब की भूमिका के पहले वाक्य से ही संकेत मिल जाता है कि लेखक ने अपनी इस व्यंग्य रचना में अपने देश के कथित मेनस्ट्रीम मीडिया और उसके मीडियाकारों की कितनी जबर्दस्त ‘मरम्मत’ की होगी! भूमिका का पहला वाक्य है: ‘अगर ये राजनीति का अमृतकाल है तो मीडिया का भी है’।
किताब में संकलित व्यंग्य रचनाओं के इन शीर्षकों से भी विषयवस्तु की झलक मिल जाती है: देखो री सखी रामराज्य आयो, हाथी की खिचड़ी और मीडिया की लीद, मीडिया में जातिवार जनगणना, बधाई हो गोदी मीडिया को नया लाल मिला, युद्ध पर्यटन पर जाबांज पत्रकार, ठग्गू के रसगुल्ले और विश्वगुरु, मीडिया लिचिंग के स्वैच्छिक शिकार, इनकी रासलीला और उनका कैरेक्टर ढीला आदि!
‘मीडिया में जातिवार जनगणना’ शीर्षक व्यंग्य-लेख में मुकेश कुमार ने भारत के मेनस्ट्रीम मीडिया, खासतौर पर टीवीपुरम यानी न्यूज चैनलों के न्यूज रूम में हमेशा छाये रहने वाले ‘घटाटोप जातिवादी दुराग्रहों’ की पोल खोली है (पृष्ठ 24)। यह टीवी मीडिया अंदर से कितना जातिवादी और कितना मनुवादी है; इसका सच मुकेश कुमार से बेहतर और कौन बता सकता है, जिन्होने दशकों तक इसके न्यूज रूमों में विभिन्न स्तरों पर काम किया हो!
हमारी पत्रकारिता और समूची मीडिया इंडस्ट्री में किस तरह आज जुमलेबाजी कथित कामयाबी का फार्मूला बन गयी है; मुकेश कुमार इसकी तुलना राजनीति की जुमलेबाजी से करते हैं। उनका मानना है कि हमारे मुल्क की राजनीति की तरह हमारा मीडिया भी अब जुमला-प्रधान हो गया है।
इस कदर वाहियात और फूहड़ हो चुके न्यूज चैनलों को हमारे जैसे समाज में लोग अब भी क्यों और कैसे देखते हैं; मुकेश इसकी वजह आसानी से तलाश लेते हैं। कहीं न कहीं वह हमारे समाज में अंदर तक बैठा ढोंग है। और फिर वह सिर्फ टीवीपुरम के प्रति ही नहीं, अपने ढोंगी समाज के प्रति भी आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं: ‘अहिंसा के पुजारियों के इस देश में ऐसे मार-धाड़ वाले कार्यक्रम बहुत पसंद किये जाते हैं। गुस्से से भरे हुए एंकर तो उनके लिए हीरो की तरह होते हैं। इसलिए डब्ल्यू डब्ल्यू एफ की फिक्स्ड, नुमाईशी फाइटिंग चलती रहेंगी और कमजोर एवं प्रचार पिपासु पहलवानों के पिटने का सिलसिला भी जारी रहेगा। (पृष्ठ-143)।
इसी व्यंग्य लेख में मुकेश टीवीपुरम के एक और दिलचस्प पहलू को उजागर करते हैं। अनेक टीवी स्टूडियो में अक्सर कुछ ऐसे लोग दिखाई देते हैं, जो एंकर या तेजतर्रार राजनीतिक विश्लेषकों या धाकड़ पार्टी प्रवक्ताओं की गुस्सा या उपेक्षा भरी टिप्पणियां झेलने को अभिशप्त होते हैं! बड़े दिलचस्प विवरण के साथ लेखक ने ऐसे कथित ‘बेशर्म मेहमानों’ की चर्चा की है जो एंकरों और अन्य वार्ताकारों की तमाम ‘बदतमीजियां’ हंस-हंसकर झेलते हैं! सवाल उठता है, वे इतनी उदारता से लाखों दशकों के आगे हर रोज अपना अपमान क्यों झेलते हैं?
इस बारे में मुकेश कुमार की पड़ताल का निष्कर्ष दिलचस्प है। उनका मानना है कि स्टूडियो में ऐसे लोगों पर क्रोध और लताड़ की बारिश करके एंकर की किसी वीर-नायक वाली छवि निर्मित कराने में मदद मिलती है! दूसरी तरफ, एंकरों की उपेक्षा और लताड़ झेलने वालों के भी अपने-अपने एजेंडे होते हैं। टीवी स्टूडियो में अपनी नियमित उपस्थिति दिखाकर कुछ को राजनीति में घुसने का ‘शार्ट कट’ भी मिल जाता है!
कुल-मिलाकर प्रो मुकेश कुमार की मीडिया पर यह व्यंग्य-पुस्तक एक नया प्रयोग है। इसमें मौलिक रचनात्मकता भी है और मीडिया की समीक्षात्मक पड़ताल भी है।
(उर्मिलेश प्रिंट और टीवी मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं और यूट्यूब चैनल UrmileshOfficial भी चलाते हैं।)