जिस एसआईआर ने देश में 13 करोड़ से अधिक लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया है और जिसमें गड़बड़ियों को लेकर पूरे देश में बवाल मचा है उसकी वैधता की जाँच के लिए वकीलों के संगठन लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पांच पूर्व न्यायाधीशों का एक स्वतंत्र पैनल गठित किया है।
पैनल जांच करेगा कि चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया संविधान और कानून के अनुरूप है या नहीं और इससे पात्र मतदाताओं के अधिकारों पर क्या असर पड़ा।
देशभर में जनसुनवाई, मतदाता सूची से नाम जोड़ने-काटने के आँकड़ों का विश्लेषण और कानूनी समीक्षा होगी। दिसंबर 2026 तक अंतिम रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाएगा। इसमें कहा गया, “वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पर पूर्व जजों का नया बना स्वतंत्र आयोग, योग्य वोटरों पर एसआईआर प्रक्रिया के संवैधानिक और कानूनी वैधता, तरीके और कुल असर की जांच करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से काम करेगा।”
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एमबी लोकुर इस आयोग के अध्यक्ष होंगे। आयोग में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एके पटनायक, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बदर दुर्रेज अहमद, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रेखा शर्मा और पटना हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अंजना प्रकाश सदस्य होंगी।
स्वतंत्र पैनल अन्य मुद्दों के अलावा, इस बात की भी जांच करेगा कि क्या योग्य नागरिकों को वोटर लिस्ट में बनाए रखा गया था और क्या अयोग्य एंट्रीज़ को ठीक से हटाया गया था।
वकीलों के संगठन एलएएफसी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक़ आयोग का गठन एसआईआर की रूपरेखा, इसे लागू करने के तरीके और इसके परिणामों को लेकर नागरिकों द्वारा उठाई गई चिंताओं के जवाब में किया गया है। आयोग का मुख्य सवाल यह होगा कि क्या एसआईआर के दौरान हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में बनाए रखने की व्यवस्था सुनिश्चित की गई और क्या अपात्र एंट्री को सही प्रक्रिया के तहत हटाया गया। आयोग का लक्ष्य अपनी जांच पूरी करके दिसंबर 2026 तक अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक करने का है।
आयोग केवल एसआईआर की प्रशासनिक प्रक्रिया की समीक्षा नहीं करेगा, बल्कि यह भी देखेगा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में संवैधानिक और क़ानूनी सुरक्षा उपायों का पालन हुआ या नहीं। इसकी जाँच इन तीन बड़े मुद्दों पर होगी-एसआईआर की प्रक्रिया संबंधित कानूनों और संविधान के प्रावधानों के अनुरूप है या नहीं।मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सत्यापन की प्रक्रिया किस तरह अपनाई गई।क्या इस प्रक्रिया से किसी पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार प्रभावित हुआ और क्या अपात्र नामों को हटाने के लिए सही प्रक्रिया अपनाई गई।आयोग का मक़सद यह पता लगाना है कि मतदाता सूची को सही करने के नाम पर किसी पात्र मतदाता का नाम ग़लत तरीक़े से तो नहीं हटाया गया।
यह जाँच तब हो रही है जब एसआईआर को लेकर विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने, सत्यापन की प्रक्रिया और नागरिकों के मतदान अधिकारों पर असर को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। आयोग इन चिंताओं की स्वतंत्र जांच करेगा।
एलएएफ़सी के मुताबिक़ आयोग देश के अलग-अलग हिस्सों में सार्वजनिक सुनवाई करेगा। इसके लिए पूर्ण पीठ और क्षेत्रीय पीठ बनाई जाएंगी, जो विभिन्न स्थानों पर जाकर लोगों की गवाही सुनेंगी। इन जनसुनवाइयों में तीन तरह के पक्षों को शामिल किया जाएगा। इसमें एसआईआर से प्रभावित नागरिक, नागरिक समाज के संगठन और चुनाव और कानून से जुड़े विशेषज्ञ शामिल होंगे।
इस प्रक्रिया के ज़रिए आयोग सीधे उन लोगों की बात सुन सकेगा, जिन्हें मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या सत्यापन के दौरान परेशानी हुई है। क्षेत्रीय पीठों के गठन का मक़सद देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आने वाले अनुभवों और शिकायतों को जाँच में शामिल करना है।
आयोग ने अपनी जांच के लिए एक विशेष रिसर्च विंग बनाने की योजना भी रखी है। यह विंग देशभर में मतदाता सूचियों से जुड़े आंकड़े जुटाएगा और उनका विश्लेषण करेगा। इसमें खास तौर पर मतदाता सूची में जोड़े गए और हटाए गए नामों से संबंधित आँकड़ों को देखा जाएगा। रिसर्च विंग अपने निष्कर्ष आयोग के सामने रखेगी।
इन आँकड़ों की जाँच से यह समझने की कोशिश होगी कि अलग-अलग क्षेत्रों में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया का क्या स्वरूप रहा और क्या इसके परिणामों में कोई ऐसी बात सामने आती है, जिसकी आगे जांच जरूरी हो। आयोग की जांच में केवल व्यक्तिगत शिकायतें ही नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर उपलब्ध आँकड़ों को भी शामिल किया जाएगा।
आयोग की मदद के लिए एक कानूनी सहायता टीम बनाई जाएगी। यह टीम एसआईआर से संबंधित कानूनों, चुनाव आयोग की अधिसूचनाओं और मतदाताओं के सत्यापन की प्रक्रिया की समीक्षा करेगी। इसका मक़सद यह जांचना होगा कि पूरी प्रक्रिया में संविधान की ओर से दिए गए अधिकारों और सुरक्षा उपायों का पालन हुआ या नहीं।
आयोग को कानूनी सलाह और सहायता देने के लिए कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नाम शामिल किए गए हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, चंदर उदय सिंह और राजू रामचंद्रन शामिल हैं। इसके अलावा वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, प्रशांतो चंद्र सेन, रेबेका मैमन जॉन, वारिशा फरासत और वृंदा ग्रोवर भी आयोग को कानूनी सहायता देंगे।
ये वकील आयोग की जांच में संबंधित कानूनों, संवैधानिक प्रावधानों और कानूनी प्रक्रियाओं को समझने में मदद करेंगे। हालांकि, आयोग की ओर से जारी जानकारी में यह स्पष्ट किया गया है कि अंतिम निष्कर्ष और सिफारिशें केवल पूर्व न्यायाधीशों का आयोग ही तय करेगा।
एलएएफसी की प्रेस विज्ञप्ति में आयोग की स्वतंत्रता को लेकर विशेष रूप से साफ़ किया गया है कि आयोग के निष्कर्षों, फैसलों और सिफारिशों पर न तो उसे गठित करने वाले संगठन और न ही सहयोगी समितियां प्रभाव डालेंगी। आयोग अपने निष्कर्षों और सिफारिशों के लिए स्वयं जिम्मेदार होगा।
एक समन्वय समिति और सचिवालय आयोग को प्रशासनिक तथा संचालन संबंधी सहायता देंगे। यह सचिवालय एलएएफ़सी के तहत काम करेगा। इस व्यवस्था का मक़सद आयोग के कामकाज के लिए ज़रूरी संसाधन और समन्वय उपलब्ध कराना है, जबकि जांच के निष्कर्षों को पूर्व न्यायाधीशों के स्वतंत्र निर्णय पर छोड़ना है।
लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन यानी एलएएफसी वकीलों का एक संगठन है। संगठन की वेबसाइट के मुताबिक, इसकी वैचारिक बुनियाद भारतीय संविधान की प्रस्तावना है।
इसका गठन इसी साल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर किया गया था। संगठन खुद को गैर-दलीय, धर्मनिरपेक्ष और जातिवाद से मुक्त बताता है। इसके अनुसार, संविधान की प्रस्तावना के सिद्धांतों को गंभीरता से मानने वाले वकील इससे जुड़ सकते हैं।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)