Sunday, August 14, 2022

किसान आंदोलन: जश्न के बीच से झांकती चुनौतियां

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यहां सड़क पर कीले उगीं हैं। कंटीले तारों ने अपने ही देश के नागरिकों को जानवरों की तरह घेर रखा है। आपका स्वागत फौज़ी बूटों की कर्कश ध्वनियों से होता है। यह कश्मीर नहीं किसानों के आंदोलन-स्थल की तस्वीर है। वही जगह जो भारतीय राजसत्ता के केंद्र रायसीना हिल्स से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर है। वाटर कैनन की जिस्म चीर देने वाली धार के सामने खेतिहर सीने चट्टान की तरह डटे रहे। वे तब भी नहीं टूटे जब उन पर उन्हीं के देश की पुलिस ने कहर बरपा दिया। बेशर्म पत्रकारिता ने न जाने कितने तरीकों से अपने ही देश के नागरिकों के खिलाफ़ झूठ और मक्कारी का अंबार लगा दिया। पर वे न टूटे न झुके। जब-जब लगा कि संघर्ष संकट में है, मिट्टी की संतानें नई कोपलों के साथ नई ऊर्जा से उग आयीं।

यह आंदोलन 700 से ज्यादा किसानों की शहादत की पीड़ा और एक साल से ज्यादा अवधि की असंख्य कठिनाईयों का गवाह है। जब हम अपने घरों में गर्म लिहाफ़ में लिपटे थे तब हमारे लड़ाके भीषण सर्दी से जूझ रहे थे। गर्मी का पारा कहर बनकर बरसा पर वे नहीं टूटे। बरसात इस बार खेतों में नहीं उन झोपड़ियों पर गिरी जो किसी तरह सर ढक रहीं थीं। इतने जुल्मो-सितम के बाद भी वे नहीं टूटे क्योंकि वे मिट्टी से जन्मे थे। यह आंदोलन गवाह है उस एका का जो संघर्ष के साथियों के बीच पनपता है। बेपनाह मुहब्बतों के केंद्र सिंघु, टिकरी, गाजीपुर। मुहब्बतें जिन्होंने जाति, धर्म, क्षेत्रीयता, भाषा, लिंग और सामाजिक पहचानों को मीलों पीछे छोड़ दिया। यही अपनापा यही साझापन और यही सामूहिकता काम आयी। फासीवाद के दुर्दम्य अंधड़ को इसने न सिर्फ रोका है बल्कि कुछ हद तक पीछे भी धकेल दिया है।

भारत में आजादी के बाद के सबसे बड़े और सबसे व्यापक किसान आंदोलन की उपलब्धियां शानदार हैं। किसानों ने इसमें हद दर्ज़े की जीवटता, अडिगता और अनुशासन का परिचय दिया है। नेतृत्व ने भी आले दर्ज़े की परिपक्वता का परिचय दिया है। इसने सत्ता की साम-दाम-दण्ड-भेद की सारी नीतियों का पर्दाफाश किया और उसके सारे षड्यंत्रों को भी नाकाम करते हुए नेतृत्व इसे जीत की मंज़िल तक ले जाने में कामयाब रहा।

कदम-ब-कदम नेतृत्व आंदोलन को और भी गहन व व्यपाक करता गया। मध्यम व धनी किसानों के ही हितों से शुरुआत करने वाले एक आंदोलन के रूप में इसे चित्रित करने की संकीर्णता के खिलाफ नेतृत्व इसमें बाकी शोषित-उत्पीड़ित वर्गों को भी किसी न किसी रूप में शामिल करता चला गया। गरीब किसान-खेतिहर मजदूर, आम मज़दूर, मध्यम वर्ग (शहरी व देहाती) तथा छोटे दुकानदार, व्यापारी व व्यवसायी, छोटे-मंझोले उद्योगपति सभी को इसमें धीरे-धीरे जोड़ने व उनकी सहभागिता लाने की नेतृत्व की बुद्धिमत्तापूर्ण कोशिशें सफल रहीं।

इसी प्रकार दलितों, महिलाओं, राष्ट्रीय व धार्मिक अल्पसंख्यकों को भी जोड़ा जा सका।

आर्थिक मांगों से शुरू होकर यह आंदोलन क्रमशः राजनीतिक रुख भी अख़्तियार करता चला गया व इसमें राजनीतिक मांगें भी जुड़ती चली गईं। इसने देश की सभी प्रगतिशील, जनवादी, राष्ट्रीयता और जनपक्षधर ताकतों को अपने इर्द-गिर्द गोलबंद करने तथा उन्हें सक्रिय करने में सफलता हासिल की।

इस तरह यह आंदोलन और इसका नेतृत्व किसी न किसी रूप में संघर्ष करने वाली सभी ताकतों को एक ही संगठन, सयुंक्त किसान मोर्चा के रूप में गोलबंद करने और तमाम मतभेदों के बावजूद अलग-अलग विचारधारा व राजनीतिक समझ रखने वाली शक्तियों को एक मंच पर लाने और साथ लेकर चलने में भी यह सफल रहा। इस दिशा में इसके द्वारा प्रस्तुत मिसालें अनुकरणीय हैं।

सयुंक्त मोर्चा और साझा मंच बनाने तथा इसे लेकर लम्बे दिनों तक चलने एवं जनवाद के लिए एकजुट होकर लड़ने वाली ताकतों के लिए इस आंदोलन से सीखने के लिए बहुत कुछ है।

कुल मिलाकर इस आंदोलन ने कृषि पर कॉर्पोरेट के कब्जे की नापाक कोशिशों को फिलहाल के लिए नाकाम कर दिया है और फासीवादी ताकतों को भी एक कदम पीछे धकेलने में सफल रहा है। सचमुच में कहें तो यह आंदोलन कॉर्पोरेट पर किसानों की जीत का, फासीवादी ताकतों पर लोकतांत्रिक शक्तियों की जीत का, देश को एकात्मक राज्य की ओर ले जाने वाली ताकतों पर संघवाद की पक्षधर ताकतों की जीत का, सांप्रदायिक शक्तियों, खासकर हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक शक्तियों पर सच्ची धर्मनिरपेक्षवादी शक्तियों की जीत का तथा देश को बेच खाने वाली राष्ट्रविरोधी शक्तियों पर देश और उसके संसाधनों की सही मायने में रक्षा करने वाली राष्ट्रभक्त शक्तियों की जीत का एक जीता-जागता प्रतीक बनकर उभरा है। इस तरह इसने भारत की देशी-विदेशी पूंजीपतियों द्वारा लूट-खसोट और इसके विरूद्ध संघर्षरत ताकतों को कुचलने के लिए भारत की राजसत्ता के फासीवादीकरण के खिलाफ संघर्ष करने वाली शक्तियों में और साथ ही सभी परिवर्तनकामी शक्तियों में भी एक आशा और भरोसे का संचार किया है। यही कारण है कि यह आंदोलन भारत की क्रांतिकारी और संघर्षरत जनता के सामने एक मशाल की तरह दिखता है।

आज किसानों, मजदूरों तथा अन्य परिवर्तनकामी ताकतों को जो तात्कालिक जीत मिली है, उसके मद्देनजर इस आंदोलन की उपलब्धियों को सहेजना, उन्हें आगे बढ़ाना और इसके सामने की चुनौतियों का मुकाबला करना हम तमाम परिवर्तनकामी ताकतों के लिए एक मुख्य कार्यभार के रूप में सामने आया है।

इसलिए जरूरी है कि एसकेएम को दीर्घस्थायी बनाया जाए। इसके इर्दगिर्द अन्य शक्तियों को भी गोलबंद किया जाए। इसे अखिल भारतीय स्तर पर फैलाया जाए तथा राज्यों, जिलों में भी इसकी शाखाओं का विस्तार हो। साथ ही जमीनी स्तर पर खासकर देहाती इलाकों में किसान संगठनों को सुदृढ़ बनाया जाए। अगर सम्भव हो तो एसकेएम की ओर से विभिन्न भाषाओं में एक नियमित पत्रिका प्रकाशित करने की पहल भी ली जानी चाहिए।

तात्कालिक जीत के जश्न के माहौल में हमें इस आंदोलन की चुनौतियों को समझना चाहिए और इसके लिए खुद को व अन्य संघर्षशील ताकतों को भी कदम-ब-कदम सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए। एसकेएम की पहल से कुछ सेमिनार, संगोष्ठियों, सम्मेलनों का आयोजन किया जाना चाहिए।

एक और बात गौर करने लायक है-

यह आंदोलन उसी हद तक सफल हो पाया है जिस हद तक यह अपने-आपको एक जनांदोलन में बदल पाया है। एसकेएम भी उसी हद तक सफल रहा है जिस हद तक इसने खुद को एक व्यापक किसान मोर्चे में, एक जनमोर्चे में ढाला है। आनेवाले दिनों में इस आंदोलन और इसके नेतृत्वकारी संगठनों का विकास-विस्तार तथा इसके सामने की चुनौतियों का मुकाबला करने की सामर्थ्य हासिल करना इसी बात पर निर्भर करेगा कि देश की समूची परिवर्तनकामी ताकतों को समावेशित कर इसे किस हद तक  एक व्यापक जनांदोलन में और इसके नेतृत्वकारी संगठन को एक वास्तविक जनमोर्चे में बदला जा पा रहा है। कुल मिलाकर इस आंदोलन को कार्पोरेट लूट और फासीवाद के खिलाफ एक सशक्त राजनीतिक जनांदोलन के रूप में और भी ठोस, और भी व्यापक, और भी गहन तथा और भी जमीनी रूप देने पर ही भविष्य का सारा दारोमदार निर्भर करता है। अतः इसके लिए सभी स्तरों पर ठोस पहल की जानी चाहिए। इसमें मुख्य भूमिका एसकेएम को निभानी होगी।

निस्संदेह ये किसान आंदोलन देशी-विदेशी कॉरपोरेटों की लूट-खसोट के खिलाफ, कॉरपोरेट की रक्षा में खड़ी फासिस्ट सत्ता के खिलाफ एक शानदार प्रतिरोध-संघर्ष के रूप में सामने आया है। इस प्रतिरोध-संघर्ष में मिली यह जीत निस्संदेह काफी अहमियत रखती है। पर जीत के जश्न के इस जगमगाते माहौल में हमें दिमाग में रखना होगा कि भारतीय अवाम पर ऐसे कॉरपोरेटी आक्रमण और भी बढ़ेंगे, और भी तीखे होंगे क्योंकि वित्तीय पूंजी का संकट उन्हें और भी ऐसे हमलों के लिए बाध्य करेगा। देशी-विदेशी कॉरपोरेटों के और उनके हितों की रक्षा करने वाले फासिस्ट राज्य के आगामी हमलों का मुकाबला करने के लिए भारतीय अवाम को तैयार रहना होगा। एसकेएम जैसे मोर्चों को शक्तिशाली और व्यापक बनाकर उनकी जमीनी ताकत को सुदृढ़ कर तथा ऐसे और भी मोर्चों का निर्माण करने के लिए जरूरी ताकतों को गोलबंद करके ऐसे हमलों के खिलाफ और भी बड़े तथा व्यापक प्रतिरोध-संघर्ष के लिए कमर कसना होगा।      

(बच्चा प्रसाद सिंह लेखक और एक्टिविस्ट हैं। और आजकल बनारस में रहते हैं।)  

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