Saturday, October 1, 2022

पत्रकार रूपेश के खिलाफ एनआईए ने दर्ज किया एक और मामला

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रूपेश जी ने सरायकेला जेल में अभी जब 15 अगस्त को जगह बदलने को लेकर भूख हड़ताल की बात रखी ही थी कि, तभी उन पर एक और नया केस कैमूर बाघ अभयारण्य के विरोध में होने वाले आंदोलन के संबंध में एनआईए द्वारा लगा दिया गया है, जिसमें 16 अगस्त को एनआईए कोर्ट पटना में उन्हें ले जाने की बात की गई है, यानी अब तीन केस 67/21, दूसरा 16/22, तीसरा एनआईए स्पेशल केस 19/22 लगा दिया गया है। एक पत्रकार पर दमन की सरकार की मंशा को पूरा करने के लिए पूरी राष्ट्रीय एजेंसियां लगा दी गई है।

वैसे इसकी आशंका रूपेश ने पिछले 05 मई, 2022 को उस वक्त व्यक्त की थी जब 28 अप्रैल, 2022 को बिहार के कई समाचारपत्रों में यह खबर छपी थी कि NIA ने 12 अप्रैल, 2022 को रोहतास (बिहार) थाना में दर्ज FIR No. 123/22 को टेकओवर करते हुए RC 19/22 के तहत एक मुकदमा NIA कोर्ट, पटना में दर्ज किया है। इस मुकदमे में नामजद अभियुक्तों में से भाकपा (माओवादी) के केंद्रीय कमेटी सदस्य विजय कुमार आर्या के साथ-साथ 4 और नाम भी थे, जिसमें एक नाम रूपेश कुमार सिंह (भागलपुर) भी है।

वही खबर 05 मई, 2022 को ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र के झारखंड के तमाम एडिशन में प्रमुखता से छपी थी, लेकिन इसमें सिर्फ रूपेश कुमार सिंह लिखा हुआ था।

इसमें रूपेश कुमार सिंह ने बताया था कि 

दोस्तों, मैं आज यानी 5 मई, 2022 को यह स्टेटमेंट आने वाले दिनों के लिए इसलिए जारी कर रहा हूँ, क्योंकि मुझे शक है कि केन्द्र की मोदी सरकार के इशारे पर NIA मेरे खिलाफ एक बड़ी साजिश कर रही है।

इस शक का कारण क्या है?

28 अप्रैल, 2022 को बिहार के कई समाचारपत्रों में यह खबर छपी कि NIA ने 12 अप्रैल, 2022 को रोहतास (बिहार) थाना में दर्ज FIR No. 123/22 को टेकओवर करते हुए RC 19/22 के तहत एक मुकदमा NIA कोर्ट, पटना में दर्ज किया है। इस मुकदमे में नामजद अभियुक्तों में से भाकपा (माओवादी) के केंद्रीय कमिटी सदस्य विजय कुमार आर्या के साथ-साथ 4 और नाम भी थे, जिसमें एक नाम रूपेश कुमार सिंह (भागलपुर) भी है। यही खबर आज यानी 05 मई, 2022 को ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र के झारखंड के तमाम एडिशन में प्रमुखता से छपी है, लेकिन इसमें सिर्फ रूपेश कुमार सिंह लिखा हुआ है।

चूँकि मेरा गृह जिला (होम टाउन) भागलपुर है और 4 जून, 2019 को जब सेन्ट्रल आईबी और एपीएसआईबी की टीम ने हमारा (मेरे साथ मेरे रिश्तेदार अधिवक्ता मिथिलेश कुमार सिंह व ड्राइवर मोहम्मद कलाम) अपहरण झारखंड के हज़ारीबाग जिला से कर लिया था और 2 दिनों तक अवैध कस्टडी में रखने के बाद 6 जून को गया (बिहार) पुलिस को सौंपा था, उस समय मुझे भाकपा (माओवादी) का बड़ा नेता बताया गया था और मेरा घर भागलपुर ही मुकदमे में दर्ज था।

NIA के FIR में क्या है?

4 मई,2022 को NIA की वेबसाइट से मैंने FIR कॉपी निकाली। यह FIR नई दिल्ली के NIA, थाना में दर्ज हुआ है (RC 19/22)। इसके अनुसार 12 अप्रैल, 2022 को माओवादी नेता विजय कुमार आर्या, राजेश गुप्ता, उमेश चौधरी, अनिल यादव, रूपेश कुमार सिंह एवं अज्ञात लोग रोहतास थानान्तर्गत समहुता गांव में प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के लिए लेवी इकट्ठा करने, सदस्यों के रिक्रूटमेंट व माओवादी गतिविधि को प्रमोट करने के लिए जमा हुए थे। इस FIR में इन्टरेस्टिंग यह है कि 5 नामजद अभियुक्तों में से 4 का नाम, पिता का नाम व पता में गांव, थाना व जिला भी मौजूद है, लेकिन रूपेश कुमार सिंह के ना तो पिता का नाम है और ना ही गांव व थाना, सिर्फ भागलपुर लिखा हुआ है।

12 अप्रैल को मैं कहाँ था?

मैं विरा साथीदार स्मृति समन्वय समिति, नागपुर (महाराष्ट्र) द्वारा 12-13 अप्रैल, 2022 को आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए नागपुर के कविवर सुरेश भट्ट सभागृह, नागपुर में मौजूद था, वहाँ मैंने अपने फेसबुक पर लाइव भी किया था।

क्या मैं रोहतास जाते रहा हूँ?

नहीं, मैं 36 साल की अपनी उम्र में कभी भी रोहतास नहीं गया। हाँ, रोहतास के पड़ोसी जिला कैमूर में मैं कैमूर मुक्ति मोर्चा के द्वारा कैमूर बाघ अभ्यारण्य के खिलाफ 26-28 मार्च, 2022 के तीन दिवसीय पदयात्रा को एक पत्रकार होने के नाते कवर करने ज़रूर 27 मार्च को गया था, जिससे संबंधित एक रिपोर्ट भी न्यूज़ वेबपोर्टल ‘जनचौक’ पर 29 मार्च को प्रकाशित हुई है।

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि मैं पिछले लगभग 8 सालों से झारखंड में रहकर पत्रकारिता कर रहा हूँ। मेरी जनपक्षधर पत्रकारिता के कारण ही 2019 में मुझे UAPA के तहत फर्जी मामले में फंसाकर जेल भेजा गया, जहाँ मुझे 6 महीने रहना पड़ा। बाद में पेगासस जासूसी प्रकरण में भी मेरा व मेरी जीवनसाथी ईप्सा शताक्षी के साथ हमारे परिवार के एक और सदस्य का भी मोबाइल नंबर आया, जिसके खिलाफ उचित जांच के लिए मैंने और ईप्सा ने सुप्रीम कोर्ट में रिट भी फाइल किया है। अगर NIA मुझे इस मुकदमे में घसीटने की कोशिश करती है, तो साफ सी बात है कि वे मेरे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला करेगी। क्योंकि मैं एक पत्रकार हूँ और सच लिखना व सरकार की जन विरोधी नीतियों का पर्दाफाश करना एक पत्रकार का कर्तव्य भी है।

रूपेश कुमार सिंह, स्वतंत्र पत्रकार (झारखंड)

05 मई, 2022

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न्याय पसंद लोगों को कानून के तहत अपराधी लिस्ट में डालना, घोटाला करने वाले व करोड़ों की सम्पत्ति रखने वाले नेताओं और पूंजीपतियों को सैल्यूट करना अब राष्ट्रीय एजेंसियों का काम है। ये बातें आज की आजादी के अर्थ जरूर बताता है, जहां गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई पर कोई कंट्रोल की योजना नहीं है पर गरीब, मेहनतकश जनता की आवाज बनने वाले पर कानून का शिकंजा कसा जा रहा है। जिसके खिलाफ हमारी आवाज  बुलंद करने की जरूरत है।

हमें भी अपनी आवाज ऐसे ही बुलंद करने की जरूरत है ताकि शोषण और दमन की व्यवस्था खत्म हो सके। बता दें कि रूपेश को जेल में एक पूरी तरह से जर्जर हो चुकी बिल्डिंग में बिल्कुल अकेले रखा गया है, जहां छत के 80% हिस्से से बारिश का पानी टपक रहा है, साथ ही छत भी टूटकर गिर रही है। आस-पास भी लम्बे लम्बे घास फैले हुए हैं, जहां जहरीले जीव हो सकते हैं।हम कल्पना कर सकते हैं कि यह कितना खतरनाक साबित हो सकता है। ऐसा भी नहीं है कि इस बारे में किसी से बात नहीं की गई है, रूपेश ने बीते 31 जुलाई को सीजेएम मंजू कुमारी के सामने जगह बदलने की बात की पर परिणाम सिफर रहा। मैंने 8 अगस्त से अब तक इससे संबंधित पत्र 2-2 बार जेल आईजी, मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री सचिव, डीसी सरायकेला, स्वास्थ्य मंत्रालय, मानवाधिकार आयोग को मेल किया है, पर अब तक किसी मेल पर न तो कोई कार्रवाई हुई है और न ही किसी का कोई जवाब ही आया है। यह सब रूपेश को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए किया जा रहा है।

रूपेश ने अब तक कितनी ही बार सरायकेला जेल सुपरिटेंडेंट से बात करने की कोशिश की है पर वह आज तक रूपेश से नहीं मिली हैं। नतीजतन रूपेश ने जेल के बड़े जमादार के सामने जेल प्रशासन से तीन मांगें रखी हैं-

    1. मुझे एक सुरक्षित स्थान पर रखा जाए। बाकी बंदियों से मिलने जुलने भी दिया जाए।

   2. मुझे पढ़ने लिखने का सामान उपलब्ध कराया जाए।

   3. मुझे जेल मैनुअल के हिसाब से खाना, और ठीक तरह पका खाना दिया जाए। क्योंकि रोटियां बिल्कुल अधपकी रहती हैं।

रूपेश ने यह ऐलान किया है कि अगर 14 अगस्त तक उनकी ये मांगें नहीं मानी जाती हैं, तो वह 15 अगस्त से भूख हड़ताल पर बैठेंगे। जिसका जिम्मेवार जेल प्रशासन होगा। उन्होंने 9 अगस्त को ही ये बातें जमादार के सामने रखी हैं पर अभी तक कुछ एक्शन नहीं लिया गया है।

रूपेश ने बताया कि 298 कैदियों जिसमें 290 पुरुष और 8 महिला की क्षमता वाले जेल में कुल 500 कैदी हैं। जेल में सिपाही की नियुक्ति भी आधी है। खाने का स्तर काफी खराब है,और जेल मैनुअल को तो बिल्कुल भी फॉलो नहीं किया जाता है।

हम रूपेश की गिरफ्तारी के दिन यानी 17 जुलाई से ही देखें तो 18 जुलाई को उन्हें जब पहली बार जेल में डाला जाता है तब उन्हें 4 संक्रामक रोगियों के साथ रखा जाता है, फिर 2 बार पुलिस रिमांड के बाद दुबारा जेल भेजने से अभी तक उस जर्जर बिल्डिंग में बिल्कुल तन्हा रखा गया है, बाहर निकलने नहीं दिया जा रहा है,एक भी बंदी से मिलने नहीं दिया जा रहा है। कुल मिलाकर एक निर्भीक, साहसी जनपक्षीय पत्रकार को जेल में ही रखने की कोशिश और जेल में मानसिक प्रताड़ना का शिकार बनाया जा रहा है।

जगह बदलने को लेकर वकील द्वारा एक पेटिशन CJM के कोर्ट में 12 अगस्त को लगाया गया जिस पर संज्ञान लेते हुए सीजेम ने मंजू कुमारी ने जगह बदलने व रूपेश की मांगों को मानने का आदेश वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए रूपेश के तथा हमारे वकील के सामने जेल प्रशासन को दिया पर जेल प्रशासन जज की बात को भी तवज्जो के लायक नहीं समझता है, सो आदेश के बाद भी कोई पहल नहीं किया।

इस बाबत 13 अगस्त को पता चला कि जेल के भीतर भ्रष्ट सिस्टम पर न्यायापालिका का भी कोई कंट्रोल नहीं है। रूपेश जी की जगह चेंज करने की बात पर जेल प्रशासन को सीजेएम मंजू कुमारी द्वारा फटकार लगाई गयी थी, जगह चेंज करने का उन्हें सख्त निर्देश दिया गया था, मुलाकात के दौरान रूपेश ने बताया कि , सीजेएम मंजू कुमारी ने उन्हें तुरंत जगह बदलने का निर्देश देते हुए यहां तक कहा कि ” या तो रूपेश जी को सामान्य कैदियों सा रखा जाए या इतने खतरनाक है तो सेंट्रल जेल भेज दिया जाए,” इस आदेश के बाद तो लगा बदलाव ज़रूर होगा क्योंकि कोर्ट के आदेश को न मानना कोर्ट की अवमानना है। कम से कम ये लोग कोर्ट की तो इज्जत करेंगे, मगर फिर भी रूपेश को दूसरी सुरक्षित जगह शिफ्ट नहीं किया गया। कोर्ट के आदेश का भी इनके लिए कोई महत्व नहीं है। सबसे ऊपर ये खुद को ही मानते हैं।

एक पत्रकार को सुरक्षित जगह रखने की बात शायद इन्होंने अपने ताकत पर ले लिया है, इसलिए न ही कोर्ट की, न ही विधायक की, न ही पत्रकार की और न ही वकीलों की बातें ये मान रहे हैं, क्योंकि पत्रकारों ने भी रिपोर्ट द्वारा इस बात को उजागर किया पर कोई असर न पड़ा, बगोदर विधायक विनोद कुमार सिंह द्वारा भी इस विषय पर विधानसभा में आवाज उठाई गई, पर कोई पहल नहीं हुई, वकील द्वारा पेटिशन लगाए गए, सीजेएम द्वारा फटकार लगाई गयी, मगर कोई बदलाव नहीं हुआ।

जेल के अंदर की काली दुनिया को जेल प्रशासन एक पिरामिड में बंद रखना चाहती है जिसके अंदर कोई झांक न सके। यहां यह मेंशन करना भी जरूरी होगा कि मुलाकात की जो व्यवस्था है वह कैदियों के साथ मजाक के अलावा कुछ नहीं है।आप लोहे के रॉड से बने घेरे के सामने खड़े होंगे जहां टेलीफोन लगा है, उस जाली से 7, 8 फीट के बाद एक कमरा है जिसमें शीशा लगा हुआ है पर वह शीशा ऐसा है जिससे चेहरा बड़ी मुश्किल से दिख पाता है, उस टेलीफोन से आप बात कीजिए और आधा-अधूरा चेहरा देखकर समझ लीजिए कि आपने मुलाकात कर ली है। कैदी के रूप में इंसान की जिंदगी को किस तरह बदरंग किया जाता है हम यहां देख सकते हैं, जबकि कितने कैदी ऐसे होंगे जो फर्जी तरीके से फंसाए गए होंगे। जेल की सलाखों के पीछे एक बहुत बड़ी काली दुनिया है जिसे बहुत मजबूत दीवार से जेल प्रशासन ने घेर रखा है। जरूरत है हमें इस दीवार से उधर झांकने की ताकि कैदी के रूप में जिंदगी की इस कुव्यवस्था को थोड़ा सा सुधारा जा सके।

एक ऐसे पत्रकार जो ग्राउंड पर जाकर रिपोर्टिंग कर रहे थे। ऐसे पत्रकार जो आदिवासी मुख्यमंत्री के आने के बावजूद हर तरह का दमन झेल रहे आदिवासियों की की जमीनी हकीकत को तमाम कठिनाइयों के बावजूद सामने लाने का काम रह रहे थे। ऐसे जनपक्षीय पत्रकार के पीछे देश की तमाम एजेंसियां लगा दी गई हैं। जैसे पत्रकारिता के पेशे के साथ न्याय करना, एक पत्रकार के होने की शर्तों को पूरा करना ही अपराध हो। मेनस्ट्रीम मीडिया ऐसी खबरों से हमेशा ही एक दूरी बनाकर चलती है, इसलिए रूपेश कुमार सिंह ने स्वतंत्र पत्रकारिता को चुना क्योंकि हर मीडिया हाउस की अपनी सीमा होती है।

मैं शुरुआत से ही कह रही हूं कि 2019 में रूपेश को डराने के लिए किडनैप और फिर गिरफ्तार किया गया था, पर जेल से निकलने के बाद रूपेश ने पहले से ज्यादा तीखे तेवर के साथ सरकार और प्रशासन की जनविरोधी नीति और कार्यशैली पर सवाल उठाना शुरू किया। और गिरफ्तारी के तुरंत पहले इन्होंने गिरिडीह में कारखानों से निकलती गन्दगी जिससे आस पास के हवा पानी में जहर घुल गया तथा आम लोगों का जीना मुश्किल हो गया है, पर स्टोरी की है।

 इन्होंने एक 11 साल की बच्ची का वीडियो भी शेयर किया था जो प्रदूषण के कारण अजीब सी बीमारी की चपेट में थी, और उसका चेहरा बुरी तरह विकृत हो चुका था। रूपेश इसकी इलाज को लेकर भी प्रयासरत थे।रूपेश किसी न्यूज को लिखे जाने मात्र को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते है बल्कि उस मामले पर क्या कार्रवाई हुई कुछ सकारात्मक हुआ या नहीं, इस पर भी वह लगे रहते हैं। इस बार सत्ता इन्हें एक लंबे समय या कहे कि पूरी जिन्दगी जेल में सड़ा देने की साजिश पर काम कर रही है।

यही वजह है कि एक के बाद एक कर मात्र 24 दिनों के भीतर 3 केस में फंसा चुकी है। जिसमें से एक केस तो NIA देख रही है। यह सब बड़े बड़े पूंजीपतियों के रास्ते से पत्थर हटाने के लिए किया जा रहा है। बड़े-बड़े अपराधी, मंत्री, बिजनेसमैन, उद्योगपति जो देश का पैसा लेकर विदेश भाग जाते हैं, देशवासियों के हित के विरूद्ध कार्य करते हैं पर हमारी जांच एजेंसियों की नजर नहीं पड़ती है। पर एक जमीनी पत्रकार के पीछे तमाम एजेंसियां हाथ पैर धोकर पड़ गई हैं।

जरूरत है इस लड़ाई में आगे खड़े लोगों के साथ खड़े होने की, उन पर हो रहे जुल्म, दमन के खिलाफ आवाज की, एकजुटता की। और सत्ता को खुली चुनौती देने की–‘

  दम है तेरे दमन में कितना देख लिया है, देखेंगे,

  जगह है कितनी जेल में तेरे देख लिया है, देखेंगे।

   (ईप्सा शताक्षी शिक्षिका हैं और आजकल रामगढ़ में रहती हैं।)

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