Wednesday, December 7, 2022

महाविपत्ति की इस बेला में निष्क्रिय क्यों है भारतीय संसद?

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देश भर की सड़कों पर बिखरे दारुण दृश्यों को लेकर ‘सर्वोच्च राजनीतिक मंच’ पर कोई आवाज़ सुनायी नहीं दी है। संसद ने कोरोना की आफ़त से बढ़कर सामने आयी बेरोज़गारी, भुखमरी और जर्जर चिकित्सा तंत्र जैसे मुद्दों पर अपनी चिन्ताएँ बताकर सरकारों को झकझोरा नहीं है। क़रीब 15 करोड़ किसान और 12 करोड़ प्रवासी मज़दूरों की तकलीफ़ों की गूँज भी संसद में नहीं सुनायी दी। जनता के प्रतिनिधियों को मौका नहीं मिला कि वो 45 लाख कर्मचारियों के सचिवालय के मुखिया यानी प्रधानमंत्री को उनकी व्यवस्था का दूसरा पक्ष भी बता सकें, दिखा सकें। संसद नहीं है, तो सरकार से जबाब-तलब करने वाला प्रश्नकाल भी ख़ामोश है।

गोदी मीडिया आपको सिर्फ़ सरकार की बातें बताता है। ये सरकार से जवाब नहीं माँगता, बल्कि अपने सियासी आकाओं के इशारे पर दबे-कुचले विपक्ष को अपने दामन में झाँकने का प्रवचन देता है। ऐसी बातें छुपाई जाती हैं, जिससे सरकार की उलझनें बढ़ने का जोख़िम हो। लॉकडाउन के बावजूद यदि न्यायपालिका, ख़ासकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट, आंशिक रूप से सक्रिय रह सकते हैं, तो संसद को निष्क्रिय रखना लोकतंत्र के लिए बेहद दुःखद और ख़तरनाक है। इसीलिए सरकार को पूरी तकनीक़ों का इस्तेमाल करके यथा-शीघ्र संसद का विशेष कोरोना सत्र ज़रूर बुलाना चाहिए।

हालाँकि, इसकी कोई संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है, क्योंकि संसद के बजट सत्र का आकस्मिक समापन 23 मार्च को हुआ था। संविधान के मुताबिक, साल भर में संसद के तीन सत्र होने अनिवार्य हैं और किन्हीं दो सत्र के बीच छह महीने से अधिक का अन्तराल नहीं होना चाहिए। अभी इस तकनीकी पक्ष के सहारे संसद सत्र को टालना लोकतंत्र की बुनियादी धारणाओं के ख़िलाफ़ है। सरकार को यथा शीघ्र संसद सत्र बुलाना चाहिए और लोकतांत्रिक जवाबदेही के जज़्बे को मज़बूत करने का साहस दिखाना चाहिए।

कोरोना संकट की वजह से भारत आज जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, उसे परखने के लिए हमारी संसद अभी तक आगे नहीं आयी है। जबकि इसी दौरान दुनिया के दर्ज़नों देशों के सांसदों ने अपने आवाम की तकलीफ़ों को लेकर अपनी-अपनी संसद में सरकारों के कामकाज का हिसाब लिया है। इतना ज़रूर है कि लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग की पाबन्दियों को देखते हुए तमाम देशों ने सांसदों की सीमित मौजूदगी वाले संक्षिप्त संसद सत्रों का या वीडियो कान्फ्रेंसिंग वाली तकनीक का सहारा लेकर ‘वर्चुअल सेशन’ का आयोजन किया है। जबकि भारत में सरकार की जवाबदेही को तय करने वाली संसद अभी तक निष्क्रिय ही बनी हुई है। यही हाल इसकी विभिन्न संसदीय समितियों का भी है।

भारत में सरकार ने अभी तक संसद का विशेष कोरोना सत्र बुलाने को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं दिखायी है। हालाँकि, चन्द रोज़ पहले काँग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपने ट्वीट में ब्रिटिश संसद का हवाला देते हुए कहा था यदि वहाँ संसद का ‘वर्चुअल सेशन’ बुलाया जा सकता है तो भारत में क्यों नहीं? इंटरनेशनल पार्लियामेंट्री यूनियन (IPU) एक ऐसी वैश्विक संस्था है जो दुनिया भर के देशों की संसदों के बीच संवाद क़ायम करने का एक माध्यम है। इसकी वेबसाइट पर छोटे-बड़े तमाम देशों की संसदों की ओर से कोरोना महामारी के दौरान हुई या होने वाली गतिविधियों का ब्यौरा है। लेकिन वहाँ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत की संसद से जुड़ा कोई ब्यौरा नहीं है।

भारत में बीते दो महीने से कोरोना से जूझने के लिए जो कुछ भी हो रहा है, उस पर सिर्फ़ नौकरशाही और सरकार की नज़र है। हमारे जनप्रतिविधियों की संसद को इतनी बड़ी मानवीय आफ़त के दौरान पूरी तरह से निष्क्रिय बनाये रखना अफ़सोसनाक है। जबकि हम देख रहे हैं कि देश की बहुत बड़ी आबादी सरकारी कुप्रबन्धन की ज़बरदस्त मार झेल रही है। सरकार को जो उचित और राजनीतिक रूप से उपयोगी लग रहा है, उतना ही हो पा रहा है। जहाँ भारी अव्यवस्था है, संवेदनहीनता है, अमानवीयता है, वहाँ लाचार जनता की आवाज़ उठाने वालों को सत्ता पक्ष में बैठे लोग ‘राजनीति नहीं करने’ की दुहाई देते हैं। हालाँकि, ख़ुद पूरी ताक़त से राजनीति करने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

दरअसल, संसद की तीन प्रमुख भूमिकाएँ है। पहला, इसकी विधायी शक्तियाँ। इससे इसे नये क़ानून बनाने का अधिकार मिलता है। दूसरा, कार्यकारी शक्तियाँ। इससे कार्यपालिका और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है। और तीसरा, सर्वोच्च राजनीतिक मंच। इसके ज़रिये सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों की चर्चा और बहस के रूप में समीक्षा की जाती है और सरकार के पक्ष या विरोध में जनमत तैयार किया जाता है। सामान्य दिनों में तीनों भूमिकाओं में से ‘सर्वोच्च राजनीतिक मंच’ को प्राथमिकता मिलती है, क्योंकि इस भूमिका में विपक्ष सबसे ज़्यादा सक्रिय होता है। कार्यकारी शक्तियाँ हमेशा सरकार की मुट्ठी में रहती है तो विधायी शक्तियों का सीधा सम्बन्ध दलगत शक्ति या पक्ष-विपक्ष के संख्या बल से होता है।

इसीलिए राजनीतिक विमर्श के दौरान संसद में शोर-शराबा और स्थगन वग़ैरह होता है। सरकार सिर्फ़ इन्हें लेकर ही चिन्तित होती है, वर्ना कार्यकारी शक्तियाँ तो हमेशा सरकार की मुट्ठी में रहती हैं। विधायी शक्तियों को लेकर भी सरकार के माथे पर शिक़न नहीं पड़ती, क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध बहुमत या दलगत शक्ति या पक्ष-विपक्ष के संख्या बल से होता है। संसद के निष्क्रिय रहने की वजह से सरकार निरंकुश हो जाती है। भारी बहुमत वाली सरकार तो कई बार संसद को ठेंगे पर रखकर तानाशाही भरा और अदूरदर्शी फ़ैसला भी करने लगती है।

जैसे, पिछले दिनों एक-एक करके छह राज्यों ने धड़ाधड़ ऐलान कर दिया कि वो श्रम क़ानूनों को तीन साल के लिए स्थगित कर रहे हैं। इनमें बीजेपी और काँग्रेस शासित दोनों तरह के राज्य हैं। संविधान ने इन्हें संसद की ओर से बनाये गये क़ानूनों को स्थगित करने का कोई अधिकार नहीं दिया है, लेकिन कोरोना आपदा की आड़ में इन्होंने लक्ष्मण रेखाएँ पार कर लीं। इसी तरह, प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री दोनों ने मिलकर जिस 21 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज़ और आर्थिक सुधार का ऐलान किया उसके लिए संसद की मंज़ूरी लेना बहुत ज़रूरी है। 

सरकार को पता है कि संसद में उसके पास संख्या बल की कोई चुनौती नहीं है, इसीलिए संसद की मंज़ूरी को लेकर उसके माथे पर शिकन तक नहीं है। जबकि संविधान साफ़ कहता है कि सरकार लोक सभा की मंज़ूरी के बग़ैर सरकारी ख़ज़ाने का एक रुपया भी खर्च नहीं कर सकती। बजट के पास होने से सरकार को यही मंज़ूरी मिलती है। इसीलिए अभी कोई नहीं जानता कि 21 लाख करोड़ रुपये के पैकेज़ में से जो 2 लाख करोड़ रुपये असली राहत पर खर्च हुए हैं, वो 23 मार्च को पारित हुए मौजूदा बजटीय खर्चों के अलावा हैं अथवा इसे अन्य मदों के खर्चों में कटौती करके बनाया जाएगा।

साफ़ है कि यदि लॉकडाउन में ढील देकर सरकारी दफ़्तरों को खोला जा सकता है, ट्रेनें चलायी जा सकती हैं, विमान उड़ान भर सकते हैं, तो अपेक्षित एहतियात रखे हुए संसद का सत्र क्यों नहीं बुलाया जा सकता? कोरोना काल में ही भारत ने दुनिया के तमाम देशों की देखा-देखी तरह-तरह के क़दम उठाये हैं, तो संसद का विशेष सत्र बुलाने में विदेशी संसदों की नकल क्यों नहीं की जा सकती? क्योंकि सिर्फ़ संसद ही ऐसी इकलौती जगह है जहाँ नेताओं और मंत्रियों को भाषाई मर्यादाओं का ख़्याल रखते हुए एक-दूसरे की आँखों में आँखें डालकर अपनी बात कहनी होती है। संसद में होने वाली तू-तू, मैं-मैं पूरी तरह से संविधान की आत्मा के अनुरूप है।

(मुकेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं। तीन दशक लम्बे पेशेवर अनुभव के दौरान इन्होंने दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर और मुम्बई स्थित न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। अभी दिल्ली में रहते हैं।)

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