दो नहीं, ‘तीन गुलफ़ामों की तीसरी कसम’

सिनेमा पर गम्भीर किताबें बहुत कम लिखी गई हैं। ख़ासकर हिन्दी में तो यह काम अपवादस्वरूप ही देखने में आता है। ऐसे निराशाजनक माहौल में जब इस तरह की कोई किताब सामने आती है, तो निश्चित तौर पर आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी होती है। ताज्जुब तब और भी ज़्यादा होता है, जब वह किताब सिर्फ़ एक फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ पर केन्द्रित हो। और इस फ़िल्म की कहानी के जन्म से लेकर सेल्युलाइड के पर्दे पर आने तक के सभी मरहले का दिलचस्प ब्यौरा देती हो। बात ‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ की, जिसे लेखक-पत्रकार अनंत ने बड़े दिल-ओ-जान से लिखा है।

किताब को पढ़ते वक़्त उनकी मेहनत, रिसर्च और जुनून साफ़ दिखाई देता है। 240 पेज की यह किताब उन्होंने तक़रीबन ढाई साल में मुकम्मल की है। किताब भी ऐसी कि जैसे आपकी आँखों के सामने एक जीती जागती फ़िल्म चल रही हो। आपसे बातें कर रही हो।

‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ दस अध्यायों ‘अजी मारे गए गुलफ़ाम’, ‘कौन है हिरामन और हीराबाई ?’, ‘फ़िल्मी चौखट पर ‘तीसरी कसम’, ‘इमेज मेकर्स’, ‘रेणु के बोल, शैलेन्द्र के गीत’, ‘फ़िल्मांकन का संघर्षमय सफ़रनामा’, ‘टूटते बिखरते सपनों की दास्तान’, ‘जीता हुआ युद्ध : ‘तीसरी कसम’, ‘हिरामन के सपनों की हीराबाई’ और ‘ऐसे शहीद हुए शैलेन्द्र’ में बँटी हुई है। और हर अध्याय अपने शीर्षक से ही पूरी कहानी बयान कर देता है। लेखक ने इसे बड़े ही क़िस्सा-गोई के अंदाज़ में पेश किया है, जिसे पढ़ने में इसके आग़ाज़ से लेकर अंजाम तक दिलचस्पी बनी रहती है। 

जैसा कि सभी जानते हैं प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र की ऑल टाइम क्लासिक फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ फणीश्वरनाथ रेणु की प्रख्यात कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ पर बनी थी। लेकिन इस कहानी और कहानी के पर्दे पर पहुँचने तक की यात्रा की अंतःकथा बहुत कम लोग जानते हैं। ‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ में लेखक अनंत इसी यात्रा की अंतःकथा की पड़ताल करते हैं। और इस पूरी क़वायद को वे अपनी सांस्कृतिक यात्रा मानते हैं, जो कि है भी। ख़ास तौर पर रेणु की कहानी का जन्म कैसे हुआ और इसके किरदार उन्होंने किस तरह से गढ़े।

ज़ाहिर है यह जानना ही बड़ा दिलचस्प है कि कहानी के अहम किरदार ‘हिरामन’ और ‘हीराबाई’ का सृजन किस तरह से हुआ और क्या ये हक़ीक़ी किरदार थे या किन किरदारों से मुतास्सिर हो कर उन्होंने इनकी रचना की? किताब के दूसरे अध्याय ‘कौन है हिरामन और हीराबाई ?’ में लेखक ने बड़े ही विस्तार से इस राज़ को खोला है। यहीं नहीं इस कहानी में इस्तेमाल भाषा, मुहावरे, संवाद शैली और लोकगीतों की प्रेरणा रेणु को कहाँ से मिली? लेखक ने तमाम संदर्भों के ज़रिए इसका भी अनुसंधान किया है।

मसलन ‘‘जैसा कि रेणु ने कुसुमलाल के सम्बन्ध में लिखा है, ‘और सबसे बड़ी बात है यह है कि वह मेरे आँचलिक शब्दों (कहावतों) का एक जीता-जागता शब्दकोष है-गन्ही महतमा, जमेहरलाल, इनकिलास जिन्दाबाघ, फेनूगिलास, भोंपा आदि शब्द मैंने उसी से प्राप्त किए हैं। पिछली बार आया, तो भूख हड़ताल के लिए एक नया शब्द दिया-खटपासी !’’ (रेणु रचनावली, भाग-5) इससे यह साबित होता है कि रेणु ने ‘हिरामन’ की बोली-भाषा अपने गाड़ीवान कुसुमलाल से ही ग्रहण की थी। 

किताब के तीसरे अध्याय ‘फ़िल्मी चौखट पर ‘तीसरी कसम’’ में कहानी के प्रकाशन, यह कहानी कैसे शैलेन्द्र तक पहुँची और इसे लेकर फ़िल्म बनाने का उनका फ़ैसला सभी कुछ तफ़सील से आता है। लेखक ने यहाँ भी संदर्भों के सहारे सब कुछ इस तरह से बयान किया है कि सारा एपिसोड विश्वसनीय नज़र आता है। ‘इमेज मेकर्स’ अध्याय में इस फ़िल्म प्रोडक्शन कम्पनी की स्थापना किस तरह से हुई और ‘तीसरी कसम’ की टीम कैसे बनी, फ़िल्म के लिए कलाकारों का चयन कैसे हुआ, इसका रोचक विवरण है।

‘रेणु के बोल, शैलेन्द्र के गीत’ अध्याय में लेखक ने बताया है कि ‘‘‘तीसरी कसम’ के अधिकांश गीतों के बोल की उत्पत्ति लोकजीवन के लोकरंग, लोकरस, लोकभाषा, लोक साहित्य, लोकधुन में गाये जाने वाले गीत लोकगीत से हैं। गीतों के बोल रेणु की मूल कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम अर्थात तीसरी कसम’ में चित्रित हैं। शैलेन्द्र ने मूल कहानी में चित्रित गीत के बोल में आगे के अंतरे को जोड़ा है और उसे मूर्त रूप दिया है। इसके अलावा कहानी के सिच्युएशन के अुनरूप कुछ गीतों को शैलेन्द्र ने अपनी ओर से भी जोड़ा है।’’ (पेज-75)

ख़ास तौर पर ‘अजी हाँ मारे गए गुलफ़ाम’, ‘सजनवा बैरी हो गए हमार’, ‘सजन रे झूठ मत बोलो’, ‘लाली लाली डोलिया में लाली रे’ आदि गीतों के बोल रेणु की कहानी से ही लिए गए हैं। ‘फ़िल्मांकन का संघर्षमय सफ़रनामा’ अध्याय से भी पाठकों को कई अहम जानकारियाँ मिलेंगी। मसलन जिस प्रोजेक्ट को छह महीने में पूरा जो जाना चाहिए था, उसे मुकम्मल होने में कैसे छह साल लग गए। जिन लोगों ने भी ‘तीसरी कसम’ देखी है, वे जानते-मानते हैं कि इस फ़िल्म के असल डायरेक्टर कैमरामैन सुब्रत मित्रा हैं। जिन्होंने अपनी शानदार फोटोग्राफ़ी से ‘तीसरी कसम’ के ग्रामीण समाज, देशज संस्कृति और जनजीवन को पर्दे पर ज़िंदा कर दिया।

फ़िल्म के असिस्टेंट डायरेक्टर बी.आर. इशारा ने तो सुब्रत मित्रा को तीसरा हिरामन ही घोषित कर दिया था। जिसमें पहले हिरामन-रेणु थे, तो दूसरे अदाकार राज कपूर। किताब में इसके अलावा और भी कई ऐसे प्रसंग हैं, जिन्हें पढ़कर पाठक कभी आश्चर्यचकित, तो कभी लाजवाब हो जाएंगे। लेखक ने मुख़्तलिफ़ माध्यमों से फ़िल्म से सम्बन्धित ऐसी-ऐसी सामग्री जुटाई है कि उनकी लगन, निष्ठा और दीवानगी का लोहा मानना पड़ता है। 

किताब के आख़िरी अध्याय ‘ऐसे शहीद हुए शैलेन्द्र’ में कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की तरह लेखक अनंत भी इस बात को मानते हैं कि शैलेन्द्र की मौत नहीं हुई थी, बल्कि वे संस्कृति की वेदी पर शहीद हुए थे। इस बात के हक़ में उनकी दलील है, ‘‘‘तीसरी कसम’ फ़िल्म से जुड़े प्रसंग के आलोक में शैलेन्द्र की असमय मृत्यु महज़ मृत्यु नहीं, बल्कि शहादत है। महुआ की शहादत अगर लोकजीवन का क़िस्सा है, तो शैलेन्द्र की शहादत भारतीय हिन्दी सिनेमा का अहम दस्तावेज़। शैलेन्द्र की शहादत को सलामी पेश करती ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म भारतीय हिन्दी सिनेमा के फ़क़ीर द्वारा खींची गयी एक ऐसी लकीर है, जो बौद्धिक समाज के लिए आज भी एक नज़ीर है।

लोकसंस्कृति से सिनेमा तक की यात्रा में शैलेन्द्र ने हिन्दी की साहित्यिक कृति की गरिमा और हिन्दी लेखकों के मान-सम्मान को हिन्दी सिनेमा की परम्परा के विपरीत जाकर स्थापित किया है। शैलेन्द्र की यह सिनेयात्रा हिन्दी सिनेमा में सांस्कृतिक संघर्ष का एक अहम अध्याय है।’’(पेज-187) यह सांस्कृतिक संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ है। साहित्य को सिनेमा के पर्दे पर लाना आज भी सबसे मुश्किल भरा काम है। बाज़ार के अपने उसूल हैं, और वह कोई समझौता नहीं करता। यही वजह है कि कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो जब-जब शैलेन्द्र जैसे फ़िल्म निर्माता या निर्देशकों ने यह कोशिश की, वे नाकामयाब साबित हुए। उन्हें बॉक्स ऑफ़िस पर मुँह की खानी पड़ी। 

‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ का फ्लैप जाने-माने स्क्रिप्ट राइटर कमलेश पांडे ने, तो प्राक्कथन फ़िल्म क्रिटिक विनोद अनुपम ने लिखा है। दोनों ने ही लेखक अनंत के इस काम को काफ़ी एप्रिशिएट किया है। कमलेश पांडे लिखते हैं, ‘‘भारत का फ़िल्म उद्योग कहने को, तो संसार में सबसे बड़ा फ़िल्म उद्योग है, मगर भारतीय फ़िल्मों से सम्बन्धित विस्तृत और गहराई से शोधित, सुलिखित, सारगर्भित किताबें लगभग न के बराबर हैं, जो सिर्फ़ सूचना ही नहीं देती हों, बल्कि पाठक को भारतीय फ़िल्मों को देखने और समझने की एक नयी अंतर्दृष्टि भी देती हों। अनंत की की ‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ इस शून्य को भरने की एक निहायत सफल, सुपाठ्य और संग्रहणीय प्रयास है।’’

वहीं विनोद अनुपम किताब की सराहना दूसरी वजह से करते हैं, और उनकी इस राय से मैं भी इत्तिफ़ाक़ रखता हूँ कि ‘‘पुस्तक में कहीं विश्लेषण का दंभ नहीं दिखता, शब्दों की बाजीगरी नहीं दिखती, कहीं विद्वता और जानकारियों का ढेर आतंकित नहीं करता। कह सकते हैं कि शैलेन्द्र और फणीश्वरनाथ रेणु ने जिस सहजता से ‘तीसरी कसम’ की रचना की थी, अनंत ने भी पूरी तरह उसका निर्वहन किया है।’’ (पेज-8) हिन्दी सिनेमा पर जब भी आप किसी कलावादी साहित्यकार (और वह कवि हो, तो फिर क्या कहने !) या प्रोफ़ेसर का लेखन देखेंगे, तो वह अक्सर इन्हीं सब ‘ख़ूबियों’ से सजा मिलेगा।

सहजता और भाषा की सरलता से उनका कहीं कोई नाता नहीं रहता। कई मर्तबा तो यह होता है कि पाठक उनके लेखन को पढ़कर, गूढ़ पहेली की तरह उसे सुलझाने में लग जाते हैं। दरअसल, लिखते भले ही वे आम पाठक के लिए हों, लेकिन उनका टारगेट एक ख़ास वर्ग को लुभाना भर होता है। यही वजह है कि आम पाठक उनके लेखन से कभी कनेक्ट नहीं होता। और ऐसे लेखन से उन्हें हद दर्जे की वितृष्णा ही होती है। अनंत इस हक़ीक़त को अच्छी तरह से जानते हैं, लिहाज़ा उन्होंने पाठकों के दिल तक पहुँचने के लिए एक आसान राह चुनी और वे इसमें कामयाब भी हुए। ‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ की सबसे बड़ी ख़ासियत किताब की सहज, सरल ज़बान का होना है।  

किताब के आख़िर में विस्तृत संदर्भ सूची के अलावा परिशिष्ट के अंतर्गत रेणु के नाम शैलेन्द्र और संतोष के. ठाकुर (‘इमेज मेकर्स’ के पार्टनर) के पत्र, फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ की पूरी कास्ट और क्रू के नाम, यहाँ तक कि इस फ़िल्म की इनडोर शूटिंग किन स्टूडियो में हुई और किन आउटडोर लोकेशन पर यह फ़िल्म फ़िल्माई गई। फ़िल्म रिलीज होने पर जाने-माने लेखक और कलाकारों ने इस पर अपने क्या मत दिए, फ़िल्म पर रेणु की टिप्पणी और साहित्यकारों से उनकी अपील, फ़िल्म को मिले पुरस्कारों की फ़ेहरिस्त से लेकर ‘तीसरी कसम’ की शूटिंग के समय की तस्वीरें भी शामिल हैं।

‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’, दरअसल दो नहीं, ‘तीन गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ है। और इसमें तीसरे गुलफ़ाम लेखक अनंत हैं, जिन्होंने बड़े ही शिद्दत से ‘तीसरी कसम’ की कहानी को डिस्कवर किया और अपनी लेखनी से सजाया। यही वजह है कि ‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ हिन्दी फ़िल्मों के शैदाइयों और शोधार्थियों दोनों के काम की किताब बन गई है। जिसे उन्हें ज़रूर पढ़ना चाहिए।

आज कई विश्वविद्यालयों में सिनेमा पढ़ाया जाने लगा है, यही नहीं देश में कई ऐसे फ़िल्म संस्थान भी हैं, जो स्टूडेंट्स को एक्टिंग सिखाने से लेकर फ़िल्म मेकिंग तक की ट्रेनिंग प्रदान करते हैं, ज़ाहिर है कि जब ‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ जैसी किताबें आती हैं, तो विश्वविद्यालय और फ़िल्म ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट आदि की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे इन्हें अपने पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल करें। ताकि स्टूडेंट्स इन किताबों से कुछ नया सीख सकें।

‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ ‘कीकट प्रकाशन’, पटना से प्रकाशित हुई है। कवरपेज से लेकर छपाई तक आकर्षक है। अलबत्ता 240 पेज की हार्डबाउंड किताब के दाम 650 रुपए कुछ ज़्यादा ही हैं। अच्छा हो कि किताब पेपरबेक में भी उपलब्ध हो, ताकि आम पाठक तक इसकी पहुँच बन सके। और वे भी ‘दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम’ को पढ़कर इसका लुत्फ़ ले सकें।   

किताब : दो गुलफ़ामों की तीसरी कसम

लेखक : अनंत

प्रकाशक : कीकट प्रकाशन पटना

मूल्य : 650 रुपए

पेज: 240 

(समीक्षक गंभीर सिनेमा और प्रगतिशील साहित्य पर लिखते रहते हैं।)

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