वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की सियासी छवि को लेकर अब तक मैं कोई ठोस राय नहीं बना सका हूं। यों तो वह एक भद्र और समझदार महिला दिखती हैं, मगर अक्सर संसद या संसद के बाहर के उनके बयान उनकी इस छवि की गवाही नहीं देते। यों तो वे कई दशकों से सियासत में हैं मगर अक्सर उनके बयान सियासी तौर पर नासमझी वाले कहे जा सकते हैं। मसलन, प्याज के बढ़े दामों पर प्याज न खाने की बात फ्रांस की क्रांति के दौरान रानी मैरी एंटोनेटे के उस बयान की याद दिलाता है जिसमें उन्होंने रोटी न मिलने की स्थिति में जनता को केक देने की बात कही थी। बहरहाल, बीते सप्ताह निर्मला सीतारमण दो वजहों के चर्चा में रहीं। पहला, बतौर वित्तमंत्री उन्होंने एलान किया कि उनकी सरकार यूपीआई के जरिये एक बार में 2000 रुपये से अधिक की खरीदारी करने पर व्यापारी को 0.4 फीसद का शुल्क अदा करना पड़ेगा।
यानी बतौर ग्राहक अगर आपने किसी व्यापारी को 2000 रुपये का यूपीआई के माध्यम से भुगतान किया तो उस पर व्यापारी को 8 रुपये का शुल्क अदा करना होगा। पहली नजर में यह कहा जा सकता है कि यह शुल्क जनता को नहीं देना पड़ रहा है। मगर जो हो रहा है वह यह कि इस शुल्क को व्यापारी या तो किसी और सेवा के नाम पर या कीमतों में बढ़ोत्तरी करके जनता से ही वसूल रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी का यह सवाल अहम है कि जब नोटबंदी के समय सरकार ने डिजिटल भुगतान व्यवस्था और कैश लेश अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की बात कही थी तब अब उसी भुगतान व्यवस्था पर शुल्क क्यों लगाया जा रहा है। उन्होंने सरकार के इस फैसले को ‘द ग्रेट यूपीआई लूट’ बताया है।
मोदी सरकार के इस फैसले से मेरी यह धारणा और मजबूत ही होती जा रही है कि सरकार सभी अहम आर्थिक फैसले अमेरिका और अमेरिकी पूंजीपतियों के दबाव में लेती रही है। चाहे वह नोटबंदी जैसा फैसला जिसे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ‘ऑर्गेनाइज्ड पल्डंर (संगठित लूट)” कहा था, या फिर जीएसटी लागू करने का फैसला हो। इन दोनों ही फैसलों के जरिये अमेरिकी कंपनियों के निर्देश पर भारत के असंगठित क्षेत्र को तबाह करने की साजिश रची गयी।
मेरा यह भी मानना है कोरोना महामारी के दौरान देश भर में लॉक डॉउन का फैसला भी उसी कड़ी का एक हिस्सा था। यूपीआई से जुड़े सरकार के ताजा फैसले के मद्देनजर गौर करने वाली बात यह है कि भारत में यूपीआई जिन कंपनियों के जरिए होता रहा है वह सभी अमेरिकी कंपनियां हैं। भारत के बाजार में में पेमेंट ऐप्स में फोन पे की हिस्सेदारी 48.9 फीसद, गूगल पे की 37.7, पेटीएम की 8.3 और शेष 3.6 फीसद की हिस्सेदारी है। ये सभी कंपनियां लंबे समय से भारत की शुल्क रहित एमडीआर नीति का विरोध करती रही हैं। कहने की जरूरत नहीं कि यूपीआई से जुड़ी मोदी सरकार के ताजा फैसलों का खामियाजा किन्हें भुगतना होगा और किन्हें इसका लाभ मिलने वाला है।
मगर मोदी सरकार के इस फैसले के बाद वित्तमंत्री ने मुल्क के युवाओं के लिए जो नसीहत पेश की है वह विडंबनापूर्ण है। चेन्नई के दीक्षांत समारोह में उन्होंने युवाओं को उपदेश दिया है, “चाहे आप खुद को जेन जी कहें या जेन अल्फा, हम सभी आपकी बात सुनने को तैयार हैं। लेकिन आपको इस बात पर सोचना चाहिए कि आपके आस-पास क्या हो रहा है, आपकी क्या भूमिका है, और आपके ज़रिए देश के लिए क्या हासिल किया जा सकता है।” इसके अलावा, उन्होंने “छात्रों को घमंड से दूर रहने, विनम्रता बनाए रखने और ज़िंदगी की चुनौतियों का सामना बिना ‘विक्टिमहुड’ (खुद को पीड़ित मानने) की भावना के करने की सलाह दी।”
यह पहला मौका नहीं है जब सत्ता और सत्ता का आनंद ले रहे लोगों की ओर से मुल्क के युवाओं के लिए इस तरह की नसीहत दी गई है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और संघ प्रमुख मोहन भागवत गाहे बगाहे मुल्क के युवाओं के लिए तमाम तरह के उपदेश जारी करते रहे हैं। और साथ ही यह बात भी नई नहीं है कि जब सत्ता में बैठे धूर्त और शातिर लोगों को सत्ता छिन जाने का भय सताने लगता है तो उन्हें पहले देश, देशहित, देशभक्ति, और देशद्रोह जैसे जुमलों का सहारा लेना पड़ता है। विडंबना देखिए कि जो सरकार अपने सभी अहम आर्थिक फैसले अमेरिकी पूंजीपतियों और धन पशु मित्रों को लाभ पहुंचाने के लिए लेती रही हो वह परंपरागत बेशर्मी के साथ मुल्क के युवाओं को देशहित और देशभक्ति पर उपदेश भी जारी करती है।
युवाओं के खुद को पीड़ित न मानने की नसीहत देने से पहले अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए था कि पेपर लीक और बेरोजगारी का सामना कर रही युवा पीढ़ी के पास आखिर खुद को पीड़ित न मानने के अलावा उनकी सरकार ने क्या विकल्प छोड़ा है। और जहां तक घमंड से दूर रहने की बात है तो युवाओं के खिलाफ जंतर-मंतर पर किन लोगों का अहंकार सिर चढ़ कर बोल रहा था, यह भी पूरी दुनिया देख चुकी है। फिलहाल तो खुद वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के फैसले और उनके उपदेश को एक साथ जोड़कर पढ़ें तो उनकी और उनके सरकार की पक्षधरता एक खुला रहस्य है।
(शिवेश गर्ग वरिष्ठ पत्रकार हैं।)