पटना। पटना के कंकड़बाग इलाके में जब आप उस पुराने और जर्जर इमारत के पास से गुज़रते हैं, तो आपको यह यकीन कर पाना मुश्किल हो जाएगा कि यह कोई अस्पताल है। टपकती छत, दरकती दीवारें और अंदर से आती एक सन्नाटे जैसी आवाज़-यह शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है, जहां हर दिन 70 से 80 मरीज पहुंचते हैं।
जर्जर इमारत में जर्जर व्यवस्था
इस केंद्र की हालत ऐसी है कि कभी भी गिर जाए। यह वही इमारत है जहां कभी स्टेट डिस्पेंसरी चला करती थी, जिसे अब इस स्वास्थ्य केंद्र में मर्ज कर दिया गया है। यहाँ केवल एक डॉक्टर—डॉ. राजकुमार चौधरी हैं, जिनके कंधों पर पूरा बोझ है। पाँच नर्सें हैं, लेकिन ज़्यादातर इलाज नर्सों के भरोसे होता है।

कंकड़बाग और अशोक नगर जैसे इलाकों में कोई अन्य सरकारी अस्पताल नहीं होने के कारण यहाँ मरीजों की भीड़ अधिक रहती है। लेकिन यह भीड़ इलाज के लिए नहीं, बल्कि खुद को जोखिम में डालकर जीने की जद्दोजहद में आती है।
कंकड़बाग के रहने वाले तुषार बताते हैं कि “ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति पिछले कई सालों से जर्जर है। हमें वहां जाने में डर लगता है कि कब भवन गिर जाए। हद तो ये है कि शिकायत के बावजूद आज तक कोई काम नहीं हुआ है।”
सरकारी आंकड़ों का सच
स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बिहार में कितनी ख़राब है, इसे समझने के लिए सरकार के खुद के आंकड़े काफ़ी हैं। 2024-25 के बजट में राज्य सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 14,932.09 करोड़ रुपये का प्रावधान किया। पिछले साल यह बजट 16,966 करोड़ रुपये था। लेकिन सवाल यह नहीं है कि बजट कितना है, सवाल यह है कि उसका उपयोग कितना हुआ?
2016 से 2022 के बीच ₹69,790.83 करोड़ का बजट मिला, लेकिन सिर्फ ₹48,047.79 करोड़ खर्च हुआ। यानी ₹21,743.04 करोड़ बिना उपयोग के ही रह गए। सोचिए, अगर यह पैसा इस्तेमाल हो जाता, तो कितने अस्पतालों को संजीवनी मिल सकती थी, कितनी जिंदगियां बचाई जा सकती थीं।

कंकड़बाग के एक स्थानीय निवासी राजीव कुमार कहते हैं, “यहां आकर लगता है जैसे अपनी जान खतरे में डाल दी हो। डॉक्टर मिलते नहीं, बिल्डिंग किसी भी वक्त गिर सकती है, और टेक्नीशियन तक नहीं मिलती। फिर भी क्या करें, निजी अस्पतालों में जाने की औकात नहीं।”
नीति आयोग की रिपोर्ट और बिहार की स्थिति
नीति आयोग के 2023-24 के सतत विकास लक्ष्य (SDG) सूचकांक के मुताबिक, बिहार देश के सबसे निचले पायदान पर है। जहाँ केरल और उत्तराखंड जैसे राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं बिहार सिर्फ़ 57 अंकों के साथ फिसड्डी साबित हो रहा है।
बिहार की स्वास्थ्य स्थिति को एक और नजरिए से समझें- WHO के मुताबिक, हर 1,000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन बिहार में यह अनुपात 1:2,148 है। यानी आधे से ज़्यादा आबादी डॉक्टरों से वंचित है।
कैग रिपोर्ट की पोल खोलती तस्वीर
कैग की रिपोर्ट में साफ़- साफ़ कहा गया है कि बिहार में 49% चिकित्सकों के पद खाली हैं। अस्पतालों में ऑपरेशन थिएटर, ब्लड स्टोरेज यूनिट जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। 68% वेंटिलेटर सिर्फ़ इसलिए अनुपयोगी हैं क्योंकि उन्हें चलाने वाले प्रशिक्षित तकनीशियन ही नहीं हैं।

कंकड़बाग की निवासी सुषमा देवी बताती हैं कि “ सुविधाएं बहुत हैं लेकिन वो मिलती नहीं हैं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो है लेकिन वहां समस्या बहुत सारी है। कभी कोई दवा नहीं मिलती तो कभी अन्य सुविधा प्राप्त नहीं होतीं, न टेक्नीशियन हैं, तो फिर किस तरह से हमारा इलाज होगा?”l
स्वास्थ्य केंद्रों की योजनाएं- सिर्फ़ कागजों पर?
सरकार की योजना है कि स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या को बढ़ाया जाए। वर्तमान में एक लाख की आबादी पर 12 केंद्र हैं, जिसे 15 तक ले जाने का प्रस्ताव है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या 2013 से 2022 तक जस की तस बनी हुई है- 533। सिर्फ़ उपकेंद्रों और अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या में थोड़ा-बहुत इजाफा हुआ है।
आखिर कब बदलेगी तस्वीर?
स्वास्थ्य सेवाएं किसी भी राज्य की रीढ़ होती हैं। जब रीढ़ ही कमज़ोर हो, तो बाकी शरीर कैसे चलेगा? बिहार को सिर्फ़ बजट नहीं, नियोजित क्रियान्वयन चाहिए। उसे सिर्फ़ घोषणाएं नहीं, ज़मीनी बदलाव चाहिए। कंकड़बाग का यह स्वास्थ्य केंद्र एक प्रतीक है इस बात का कि जब सरकारें आंकड़ों और भाषणों में उलझ जाती हैं, तब जनता टूटी हुई छतों के नीचे इलाज कराने को मजबूर हो जाती है।
इस विषय पर जब हमने सिविल सर्जन से बात करने की कोशिश की लेकिन उनसे हमारी बात नहीं हो पाई।
निष्कर्ष
बिहार को बदलने के लिए सबसे पहले उसके स्वास्थ्य ढांचे को मज़बूत करना होगा। सिर्फ़ नई योजनाओं की घोषणा करने से कुछ नहीं होगा। उन्हें लागू करना होगा, धरातल पर लाना होगा। कंकड़बाग की यह तस्वीर सिर्फ़ एक केंद्र की नहीं है, यह पूरे बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत बयां करती है। अब वक्त है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाएं जहां स्वास्थ्य सुविधा किसी का हक हो, लक्जरी नहीं।
(पटना से नाजिश महताब की रिपोर्ट।)