Monday, October 3, 2022

चीफ जस्टिस ने रिटायरमेंट से पहले पेगासस, बिलकीस बानो रिमिशन और पीएमएलए मामले की सुनवाई की

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सोशल मीडिया में आलोचना हो रही थी कि चीफ जस्टिस एनवी रमना 26 अगस्त को रिटायर होने वाले हैं और वे अपने सामने लम्बित महाराष्ट्र संकट, पेगासस, पीएमएलए, बिलकिस केस जैसे मामलों की सुनवाई अधर में छोड़कर जा रहे हैं जो वास्तव में न्याय नहीं अन्याय है लेकिन चीफ जस्टिस ने रिटायरमेंट से ठीक एक दिन पहले यानी आज 25 अगस्त, 2022 को कई हाई प्रोफाइल मामलों की सुनवाई की। चीफ जस्टिस रमना छह अलग-अलग पीठ कॉम्बिनेशन में बैठे हैं और पेगासस, बिलकिस बानो रिमिशन, पीएमएलए जैसे महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई की।

1. पेगासस पर सील्ड कवर में रहेगी दो रिपोर्ट

पेगासस सुप्रीम कोर्ट में है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस हेमा कोहली के साथ चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रमना की पीठ ने किया। पेगासस के जरिए जासूसी के मामले में गुरुवार 25 अगस्त को कोई फैसला नहीं आया। लेकिन एक बात ये सामने आई की सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की जांच कमेटी को मदद नहीं कर रही है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना की बेंच ने गुरुवार को कहा कि समिति ने कहा है कि भारत सरकार सहयोग नहीं कर रही है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि अगली सुनवाई सितंबर के आखिरी हफ्ते में होगी।

एक खास बात ये भी है की सुप्रीम कोर्ट की दो जांच समितियों ने तीन रिपोर्ट अदालत को सौंपी है। लेकिन उनमें से सिर्फ एक ही रिपोर्ट सार्वजनिक करने की बात सुप्रीम कोर्ट ने कही है। यानी बाकी दो तकनीकी रिपोर्टों में क्या है, यह जनता कभी नहीं जान पाएगी। सुप्रीम कोर्ट के गुरुवार के इस निर्देश से पेगासस पर शक अब और बढ़ जाएगा। अदालत को सुप्रीम कोर्ट की जांच कमेटी ने बताया कि 29 फोन की जांच की गई और पांच फोन में मैलवेयर पाया गया, लेकिन इसमें पेगासस स्पाइवेयर था, इसका कोई निर्णायक सबूत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह बात साफ नहीं की है कि आखिर तकनीकी जांच समिति ने अपनी दोनों रिपोर्टों को सार्वजनिक करने से क्यों मना किया है। इसे लेकर अब लोगों के मन में सवाल जरूर उठेंगे कि उनमें ऐसा क्या है जिसका सार्वजनिक किया जाना घातक होगा। बहरहाल, मामले को चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया गया। चार सप्ताह बाद सुनवाई होने पर शायद बेंच भी बदल जाए।

भारत में, समाचार पोर्टल द वायर ने दावा किया था कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत 142 से अधिक लोगों को निशाना बनाया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल की सुरक्षा लैब द्वारा कुछ सेलफोन के फोरेंसिक विश्लेषण ने सुरक्षा उल्लंघन की पुष्टि की थी। इस सूची में कांग्रेस के राहुल गांधी, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर, दो सेवारत केंद्रीय मंत्री, एक पूर्व चुनाव आयुक्त, सुप्रीम कोर्ट के दो रजिस्ट्रार, एक पूर्व जज का पुराना नंबर, एक पूर्व अटॉर्नी जनरल के करीबी सहयोगी और 40 पत्रकार शामिल हैं।

सरकार ने संसद में एक बयान दिया था कि कोई अवैध काम यानी जासूसी नहीं की गई है लेकिन इस मुद्दे पर किसी भी सदन में कोई चर्चा नहीं हुई है। विपक्षी दल बार-बार इस मुद्दे पर चर्चा की मांग कर चुके हैं। लेकिन सरकार ने पेगासस पर चर्चा ही नहीं होने दी।

इस मामले में एडवोकेट एमएल शर्मा, राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास, हिंदू ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन के निदेशक एन राम और एशियानेट के संस्थापक शशि कुमार, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, पत्रकार रूपेश कुमार सिंह, इप्सा शताक्षी, परंजॉय गुहा ठाकुरता, एसएनएम आबिदी और प्रेम शंकर झा ने याचिका दायर की थी।

2. पीएमएलए फैसले के खिलाफ नोटिस जारी

सुप्रीम कोर्ट आज प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) पर अपने पुराने फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने सुनवाई की। 27 जुलाई के उच्चतम न्यायालय के विवादास्पद फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका कार्ति चिदंबरम ने दायर की है। इसमें जस्टिस खानविलकर की अगुवाई वाली पीठ द्वारा जुलाई 2022 के प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी पीएमएलए के फ़ैसले की समीक्षा करने की मांग की गई है ।

पीएमएलए मामले पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। साथ ही चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा है कि यह कानून बहुत अहम है, और हम सिर्फ 2 पहलू को दोबारा विचार लायक मानते हैं। एक तो ईसीआईआर (ईडी की तरफ से दर्ज एफआईआर) की रिपोर्ट आरोपी को न देने का प्रावधान और दूसरा खुद को निर्दोष साबित करने का जिम्मा आरोपी पर होने का प्रावधान।

पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्ट्या धन शोधन निवारण अधिनियम यानी पीएमएलए के प्रावधानों को कायम रखने वाले फ़ैसले के दो पहलुओं पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। तीन न्यायाधीशों की इस पीठ ने अंतरिम सुरक्षा देने के अपने आदेश को भी 4 सप्ताह के लिए बढ़ा दिया।

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि समीक्षा के लिए रिकॉर्ड में साफ़-साफ़ गड़बड़ी होनी चाहिए। और यह एकमात्र अधिनियम नहीं है, बल्कि यह भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुसार है। समीक्षा याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मुद्दे पर पुनर्विचार की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि फैसले में कहा गया है कि पीएमएलए दंडात्मक कानून नहीं है। इस पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है।

जस्टिस खानविलकर की पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारों और प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए ईडी के खिलाफ दायर सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया था। इसने पीएमएलए के सभी कड़े प्रावधानों जिसमें जांच करना, तलाशी लेना, संपत्तियों की कुर्की करना, गिरफ्तार करना और जमानत आदि के प्रावधान हैं, इन्हें बरकरार रखा था। ईडी को गिरफ्तारी का अधिकार है। कोर्ट ने कहा था कि 2018 में कानून में किए गए संशोधन सही हैं।पीठ ने 27 जुलाई को धन शोधन निवारण अधिनियम यानी पीएमएलए के प्रावधानों की वैधता को बरकरार रखा था। फैसले में मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में सख्त जमानत शर्तों को बरकरार रखा गया, जो सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों के विपरीत था।

3.बिलकीस बानो केस में 11 दोषियों की सज़ा माफ़ी पर नोटिस

बिलकीस बानो केस में उम्र कैद की सजा काट रहे 11 दोषियों की रिहाई के मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने की। पीठ ने गुरुवार को बिलकीस बानो मामले में गैंगरेप और हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा पाए 11 दोषियों को समय से पहले रिहा करने की गुजरात सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) एनवी रमना, जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने हालांकि दोषियों को छूट देने पर कानूनी रोक के संबंध में एक प्रश्न रखा। जस्टिस रस्तोगी ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल से पूछा कि क्या सिर्फ इसलिए कि कृत्य भयानक था, क्या यह कहना पर्याप्त है कि छूट गलत है? आजीवन कारावास की सजा के दोषियों को दिन-ब-दिन छूट दी जाती है, इस मामले में अपवाद क्या है ?

जस्टिस रस्तोगी ने कहा कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, उन्हें दोषी ठहराया गया। सवाल यह है कि क्या वे छूट पर विचार करने में उचित हैं। हम केवल तभी चिंतित हैं जब छूट कानून के मानकों में नहीं है। गौरतलब है कि जस्टिस रस्तोगी और जस्टिस विक्रम नाथ उस पीठ का हिस्सा थे जिसने मई, 2022 में फैसला सुनाया था कि मामले में छूट का फैसला करने का अधिकार गुजरात के पास है।

चीफ जस्टिस रमना ने शुरुआत में स्पष्ट किया कि मई, 2022 के आदेश में केवल यह कहा गया कि उस राज्य में लागू होने वाली नीति के संदर्भ में छूट या समय से पहले रिहाई पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैंने कहीं पढ़ा है कि कोर्ट ने छूट की अनुमति दी है। नहीं, कोर्ट ने केवल विचार करने के लिए कहा है। पीठ ने तब मामले में नोटिस जारी किया और याचिकाकर्ताओं को आरोपी व्यक्तियों, प्रभावित पक्ष को प्रतिवादी के रूप में पेश करने का निर्देश दिया।

सुनवाई के दौरान सिब्बल ने मुस्लिम आबादी के पलायन, बलात्कार और हत्याओं की बड़ी घटनाओं आदि से संबंधित मामले के गंभीर तथ्य बताए। हालांकि, पीठ ने सिब्बल को छूट के मुद्दे तक सीमित रखने को कहा।

साल 2002, गुजरात दंगे के दौरान 5 महीने की गर्भवती बिलकीस बानो का रेप हुआ था, साथ ही बिलकीस बानो के परिवार के 14 लोगों की हत्या की गई थी, जिनमें उनकी तीन साल की बच्ची को जमीन पर पटक-पटक कर मार डाला था। लेकिन अभी हाल ही में गुजरात सरकार ने बिलकीस बानो केस के 11 दोषियों की सजा माफ कर उन्हें रिहा कर दिया था। गुजरात सरकार के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

गुजरात सरकार के फैसले के खिलाफ सीपीएम नेता सुभाषिनी अली, स्वतंत्र पत्रकार और फिल्म निर्माता रेवती लौल और लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति और एक्टिविस्ट रूप रेखा वर्मा ने याचिका दायर की है।

पीठ ने इस मामले में अपना जवाब दाखिल करने के लिए गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया और याचिकाकर्ताओं से 11 दोषियों को मामले में पक्ष बनाने के लिए कहा है । मामले की दो हफ्ते बाद फिर सुनवाई होगी । सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि उसे इस बात पर विचार करना है कि क्या गुजरात सरकार ने नियमों के तहत दोषी छूट के हकदार हैं और क्या इस मामले में छूट देते समय दिमाग लगाया गया था । पीठ ने कहा कि हमें यह देखना होगा कि क्या इस मामले में छूट प्रदान करते समय दिमाग का इस्तेमाल किया गया था ।

4. पंजाब में पीएम नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में हुई चूक, एसएसपी दोषी

जनवरी 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पंजाब दौरे पर सुरक्षा में चूक मामले पर चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने सुनवाई की। पीठ ने कहा कि पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुरक्षा उल्लंघन की जांच के लिए गठित एक समिति ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि फिरोजपुर में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में विफल रहे।

पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति के अनुसार, पंजाब के एसएसपी हरमनदीप सिंह हंस, जनवरी 2022 में पंजाब की अपनी यात्रा के दौरान प्रधान मंत्री की सुरक्षा सुनिश्चित करने में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल रहे। चीफ जस्टिस ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि रिपोर्ट सरकार को भेजी जाएगी ताकि वे उस पर कार्रवाई कर सकें। जनवरी 2022 में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की पंजाब यात्रा के दौरान सुरक्षा चूक की जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई भारत के चीफ जस्टिस एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने की।

इससे पहले कोर्ट ने मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा को नियुक्त किया था। यह मुद्दा 5 जनवरी को पंजाब के भटिंडा में एक फ्लाईओवर पर प्रधानमंत्री के फंसने से संबंधित है, जब किसानों के एक समूह ने राजमार्ग को अवरुद्ध कर दिया था। सुनवाई में सीजेआई रमना ने कमेटी की रिपोर्ट पढ़ी, जिसमें कहा गया था कि हरमनदीप सिंह हंस, पंजाब एसएसपी फिरोजपुर अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में विफल रहे, और उनके पास पर्याप्त समय और फोर्स उपलब्ध होने के बावजूद एक्शन लेने में विफल रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, पीएम के प्रवेश करने से पहले, एसएसपी निर्देशों पर कार्रवाई करने में विफल रहे। समिति की रिपोर्ट ने ‘ब्लू बुक’ की आवधिक समीक्षा के लिए एक समिति के गठन की भी सिफारिश की।

चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हेमा कोहली की पीठ ने वकीलों की आवाज नामक एक गैर सरकारी संगठन द्वारा दायर एक जनहित याचिका में आदेश पारित किया था। जांच समिति के गठन के लिए 12 जनवरी को पारित आदेश में, अदालत ने कहा कि प्रश्नों को एकतरफा जांच पर नहीं छोड़ा जा सकता है और न्यायिक रूप से जांच की निगरानी करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के महानिदेशक या उनके नामांकित व्यक्ति जो आईजी के पद से निचले स्तर पर नहीं हैं, केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के पुलिस महानिदेशक, पंजाब के एडीजीपी (सुरक्षा) और पंजाब एंड हरियाणा उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल (जिन्होंने प्रधानमंत्री के दौरे से संबंधित रिकॉर्ड जब्त कर लिया है) समिति के अन्य सदस्य थे।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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