Monday, August 15, 2022

जस्टिस फॉर जज-4: मुंह बंद रखने की कीमत पर पीड़िता, उसके पति और बहनोई की फिर हुयी थी बहाली

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क्या आप इस तथ्य को जानते हैं कि जून 2019 में दिल्ली पुलिस में तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के विरुद्ध यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली नौकरी से बर्खास्त शिकायतकर्ता को सुप्रीम कोर्ट में उसकी नौकरी पर पूरी तनख्वाह के साथ बहाल कर दिया गया था, उस तारीख से ही जिस तारीख से उसको निलंबित किया गया था। शिकायतकर्ता के पति और उसके बहनोई दोनों को फिर से सेवा में बहाल कर दिया था। शिकायत के बाद से ही दोनों ने अपने नौकरी गंवा दी थी। हिंदुस्तान टाइम्स ने खबर दी थी कि शिकायतकर्ता को पहले एक आश्वासन देना पड़ा कि वह आगे इस मामले को नहीं उठाएगी और एक उच्च सरकारी अधिकारी ने उसे आश्वस्त किया कि अगर उसने ऐसा किया तो सारी चीजें दुरुस्त कर दी जाएंगी। शिकायतकर्ता की वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा था कि वह महिला कर्मचारी सही साबित हुई। पिछले पूरे वेतन सहित उसको बहाल किया जाना इस बात की पुष्टि करता है कि उसका हलफनामा सच था, उसने यौन उत्पीड़न झेला और उसे योजनाबद्ध ढंग से शिकार बनाया गया था।

मुख्य न्यायाधीश के रूप में गोगोई का अनुचित व्यवहार उस समय सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व महिला कर्मचारी ने 19 अप्रैल, 2019 को एक हलफनामे के जरिए गोगोई पर यौन उत्पीड़न और यातना का आरोप लगाया। उसने लिखा, “मैं कहती हूं कि मुख्य न्यायाधीश ने अपने पद और हैसियत का दुरुपयोग किया और अपनी ताकत का गलत ढंग से इस्तेमाल करते हुए पुलिस को प्रभावित किया। मुख्य न्यायाधीश के अवांछनीय यौन संकेतों और प्रस्तावों का विरोध करने और इंकार करने की वजह से मुझे और मेरे पूरे परिवार को शिकार बनाया गया।

जस्टिस रंजन गोगोई कितने मासूम हैं कि गलती मानवीय भूल के रूप में स्वीकार कर ली और मान लिया कि सभी विवादों का पटाक्षेप हो गया। जस्टिस रंजन गोगोई शायद भूल गये कि इस घटना के सामने आने के बाद स्वयं उन्होंने इसे बड़ी साजिश, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बेहद, बेहद, बेहद गंभीर ख़तरा और न्यायपालिका को अस्थिर करने का एक बड़ा षड्यंत्र बताया था पर अपनी सफाई में इन गंभीर आरोपों पर कुछ भी नहीं कहा, न ही जस्टिस फॉर जज में ही कोई सफाई दी है।

जस्टिस फॉर जज के विमोचन के मौके पर पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने स्वीकार किया कि उन्हें इस मामले से निपटने वाली पीठ का हिस्सा नहीं होना चाहिए था। बार और बेंच में मेरी 45 साल की कड़ी मेहनत बर्बाद हो रही थी। मैं पीठ का हिस्सा नहीं होता, तो शायद अच्छा होता। हम सभी गलतियां करते हैं। इसे स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं है। जस्टिस गोगोई ने कहा कि यह सब इसलिए हुआ क्योंकि उनकी प्रतिष्ठा पर सवाल उठाया जा रहा था।

एक आंतरिक समिति द्वारा उन्हें बाद में क्लीन चिट के संबंध में जस्टिस गोगई ने कहा कि यह केवल ‘फुल कोर्ट’ के विवेक पर है। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन सभी जजों की सहमति पर समिति का गठन किया गया था। यह एक फैसले द्वारा निर्धारित किया गया है। आंतरिक कार्यवाही दंतहीन नहीं है। दोषी पाए जाने पर न्यायाधीश को पद छोड़ना होता है और राष्ट्रपति महाभियोग को मंजूरी देते हैं।

महिला कर्मचारी की बाद में बहाली पर सफाई देते हुए जस्टिस गोगोई ने कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान हुआ था। महिला ने मानवीय आधार पर उसके मामले पर विचार करने के लिए जस्टिस बोबडे को एक आवेदन दिया था। सभी न्यायाधीश फैसले के पक्षकार थे। उन्होंने कर्मचारी को बहाल किया था। यह मेरी सेवानिवृत्ति के बाद नहीं यह सीजेआई के रूप में मेरे कार्यकाल के दौरान ही हुआ था। बहाली के लिए पत्र न्यायमूर्ति बोबडे के सामने रखा गया था और उन्होंने मुझसे इसे लेकर पूछा था। जस्टिस बोबडे ने उस महिला के साथ-साथ कथित तौर पर अनिल अंबानी का पक्ष लेने के लिए अदालत के आदेश को बदलने पर बर्खास्त किए गए दो अन्य कर्मचारियों को भी बहाल कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व कर्मचारी ने तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों वाला एक शपथ पत्र अप्रैल 2019 में शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों के आवास पर भेजा था। पहली बार में हलफनामा सार्वजनिक होने के बाद गोगोई ने खुद याचिका सुनी और अपने खिलाफ सभी आरोपों को खारिज कर दिया। जिसके बाद मामले को जस्टिस एसके कौल, एएस बोपन्ना और वी रामसुब्रमण्यम की तीन-न्यायाधीशों वाली पीठ को स्थानांतरित किया गया। केस में जस्टिस एसए बोबडे, इंदु मल्होत्रा और इंदिरा बनर्जी की एक इन-हाउस कमेटी का गठन भी किया गया, लेकिन पीड़िता ने पक्षपात का आरोप लगाते हुए पेश होने से साफ इंकार कर दिया।

पूर्व महिला कर्मचारी की शिकायत को समिति द्वारा खारिज किए जाने के दो सप्ताह बाद लोकुर ने समूची कार्यवाही की आलोचना करते हुए इंडियन एक्सप्रेस में लिखा था, “मेरे विचार में 20 अप्रैल की घटना को आप चाहे जिस तरीके से देखें संस्थागत पूर्वाग्रह का फंदा स्पष्ट नजर आता है।“ उनके लेख के अंत में एक गुहार थी, “क्या आंतरिक समिति का कोई सदस्य या सुप्रीम कोर्ट का कोई व्यक्ति मदद करेगा?”

अफसोस है कि सुप्रीम कोर्ट और गोगोई ने इस मामले को जिस तरह निपटाया उसमें इस मानक का पूरी तरह अभाव था। जिसने भी ध्यान दिया होगा, महसूस किया होगा कि अदालती कार्यवाही ऐसी नहीं हुई जो सच तक पहुंच सके।

उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई की न्यायिक और व्यक्तिगत शुचिता का सवाल उठाया था। 23 जनवरी, 2020 को एक ट्वीट में उन्होंने कहा था कि आखिरकार सीजेआई गोगोई द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकार महिला कर्मचारी को उच्चतम न्यायालय द्वारा फिर से बहाल कर दिया गया। पीड़िता के परिवार को भी प्रताड़िता किया गया। ऐसी कोई बुराई नहीं थी जो रंजन गोगोई में नहीं थी और फिर भी ये बदमाश और धृष्ट सीजेआई बन गए। ये हमारी न्यायपालिका के बारे में बताता है।

जब तक विवाद निपटा नहीं तब तक शिकायतकर्ता महिला का उत्पीड़न जारी रहा। दिल्ली की एक अदालत ने पिछले साल सितंबर 20 में शिकायतकर्ता महिला कर्मचारी के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी का मामला बंद करते हुए नगर पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली थी। मामले में शिकायतकर्ता हरियाणा के झज्जर निवासी नवीन कुमार ने कहा था कि याचिका के विरोध में वह नहीं है और वह मामले को नहीं चलाना चाहता है। कुमार द्वारा यहां तिलक मार्ग थाने में शिकायत के बाद महिला के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी और आपराधिक साजिश के कथित आरोपों के लिए पिछले साल तीन मार्च को प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

इसमें एक किरदार वकील उत्सव बैंस थे जिनके द्वारा दायर एक हलफनामे में यह दावा किया गया था कि उन्हें तत्कालीन सीजेआई गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोपों में फंसाने के लिए ‘फिक्सर’ द्वारा 1.5 करोड़ रुपये का ऑफर दिया गया था। अब यह बताने की जिम्मेदारी उत्सव बैंस की थी कि वह ‘फिक्सर’  कौन है, क्या उसने व्यक्तिगत रूप से मिलकर या फोन से ऑफर दिया था? यदि उत्सव बैंस अपने आरोप प्रमाणित नहीं कर सके तो उच्चतम न्यायालय में झूठा हलफनामा दाखिल करके अदालत को गुमराह करने के आरोप में उच्चतम न्यायालय द्वारा उन्हें दंडित क्यों नहीं किया गया? उस समय भी आरोप लगे थे कि पूरे प्रकरण को साजिश की और मोड़कर जस्टिस गोगोई को क्लीन चिट देने का यह प्रकारांतर से प्रयास है। जस्टिस संजय किशन कौल,जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यम की पीठ ने गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों के पीछे “बड़ी साजिश” होने की जांच करने के लिए शुरू की गई स्वतः संज्ञान कार्यवाही को बंद कर दिया था।

यक्ष प्रश्न यह है की फिर बेंच फिक्सिंग का क्या हुआ ,क्या यह चीफ जस्टिस को बचाने के लिए कवरअप आपरेशन था, क्या किसी को बचाने के लिए छद्म के रूप में उछाला गया था, ताकि कोई मुखर विरोध न कर सके?जस्टिस पटनायक की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि कोर्ट और चीफ जस्टिस को बदनाम करने की साजिश में महिला कोर्टकर्मी शामिल नहीं है। जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा था कि न्यायालय हम सब से ऊपर है। अगर उच्चतम न्यायालय में कोई फिक्सिंग रैकेट चल रहा है तो हम इसकी जड़ तक जाएंगे। हम जानना चाहते हैं कि फिक्सर कौन है? बेंच ने आईबी चीफ, दिल्ली पुलिस कमिश्नर और सीबीआई डायरेक्टर को चैम्बर में आकर मिलने के निर्देश दिए थे। गोगोई ने इस पर भी अपनी किताब में कुछ नहीं कहा है।   

यौन उत्पीड़न के आरोपों के सामने आने के बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस गोगोई ने कहा था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बेहद, बेहद, बेहद गंभीर ख़तरा है और यह न्यायपालिका को अस्थिर करने का एक बड़ा षड्यंत्र है।गोगोई ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे उन्हें कुछ अहम सुनवाइयों से रोकने की साज़िश क़रार दिया था।

जस्टिस पटनायक ने बड़ी साजिश के आरोपों की जांच की और कार्य पूरा कर रिपोर्ट को सितंबर 2019 में पेश किया। हालांकि, आज तक, रिपोर्ट से संबंधित कोई भी सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। 

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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