Wednesday, July 6, 2022

स्पेशल रिपोर्ट: ओस चाट कर प्यास बुझाने वाली योजना में तब्दील होती मनरेगा  

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रांची। एक तरफ केंद्र सरकार द्वारा पिछले कई वर्षों से मनरेगा मजदूरी दर में अति अल्प बढ़ोत्तरी की गई है, जो ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। जो इस बात का सबूत है कि केंद्र की मोदी सरकार मनरेगा को धीरे-धीरे ख़त्म करने की ओर बढ़ रही है। वहीं दूसरी तरफ ऐतिहासिक मनरेगा कानून भ्रष्टाचार का केंद्र बना हुआ है। जिससे मनरेगा की अवधारणा और प्रारदर्शिता सवालों के घेरे में है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा / MNREGA) भारत में लागू एक रोजगार गारंटी योजना है, जिसे 7 सितंबर 2005 को विधान द्वारा अधिनियमित किया गया। यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है। जो प्रतिदिन सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-सम्बंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं।

यह योजना 2 फ़रवरी 2006 को 200 जिलों में शुरू की गई, जिसे 2007-2008 में अन्य 130 जिलों में विस्तारित किया गया और 1 अप्रैल 2008 तक अंततः भारत के सभी 593 जिलों में इसे लागू कर दिया गया। इसकी शुरुआत सबसे पहले आंध्र प्रदेश के बांदावाली जिले के अनंतपुर नामक गांव में हुई थी।

बता दें कि नरेगा (राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना) योजना को 2 अक्टूबर 2005 को पारित किया गया था। 31 दिसंबर 2009 को इस योजना के नाम में परिवर्तन करके इसे महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना कर दिया गया।

वैसे तो मनरेगा साल में 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है, इस योजना का सबसे जो महत्वपूर्ण पहलू है वह यह कि इसके 100 दिन का रोजगार की गारंटी में केवल एक परिवार शामिल होता है, एक व्यक्ति नहीं। चाहे उस परिवार में जितने भी वयस्क सदस्य हों, उन सबको मिलाकर 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया जाता है। यानी अगर परिवार में चार वयस्क सदस्य हैं तो एक व्यक्ति को साल में 25 दिन का रोजगार उपलब्ध होता है। 

एक तरह से देखा जाए तो आज यह ओस चाट कर प्यास बुझाने वाली योजना की तरह है। क्योंकि जिस रफ्तार से महंगाई अपनी चरम की ओर बढ़ रही है उस हिसाब से इस योजना को ग्रामीण अकुशल मजदूरों के लिए चू-चू का मुरब्बा ही कहा जा सकता है। बावजूद इसके भीतर भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। जिसका खुलासा पिछले वर्ष झारखण्ड की 1118 पंचायतों में क्रियान्वित मनरेगा की 29,059 योजनाओं के सोशल ऑडिट प्रतिवेदन के अवलोकन से सामने आया है, जिसे हम आगे बताएंगे। 

अभी हम एक नजर देश के तमाम राज्यों में लागू मनरेगा की मजदूरी पर डालते हैं, जिससे इतना पता चल ही जाएगा कि यह योजना आज चू चू का मुरब्बा क्यों है।

आइए देखते हैं देश के सभी राज्यों में केन्द्र सरकार द्वारा लागू मनरेगा की दैनिक मजदूरी की सूची  – 

आंध्र प्रदेश—257.00रु., अरुणाचल प्रदेश—216.00रु., असम—229.00रु., बिहार—210.00रु., छत्तीसगढ़—204.00रु., गोवा—315.00रु., गुजरात—239.00रु., हरियाणा—331.00रु., हिमाचल प्रदेश — गैर-अनुसूचित क्षेत्र-212.00रु., अनुसूचित क्षेत्र-266.00 रु., जम्मू कश्मीर—227.00रु., लद्दाख—227.00रु., झारखंड—210.00रु., कर्नाटक—309.00रु., केरल—311.00रु., मध्य प्रदेश—204.00रु., महाराष्ट्र—256.00रु., मणिपुर—261.00रु., मेघालय—230.00रु., मिजोरम—233.00रु., नागालैंड—216.00रु., ओडिशा—222.00रु. पंजाब—282.00रु., राजस्थान—231.00रु., सिक्किम—222.00रु., सिक्किम (3 ग्राम पंचायतें जिनका नाम ज्ञानथांग, लाचुंग और लाचेन) 333.00रु., तमिलनाडु—281.00रु., तेलंगाना—257.00रु., त्रिपुरा—212.00रु., उत्तर प्रदेश—213.00रु., उत्तराखंड—212.00रु., पश्चिम बंगाल—223.00रु., अण्डमान और निकोबार – अंडमान जिला-292.00रु. एवं निकोबार जिला-308.00रु., दादरा और नागर हवेली तथा दमण और दीव—278.00रु., लक्षद्वीप—284.00रु. एवं पुदुचेरी—281.00रु. हैं।

बता दें कि मनरेगा योजना में प्रति दिन मजदूरी देश में सबसे अधिक सिक्किम के 3 ग्राम पंचायतों ज्ञानथांग, लाचुंग और लाचेन में 333.00रु. है। जबकि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में सबसे कम मजदूरी प्रति दिन 204.00रु. है। 

अब आइए देखते हैं पिछले वर्ष झारखण्ड के 1118 पंचायतों में क्रियान्वित मनरेगा के 29,059 योजनाओं के सोशल ऑडिट रिपोर्ट को –

पिछले वर्ष झारखण्ड की 1118 पंचायतों में क्रियान्वित मनरेगा की 29,059 योजनाओं के सोशल ऑडिट में जो हालात सामने आए हैं, वह मनरेगा और जिस अवधारणा को लेकर इसे लाया गया था सभी के लिहाज से अप्रासंगिक साबित हो रहा है।

ऑडिट योजनाओं में से 36 योजनायें JCB से कराये जाने के स्पष्ट प्रमाण मिले। 

कुल 1,59,608 मजदूरों के नाम से मस्टर रोल (हाजरी शीट) निकाले गए थे उसमें सिर्फ 40,629 वास्तविक मजदूर (25%) ही कार्यरत पाए गए। शेष सारे फर्जी नाम के मस्टर रोल थे। 

1787 मजदूर ऐसे मिले जिनके नाम मस्टर रोल में थे ही नहीं।  85 योजनायें ऐसी मिलीं जिनमें कोई मस्टर रोल सृजित ही नहीं किया गया था, परन्तु काम शुरू कर दिया गया था। 376 मजदूर ऐसे मिले जिनका जॉब कार्ड बना ही नहीं था। 

पूर्व के वर्षों में भी सोशल ऑडिट के माध्यम से करीब 94 हजार विभिन्न तरह की शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं, जिसमें करीब 54 करोड़ राशि गबन की पुष्टि हो चुकी है। उन पर भी सरकारी अधिकारी कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं। राज्य भर में शिकायत निवारण प्रक्रिया पूरी तरह फेल है।  

राज्य में मनरेगा के तहत संचालित योजनाओं में केवल 54 करोड़ की वित्तीय गड़बड़ी का मामला नहीं है, यदि मनरेगा के MIS के आंकड़ों को देखें तो स्पष्ट है कि वित्तीय वर्ष 2017-18, 18-19 और 19-20 में कुल मिलाकर एक बार ही सोशल ऑडिट हो पाया है, इससे यह स्पष्ट है कि यदि तीन सालों में हर वर्ष सभी पंचायतों का सोशल ऑडिट किया गया होता तो यह राशि तीन गुना यानि कि 160 करोड़ की होती, साथ ही यह भी दिखाई देता है कि 13% योजनाओं का रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं कराया गया जिसकी वजह से ऐसी योजनाओं का ऑडिट नहीं हो पाया। वित्तीय वर्ष 2020-21 के आंकड़े पूरी तरह अपलोड नहीं हैं।

पर यदि समवर्ती सोशल ऑडिट की रिपोर्ट जो जारी हुई है, उस पर ध्यान दिया जाय तो सिर्फ 25% मजदूर कार्यस्थल पर काम करते मिले जिसका अर्थ है कि 75% राशि का विचलन सिर्फ मजदूरी भुगतान में हुआ है। जो प्रति वर्ष करीब 1500 -1600 करोड़ के करीब होता है, अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यदि पिछले दो सालों में हर वर्ष प्रत्येक पंचायत का एक बार नियमित सोशल ऑडिट होता तो यह वित्तीय हेराफेरी इन दो सालों में ही शायद करोड़ों में सामने आती। मनरेगा में मशीन का प्रयोग और ठेकेदारी व्यवस्था जो कानूनन वर्जित है, आज झारखण्ड की जमीनी हकीकत बन गई है।

मनरेगा मजदूरों के द्वारा नहीं बल्कि जॉब कार्ड सूची के आधार पर ठेकेदार और बिचौलिए सीधे कम्प्यूटर ऑपरेटर से मिलकर काम की मांग कर रहे हैं। ठेकेदार और बिचौलिए अधिकांश वैसे मजदूरों का काम कर रहे हैं जो उनके करीबी हैं या फिर जिनको आसानी से बेवकूफ बनाकर या थोड़े पैसे का लालच देकर मजदूरी राशि निकासी कराई जा सकती है। कोविड महामारी में आपदा को अवसर का लाभ उठाते हुए मजदूरों के परिवार के आधार पर नहीं परन्तु व्यक्तिगत जॉब कार्ड बनवा लिया गया है। कई ऐसे भी व्यक्तिगत जॉब कार्ड बनवा लिए गए हैं जिनकी आयु 18 वर्ष से कम है।

बगैर ग्राम सभा की जानकारी और प्रस्ताव के ठेकेदार मनरेगा योजनाओं की फ़ाइल लेकर अधिकारियों/कर्मियों के साथ साठ-गांठ कर उनकी स्वीकृति करवा रहे हैं। मिट्टी, मोरम, सड़क निर्माण, डोभा निर्माण और TCB जैसी योजनाओं को JCB से कराने के उपरान्त कुछ दिनों के लिए मजदूरों से काम कराते हैं जिससे कि मशीन निर्मित कार्य निशान को मिटाया जा सके और मजदूरों की सहानुभति भी ठेकेदार बटोर सकें। प्रज्ञा केंद्र संचालक या मोबाइल बैंकिंग के जरिये ठेकेदार मजदूरों के घरों तक पहुंचकर अंगूठे के निशान लगवा ले रहे हैं। सोशल ऑडिट जैसी प्रक्रिया में ग्राम सभाओं में भी ठेकेदार हावी हैं और मुद्दों को स्थापित नहीं होने दे रहे हैं।

वहीं दूसरी तरफ जब हम श्रमिकों के मजदूरी भुगतान की स्थिति पर नजर डालते हैं तो झारखण्ड में इस वित्तीय वर्ष के प्रारंभ में ही 2 महीनों तक मजदूरों का भुगतान करीब 2,662 करोड़ रुपया लंबित रखा गया। मनरेगा मजदूरों के लिए साल के यही उपयुक्त महीने होते हैं, जब वे सालभर के अपने हिस्से की अधिक से अधिक मजदूरी कर लेना चाहते हैं। लेकिन सरकारों ने मजदूरों को समय पर मजदूरी न देकर खासा निराश किया और कोविड जैसे संकटकालीन परिस्थिति में मजदूरों को अपने हाल पर छोड़ दिया। अक्टूबर और नवम्बर महीने में भी तकरीबन 176.6 करोड़ रूपये झारखण्ड के मनरेगा मजदूरों का मजदूरी भुगतान लंबित रखा गया था। आज राज्य के लाखों मजदूरों की मजदूरी विगत दिसम्बर महीने से कुल 434.14 करोड़ रुपये बकाया है। यह परिस्थिति मजदूरों को काफी थका देने और निराश करने वाली हो रही है जिसके लिए सरकारें खुद जिम्मेवार हैं। 

मई 2021 में Libtech नामक एक स्वतंत्र एजेंसी ने अपने विश्लेषण अध्ययन में पाया कि राज्य में stage 2 लेबल पर मजदूरी भुगतान में औसतन 26 दिनों की देरी की गई है। stage 2, मजदूरी भुगतान प्रक्रिया में पूरी तरह केन्द्रीय सरकार की जवाबदेही होती है। लेकिन मनरेगा वेबसाइट में बेहद चालाकी से इस प्रकार की देरी को सार्वजनिक नहीं की जाती है। बल्कि सरकारी वेबसाइट 100% भुगतान 15 दिनों के अन्दर कर दिए जाने का भ्रामक दावा करती है, जो मजदूरों के कलेजे पर भारी पत्थर मारने के समान है।

यही कारण है कि साल दर साल आदिवासी परिवारों का मनरेगा में भागीदारी घटी है। मतलब मजदूरों में मनरेगा के प्रति अनिश्चितता का माहौल पैदा हो रहा है। सरकार अपने एमआईएस में जो सूचनाएं संधारित करती है, वही इन तथ्यों की पुष्टि भी करते हैं। झारखण्ड में आदिवासी परिवारों की मनरेगा रोजगार में भागीदारी के आंकड़े इसका एक नमूना मात्र हैं। जहां वित्तीय वर्ष 2015-16 आदिवासी मजदूरों का मनरेगा रोजगार में योगदान 38.95 फीसदी था। वहीं पिछले 6 सालों से लगातार घटते हुए इस वर्ष अब तक सिर्फ 23.69 तक के न्यूनतम स्तर पर आ गया है। गिरावट का एक दूसरा कारण मनरेगा योजनाओं में व्यापक भ्रष्टाचार भी है। 

सरकारों ने मनरेगा मजदूरों और ग्राम सभाओं को यहीं तक यातना देना नहीं छोड़ा है, बल्कि उनको हकों से वंचित रखने का हर वो हथकंडा अपना रही है, जो वो कर सकती है। क़ानूनी प्रावधान में जवाबदेही और पारदर्शिता का स्पष्ट प्रावधान होते हुए भी फरवरी 2020 से सोशल ऑडिट की प्रक्रिया को बंद कर रखा है। राज्य के सभी जिलों में मनरेगा लोकपालों की नियुक्ति विगत 5 सालों से लंबित है। कोविड-19 का बहाना बनाकर ग्राम सभाओं से योजना चयन, श्रम बजट का निर्धारण जो कि क़ानूनी प्रक्रिया है, बंद कर दी गई है। आम नागरिकों और मजदूरों के मार्फ़त यदा-कदा अनियमितताओं पर शिकायतें दर्ज करने की कोशिशें की जाती रही हैं। लेकिन विभागीय अधिकारी उल्टा शिकायतों को ही झूठा साबित करने में पूरी ताकत लगा देते हैं। सोशल ऑडिट की नीतियों पर फैसले लेने के लिए जो संचालन समिति बनी है उसकी बैठक जब से नई सरकार आई है तब से नहीं की गई है। इसी प्रकार राज्य रोजगार गारंटी परिषद की आखिरी बैठक पिछले साल फ़रवरी में हुई थी। 2017 और 2021 की बैठकों में लिए गए निर्णयों पर भी सरकार अमल नहीं कर रही है।

बताना लाज़मी होगा कि 16 साल पूर्व देश के मजदूर संगठनों के दीर्घकालीन सघर्ष के बाद देश में ऐतिहासिक मनरेगा कानून लागू हुआ। जिसमें प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में न्यूनतम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी की गई है। आज देश में 12.30 करोड़ परिवार इस कानून के अंतर्गत संचालित योजना में पंजीकृत हैं।

झारखण्ड जैसे कई अन्य पिछड़े राज्यों के लिए यह कानून कई मायने में वरदान साबित हो रहा था।  प्रथम लॉकडाउन के ठीक पूर्व राज्य में 48.87 लाख परिवार पंजीकृत थे। इसके ठीक एक वर्ष बाद 02 फरवरी 2021 को जब देश में कोरोना की दूसरी लहर दस्तक दे रही थी। तब तक पंजीकृत परिवारों का यह आंकड़ा 62.80 लाख हो गया। क्योंकि लॉकडाउन अवधि में देश के विभिन्न हिस्सों में राज्य से पलायन किये अप्रवासी मजदूर वापस इस उम्मीद में कि आकर अब अपने ही राज्य में मेहनत मजदूरी करेंगे। करीब 13.93 लाख नए परिवारों ने जॉब कार्ड बनवाया। आज की तारीख में बढ़ते हुए यह संख्या कुल 69.19 लाख हो गई है। जिसमें 1 करोड़ 13 लाख व्यक्ति शामिल हैं।

लेकिन दूसरी तरफ पिछले तीन वित्तीय वर्षों के बजटीय राशि का आवंटन और क्रियान्वयन पर हम नजर डालते हैं तो तस्वीर हमें बेहद निराश करती है। वित्तीय वर्ष 2019-20 में केन्द्रीय आवंटन 1,311 करोड़ था, जिसके विरुद्ध राज्य ने कुल 1,700 करोड़ खर्च किये। वहीं कोविड-19 के गंभीर प्रभाव वाले वर्ष अर्थात 2020-21 में 3,489 करोड़ रूपये केंद्र सरकार ने रिलीज किया था और इस वर्ष कुल 3,150 करोड़ रूपये खर्च किये गए। वर्तमान वित्तीय वर्ष में अब तक 2,278 करोड़ रिलीज किया जा चुका है, लेकिन इसके विपरीत खर्च 2664 करोड़ हो चुके हैं। 

वित्तीय वर्ष 2019-20 में 700 करोड़ प्रस्तावित श्रम बजट के विरुद्ध  641 करोड़ मानव दिवस सृजित किये गए। पिछले वर्ष यह आंकड़ा रिकार्ड 1,150 करोड़ श्रम बजट निर्धारण के विरुद्ध 1, 176 करोड़ मानव दिवस का सृजन हुआ। इस वित्तीय वर्ष में जबकि दोनों केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों को इस बात का आकलन करना चाहिए था कि पिछले वर्षों के मुकाबले करीब 20.32 लाख परिवारों ने मनरेगा में पंजीयन कराया है तो जाहिर सी बात है काम की मांग बढ़ेगी। इस बात की सम्भावना होते हुए भी सरकारों ने सीमित श्रम बजट का निर्धारण कर मजदूरों द्वारा काम की मांग को अप्रत्यक्ष तौर पर रोका। वित्तीय वर्ष 2021-22 में झारखण्ड के लिए सिर्फ 800 करोड़ श्रम बजट की स्वीकृति मिली थी। फिर दिसम्बर में आंशिक संशोधन करते हुए 900 करोड़ तक ले जाया गया है।

बता दें कि भले ही झारखंड की जनता रघुवर दास सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ हेमंत सोरेन को झारखंड की बागडोर सौंपी है लेकिन यह अब साबित होने लगा है कि सत्ता का चरित्र सबका एक जैसा है। राज्य की हेमंत सोरेन सरकार का मजदूर विरोधी चेहरा जनता के सामने आता दिखाई देने लगा है। मनरेगा मजदूर आन्दोलन का रुख अख्तियार करने का मूड बना रहे हैं। मजदूरों की नाराजगी की मुख्य वजह केंद्र सरकार द्वारा विगत 28 मार्च को वित्तीय वर्ष 2022 -23 के लिए जारी मनरेगा मजदूरी बढ़ोत्तरी से सम्बंधित अधिसूचना है। जिसमें केंद्र सरकार ने झारखण्ड के लिए मजदूरी दर 210 रूपये प्रतिदिन निर्धारित कर दी है। केंद्र की सरकार ने मजदूरी बढ़ोत्तरी के मामले में झारखण्ड को सबसे निचले पायदान से महज एक अंक ऊपर दूसरे स्थान पर रखा है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में देश भर के विभिन्न राज्यों में सबसे कम मजदूरी छत्तीसगढ़ में महज 204 रूपये केंद्र सरकार ने निर्धारित की है, जहां कांग्रेस की सरकार है। लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने पहले से ही राज्य के मनरेगा मजदूरों को अपने राज्य मद से 50 दिन अतिरिक्त रोजगार की गारंटी देकर अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन का परिचय दिया है।  

इधर झारखण्ड की हेमन्त सरकार सत्ता में आने के पूर्व मनरेगा मजदूरों के मुद्दों को लेकर काफी गंभीरता दिखा रही थी। मजदूरों ने उन पर पूर्ण भरोसा जताते हुए वोट देकर राज्य की बागडोर संभालने की संवैधानिक जिम्मेवारी सौंपी। 2020 के कोरोना त्रासदी में अप्रवासी मजदूरों को झारखण्ड लाने में सरकार ने देश में बेहतरीन कार्य किया। सत्ता संभालने के एक वर्ष पूरा होने के अवसर पर मनरेगा मजदूरों को सौगात की घोषणा करते हुए उन्होंने राज्य के मजदूरों को 225 रूपये मजदूरी देने की बात कही। वित्तीय वर्ष 2021-22 में मनरेगा मजदूरों को 225 रुपये दैनिक मजदूरी का भुगतान भी किया गया। राज्य के मजदूर ये उम्मीद लगाये बैठे थे कि सरकार अपने मजदूरों को राज्य मद से प्रतिकार्य दिवस मजदूरी बढ़ोत्तरी न ही सही लेकिन जो 27 रूपये देना प्रारम्भ की है, कम से कम उसे अवश्य वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए जारी रखेगी। लेकिन राज्य सरकार ने साल के अंतिम दिन 31 मार्च को राज्य की मनरेगा मजदूरी बढ़ाने सम्बन्धी जो अधिसूचना जारी की है, जिसमें इस वित्तीय वर्ष में भी दैनिक मजदूरी 225 रूपये रखी गयी। इससे साफ जाहिर होता है कि सरकार मनरेगा मजदूरी में 12 रु0 प्रति मानव दिवस की कटौती कर राज्य के 1 करोड़ 13 लाख 74 हजार मजदूरों को पूर्णत: निराश कर दिया है।

मजदूर विरोधी राज्य सरकार के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जाने माने सामाजिक से सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व राज्य सलाहकार सदस्य बलराम ने कहा है कि केंद्र का झारखण्ड के प्रति सौतेलापन जगजाहिर है, लेकिन राज्य सरकार को चाहिए था कि अपने मजदूरों जिसमें भूमिहीन, आदिम जनजाति, दलित आदिवासी, महिलाएं वृहद् पैमाने पर शामिल हैं, उनको अधिकाधिक राज्य के अन्दर ही सम्मान जनक मजदूरी दे सकती है। इसमें राज्य सरकार को बहुत अधिक वित्तीय बोझ भी नहीं उठाना पड़ेगा। आखिर मनरेगा योजनाओं से राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ही मजबूती मिल रही है और ग्रामीण अधोसंरचनाओं का व्यापक पैमाने पर निर्माण हो रहा है। मजदूर विरोधी नीतियों से जनता सड़कों पर उतरने को विवश होगी। जल्द ही आन्दोलन को लेकर आगे की रणनीति तय की जाएगी।

इधर मनरेगा कानून के आर्किटेक्ट कहे जाने वाले ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री ज्याँ द्रेज ने कहा है कि पिछले साल, 2021-22 में, राज्य में मनरेगा मजदूरी दर 225 रु0 प्रति दिन थी। इसमें 198 रु0 केंद्र सरकार द्वारा दिया जा रहा था और राज्य सरकार का अंशदान 27 रु0 था। केंद्र सरकार ने इस वर्ष झारखंड के मजदूरी दर में केवल 12 रु0 की बढ़ोत्तरी कर इसे 210 रु0 प्रति दिन किया है। केंद्र सरकार द्वारा पिछले कई वर्षों से मनरेगा मजदूरी दर में अति अल्प बढ़ोत्तरी की जा रही है। इससे मनरेगा को धीरे-धीरे ख़त्म करने की केंद्र सरकार की मंशा उजागर होती है।

द्रेज ने आगे कहा है कि 2021-22 में राज्य में मनरेगा में लगभग 11.50 करोड़ मानव-दिवस रोज़गार सृजित हुआ था। 27 रु0 प्रति दिन के हिसाब से राज्य सरकार ने मजदूरी भुगतान में अपनी राशि से 300 करोड़ रु0 खर्च किया था। अगर इस वर्ष भी पिछले साल जैसा ही रोज़गार सृजन हो और राज्य सरकार अपने अंशदान को 27 रु0 से बढ़ाकर 40 रु0 प्रति दिन करे, तो राज्य सरकार को इस वर्ष लगभग 460 रु0 करोड़ खर्च करना होगा। किसी भी हालत में राज्य सरकार को केंद्र द्वारा मनरेगा मज़दूरी दर में किये गए 12 रु0 प्रति दिन की बढ़ोत्तरी को अपने तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। यह पैसा मनरेगा मज़दूरों का है और न कि राज्य सरकार का।

इस बाबत नरेगा वॉच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज कहते हैं कि झारखंड नरेगा वॉच वैसे तो सातवें वेतन आयोग के अनुशंसा के आधार पर 600 रूपये दैनिक मजदूरी की मांग पर प्रतिबद्ध है, लेकिन तात्कालिक तौर पर राज्य अंशदान को 27 रु0 से बढ़ाकर 40 रु0 किये जाने की मांग करता है। ताकि मनरेगा मज़दूरी दर 225 रु0 प्रति दिन से बढ़कर 250 रु0 हो सके। यह मांग अपने में ही काफी सीमित है, यदि इसे खेतिहर मजदूरों के न्यूनतम मज़दूरी दर (315 रु0 प्रति दिन) के साथ तुलना किया जाए। 2023-24 से केंद्र व राज्य सरकार को मिलकर सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी मनरेगा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दर मिले।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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