Saturday, August 13, 2022

जस्टिस फॉर जज-1: जितनी सफाई देंगे उतने ही ज्यादा विवादों से घिरेंगे गोगोई साहब

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अपने निजी जीवन और पेशेवर कारणों से विवादों में रह चुके पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई अपने संस्मरण ‘जस्टिस फॉर जज’ को लेकर एक बार फिर विवादों में घिर गये हैं। जस्टिस गोगोई ने इस किताब में अपने से जुड़े विवादों को लेकर सफाई दी है जिससे और नये सवाल खड़े हो गये हैं। जस्टिस गोगोई के विवादों से जुड़े सभी पात्र जीवित हैं और सभी का विवादों को लेकर अपना अपना वर्जन है। जस्टिस गोगोई ने सभी मामलों में अपने को पाक-साफ प्रदर्शित करने की कोशिश की है जबकि तथ्य इसके विपरीत हैं।  

दरअसल जबसे वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा साल 2009 में तहलका पत्रिका को दिए एक इंटरव्यू को लेकर उन पर अवमानना कार्यवाही चल रही है, जिसमें भूषण ने कथित तौर पर ये आरोप लगाया था कि पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में से कम से कम आधे भ्रष्ट थे तब से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ऐसा मानते हैं कि उनके आचरण पर किसी की निगाह है।यही नहीं रही सही कसर, 27 जून, 20 को किए गये एक एक ट्वीट ने पूरी कर दी जिसमें प्रशांत भूषण ने 4 पूर्व चीफ जस्टिस को लोकतंत्र के हत्या में हिस्सेदार बताया था। 29 जून को उन्होंने बाइक पर बैठे वर्तमान चीफ जस्टिस एस ए बोबडे की तस्वीर पर ट्वीट किया था कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे आम लोगों के लिए बंद कर दिए हैं। खुद बीजेपी नेता की 50 लाख की बाइक की सवारी कर रहे हैं। कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट 1971 की धारा 2(c)(i) के तहत लोगों की नज़र में न्यायपालिका के सम्मान को गिराने वाला बयान अवमानना के दायरे में आता है। ऐसे में कोर्ट ने मामले पर संज्ञान लेते हुए भूषण को नोटिस जारी कर दिया और एक रूपये के अर्थदंड की सांकेतिक सजा भी दी।

दो ट्वीट के चलते सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के दोषी करार दिए गए वकील प्रशांत भूषण ने माफी मांगने से मना कर दिया था। जजों के बारे में 2 विवादित ट्वीट करने वाले प्रशांत भूषण को कोर्ट ने बिना शर्त माफी मांगने के लिए 24 अगस्त तक का समय दिया था। लेकिन उन्होंने लिखित जवाब दाखिल कर कहा था कि मुझे नहीं लगता कि दोनों ट्वीट के लिए माफी मांगने की जरूरत है। इसके बाद से ऐसा लगता है कि कुछ लोग सिजोफ्रेनिया जैसी मानसिकता से ग्रस्त हो गये हैं और उन्हें लगता है कोई उनका अनिष्ट चाहता है ,कोई उनके पीछे लगा है ,कोई उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रहा है।पब्लिक डोमेन में जब उनके न्यायिक आचरण और संविधान से इतर दिए गये निर्णयों की आलोचना होती है तो वे उसे व्यक्तिगत निंदा मानकर आचरण करने लगते हैं।

जस्टिस रंजन गोगोई ने अपनी आत्मकथा ‘जस्टिस फॉर जज’ में लिखा है कि एक समूह ने उन्हें निशाने पर लिया और अनुचित तरीके से उन पर हमले किए, हालांकि उन्होंने इस समूह का नाम नहीं लिया था। उन्होंने कहा कि वे लोग किसी जज के कार्यकाल ख़त्म होने पर रिपोर्ट कार्ड जारी करते हैं। इस रिपोर्ट कार्ड की कीमत अदा करनी होती है।जस्टिस गोगोई ने इस बारे में कहा है कि यदि आप एक ख़ास किस्म के विचार से सहमत नहीं होते हैं और वैसा ही आचरण नहीं करते हैं तो आप पर यह आरोप लगेगा कि आपने समझौता कर लिया और न्यायपालिका व उसकी आज़ादी को तिलांजलि दे दी।

जस्टिस गोगोई ने यह भी कहा कि “यह समूह दिन प्रतिदिन मजबूत होता जा रहा है और यह न्यायपालिका के संस्थान के लिए असली ख़तरा  है। उन्होंने यह सवाल भी किया कि क्या जज उस समय भी चुप रहें जब उन पर गोलियाँ चलाई जा रहीं हों?

अब जस्टिस गोगोई के इस अरण्यरोदन से यह तो पता चलता है कि उनका इशारा किसकी ओर है पर यह नहीं पता चलता कि इस समूह में उच्चतम न्यायालय के जज रह चुके कुछ पूर्व न्यायाधीश भी शामिल हैं?

इसमें सबसे मुखर नाम जस्टिस गोगोई से वरिष्ठ रहे जस्टिस मारकंडे काटजू का है,जो रंजन गोगोई और एसए बोबडे के कटु आलोचक माने जाते हैं।

सितम्बर 2016 में जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने भारतीय न्यायपालिका की सबसे ऊपरी सीढ़ी, मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जजों पर तीखा हमला बोला था।सुप्रीमकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की बौद्धिक क्षमताओं की तीखी आलोचना की है। एक फेसबुक पोस्ट में काटजू ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की बौद्धिक क्षमता पर सवाल उठाते हुए लिखा कि मौजूदा दौर में सुप्रीम कोर्ट के ज्यादातर जजों का बौद्धिक स्तर काफी कम है। काटजू ने यह आरोप भी लगाया था कि उच्चतम न्यायालय के ज्यादातर वर्तमान जज अपनी योग्यता के कारण नहीं, बल्कि वरिष्ठता के नियम के कारण इतने ऊंचे पद पर पहुंचे हैं।

काटजू ने लिखा था कि चीफ जस्टिस  बनने की लाइन में खड़े जस्टिस दीपक मिश्रा बहुत कम उम्र में ही ओडिशा हाईकोर्ट के जज बन गए थे। ऐसा उनके रिश्तेदार और पूर्व चीफ जस्टिस  जस्टिस रंगनाथ मिश्रा के प्रभाव के कारण हुआ था। रंगनाथ मिश्रा भारत के सबसे भ्रष्ट जजों में से एक थे। जस्टिस रमना भी चीफ जस्टिस बनने की पंक्ति में हैं। राजनैतिक संपर्कों के कारण वह भी काफी कम उम्र में ही आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के जज बन गए। बाद में वह सुप्रीम कोर्ट के जज बन गए। ऐसा उनकी योग्यता के कारण नहीं, बल्कि वरिष्ठता के कारण हुआ।

काटजू ने अपनी पोस्ट की शुरुआत करते हुए लिखा था कि अब समय आ गया है कि भारतीयों को सुप्रीम कोर्ट के ज्यादातर जजों के मानसिक स्तर और बैकग्राउंड के बारे में बताया जाए। उन्होंने लिखा है, ‘जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस नरीमन जैसे कुछ जज हैं जो कि अपने बौद्धिक स्तर और चरित्र दोनों ही मामलों में बहुत ऊपर हैं, लेकिन इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के ज्यादातर जजों का मानसिक स्तर बहुत कम है। मैं ऐसा इसलिए कह सकता हूं कि मैं खुद करीब साढ़े 5 साल तक सुप्रीम कोर्ट का जज था और इस दौरान मैं लगातार अपने सहकर्मियों के साथ बातचीत किया करता था’।

काटजू ने लिखा था कि उच्चतम न्यायालय के जज ज्यादातर क्रिकेट और मौसम के बारे में बात किया करते थे। उनका आरोप है कि इन जजों की बातचीत में कभी बौद्धिक मसलों का जिक्र नहीं आता था। उन्होंने लिखा था कि मुझे लगता है कि ज्यादातर सुप्रीम कोर्ट जजों को न्यायशास्त्र से जुड़े बड़े-बड़े नामों की जानकारी भी नहीं होगी। उन्हें यह भी नहीं पता होगा कि दुनिया भर में मशहूर न्यायशास्त्रियों का योगदान क्या है।

काटजू ने तत्कालीन चीफ जस्टिस ठाकुर की भी आलोचना की थी। उनका आरोप था कि बीसीसीआई  मामले में जस्टिस ठाकुर ने न्यायिक अनुशासन का पालन नहीं किया और लोकप्रियता की रौ में बह गए। काटजू का आरोप है कि इस केस में जस्टिस ठाकुर ने जोखिमों की अनदेखी करते हुए संविधान और कानून को भी नजरंदाज किया। वरिष्ठता में चीफ जस्टिस  ठाकुर के बाद आने वाले जस्टिस अनिल दवे की भी काटजू ने आलोचना की है। उन्होंने लिखा कि सार्वजनिक तौर पर भगवद्गीता को भारत के सभी स्कूलों में अनिवार्य किए जाने की बात कहकर जस्टिस दवे ने संविधान की धर्मनिरपेक्षता बनाए रखने की अपनी शपथ को तोड़ा है।

काटजू ने अपनी पोस्ट में वरिष्ठता के आधार पर सीजेआई बनने की कतार में खड़े जस्टिस गोगोई की भी आलोचना की थी। काटजू ने लिखा था कि सौम्या हत्याकांड में फैसला सुनाते हुए जस्टिस गोगोई ने दिखा दिया कि उन्हें कानून की बुनियादी बातों की जानकारी नहीं है। उन्हें नहीं पता कि अफवाहों को सबूत नहीं माना जाता है। काटजू ने लिखा था कि  मैं सुप्रीम कोर्ट के ज्यादातर मौजूदा जजों के बारे में लिख सकता हूं और बता सकता हूं कि उनकी बौद्धिक क्षमता कितनी कम है, लेकिन यह जरूरी नहीं है।

जस्टिस गोगोई ने अवमाननापूर्ण ब्लॉग के लिए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस  मार्कंडेय काटजू के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करने को लेकर अपनी आत्मकथा ‘जस्टिस फॉर द जज’ में सफाई दी है । पूर्व सीजेआई ने अपने अभूतपूर्व आदेश को लेकर कहा कि अगर काटजू ने थोड़ा खेद व्यक्त किया होता तो हम इस मामले को आगे नहीं बढ़ाते। जस्टिस काटजू 2006 और 2011 के बीच उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश थे। उन्होंने अपने ब्लॉग में एक दुष्कर्म और हत्या के मामले में एक फैसले की आलोचना की थी और न्यायाधीशों पर टिप्पणी की थी जो प्रथम दृष्टया अवमाननापूर्ण पाए गए थे।

देश के न्यायिक इतिहास में पहली बार न्यायमूर्ति गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूर्व न्यायाधीश काटजू के खिलाफ स्वत: अवमानना नोटिस जारी किया था, जिसे बाद में उनकी लिखित माफी के बाद बंद कर दिया गया था।

जब जस्टिस गोगोई ने अवकाश ग्रहण किया उसके बाद जस्टिस काटजू ने उन पर तीखे हमले किये।एक ट्वीट में जस्टिस काटजू ने लिखा “गोगोई के दामाद तन्मय मेहता से पूछें कि सगाई करने से पहले उनकी आय क्या थी और बाद में क्या हो गयी? गोगोई के संबंधी न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेहता के स्थानांतरण की सिफारिश कैसे रद्द हो गई? जस्टिस नंदराजोग को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत करने की सिफारिश क्यों रद्द की गई?”

इसका जस्टिस गोगोई ने अपनी आत्मकथा में कोई उल्लेख नहीं किया है, न ही इस पर जस्टिस काटजू को कोई मानहानि कारक नोटिस ही दिया है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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