Tuesday, December 6, 2022

हिजाब बैन पर आर्टिकल-145(3)के तहत क्या संविधान पीठ सुनवाई करेगी ?

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हिजाब पर बैन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ में एकराय नहीं बन सकी है। अब इसे नई पीठ  को सौंपने का फैसला चीफ जस्टिस यूयू ललित को करना है। सुप्रीम कोर्ट ने जब गुरुवार को फैसला सुनाया तो दो जजों की पीठ की इस मामले पर राय अलग-अलग थी। 10 दिनों की सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था।

आदेश में 2 मुख्य बातें सामने आई हैं। पहला- हिजाब पहनना इस्लाम में अनिवार्य है या नहीं? दूसरा- कर्नाटक सरकार ने बैन का जो आदेश दिया है, उससे मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है या नहीं? यानी दोनों धार्मिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है। ऐसे मामलों के लिए संविधान में आर्टिकल-145 (3) का उपयोग किया जाता रहा है, जो कहता है केस की सुनवाई को 5 या उससे ज्यादा जजों की संवैधानिक पीठ में ट्रांसफर किया जाए।

जस्टिस धूलिया ने फैसले में कहा कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है या नहीं, इस पर विचार की जरूरत ही नहीं थी। यह सिर्फ एक चॉइस से जुड़ा सवाल है। मेरे लिए जो सबसे ऊपर था वह लड़कियों की शिक्षा था। लड़कियों को स्कूल जाने से पहले घर का काम-काज निपटाना पड़ता है और हम ऐसा करके उनकी जिंदगी को बेहतर बना रहे हैं। यह आर्टिकल 19 और 25 से जुड़ा मामला है।

जस्टिस धूलिया ने कहा कि आक्षेपित आदेश की वैधता का परीक्षण अनुच्छेद 19(1)(ए) और 25(1) के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने हिजाब पहनने की अनिवार्यता की जांच करके गलती की है। आवश्यक धार्मिक प्रैक्टिस के सिद्धांत को लागू करने की आवश्यकता नहीं थी, जस्टिस धूलिया ने जोर देकर कहा, “मेरे फैसले का मुख्य जोर यह है कि आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की यह पूरी अवधारणा, मेरी राय में इस विवाद के निपटान के लिए आवश्यक नहीं थी। जस्टिस धूलिया ने कहा कि उच्च न्यायालय ने वहां गलत रास्ता अपनाया। यह केवल अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 25(1) का प्रश्न था। हिजाब पहनना पसंद की बात है”।

जस्टिस गुप्ता ने फैसले में कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले से सहमति जताई और इस फैसले के खिलाफ याचिका दाखिल करने वाले से 11 सवाल पूछे। उन्होंने सवाल किया कि क्या छात्रों को आर्टिकल 19, 21 और 25 के तहत कपड़े चुनने का अधिकार दिया जा सकता है? अनुच्छेद 25 की सीमा क्या है? व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के अधिकार की व्याख्या किस तरह से की जाए? क्या कॉलेज छात्रों की यूनिफॉर्म पर फैसला कर सकते हैं? क्या हिजाब पहनना और इसे प्रतिबंधित करना धर्म की स्वतंत्रता का उल्लंघन है?

नतीजतन जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा कि यह मामला चीफ जस्टिस को भेजा जा रहा है, ताकि वे उचित निर्देश दे सकें। अब चीफ जस्टिस यह तय करेंगे कि इस मामले पर सुनवाई के लिए बड़ी पीठ गठित की जाए या फिर कोई और पीठ।

सुप्रीम कोर्ट ने हिजाब प्रतिबंध मामले में एक विभाजित फैसला सुनाया, लेकिन पीठ के दोनों न्यायाधीशों ने इस सवाल का फैसला नहीं किया कि क्या हिजाब पहनना एक आवश्यक धार्मिक प्रथा माना जाता है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना था कि हिजाब इस्लाम की एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है और इसलिए याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सुरक्षा का दावा नहीं कर सकते। जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा कि हिजाब पहनने की प्रथा एक ‘धार्मिक प्रथा’ या ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ हो सकती है या यह इस्लामी आस्था की महिलाओं के लिए सामाजिक आचरण हो सकती है। जस्टिस सुधांशु धूलिया के अनुसार, विवाद के निर्धारण के लिए ईआरपी का प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं है।जस्टिस गुप्ता ने अपने फैसले में कुरान और अन्य धार्मिक ग्रंथों पर किए गए विभिन्न निवेदनों और आवश्यक धार्मिक अभ्यास परीक्षण पर निर्णयों को दर्ज किया।

जस्टिस हेमंत गुप्ता ने हिजाब मामले में अपने फैसले में कहा कि धर्मनिरपेक्षता सभी नागरिकों पर लागू होती है, इसलिए एक धार्मिक समुदाय को अपने धार्मिक प्रतीकों को पहनने की अनुमति देना धर्मनिरपेक्षता के विपरीत होगा। न्यायाधीश ने कहा कि मांगी गई राहत के परिणामस्वरूप धर्मनिरपेक्ष स्कूलों में छात्रों के साथ अलग व्यवहार होगा जो विभिन्न धर्मों की मान्यताओं का पालन कर सकते हैं।

जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक हिजाब प्रतिबंध मामले में अपने फैसले में कहा कि सिख धर्म के अनुयायियों की आवश्यक धार्मिक प्रथाओं को इस्लामिक आस्था के अनुयायियों द्वारा हिजाब / हेडस्कार्फ़ पहनने का आधार नहीं बनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष यह तर्क दिया गया कि चूंकि भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के स्पष्टीकरण के संदर्भ में कृपाण की अनुमति है, इसलिए, जो छात्र हेडस्कार्फ़ पहनना चाहते हैं, उन्हें समान रूप से संरक्षित किया जाना चाहिए जैसा कि सिख अनुयायियों के मामले में होता है। उन्होंने गुरलीन कौर और अन्य बनाम पंजाब राज्य और अन्य में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ के फैसले पर भी भरोसा किया। इसमें यह माना गया कि सिख धर्म के अनुयायियों के आवश्यक धार्मिक अभ्यास में बालों को बिना कटे रखना शामिल है, जो सिख धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक सिद्धांतों में से एक है।

जस्टिस सुधांशु धूलिया ने बिजो इमैनुएल केस में सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का भी जिक्र किया। क्या है बिजो इमैनुएल केस? अगस्त 1986 में जस्टिस ओ चिन्नप्पा रेड्डी और जस्टिस एमएम दत्त की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बिजो इमैनुएल एंड अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य मामले में, अंतरराष्ट्रीय धार्मिक संप्रदाय ‘यहोवा साक्षी संप्रदाय’ के तीन बच्चों को सुरक्षा प्रदान की, जो स्कूल में राष्ट्रगान नहीं गाया था। राष्ट्रगान नहीं गाने पर एक शिकायत के बाद उनको स्कूल से निलंबित कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा था कि बच्चों को जबरन राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर करना उनके धर्म के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

विभाजित फैसले के कारण अभी हिजाब बैन पर कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला ही लागू होगा। सरकार हिजाब पर बैन बरकरार रख सकती है। हां, याचिकाकर्ता चाहें तो चीफ जस्टिस के पास अर्जेंट हियरिंग के लिए पिटीशन दाखिल कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में हिजाब विवाद पर कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ 26 याचिकाएं दाखिल की गई थीं। याचिकाकर्ता का कहना था कि हाईकोर्ट ने धार्मिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को देखे बिना हिजाब बैन पर फैसला सुना दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट राजीव धवन, दुष्यंत दवे, संजय हेगड़े और कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा तो सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कोर्ट में पेश हुए।

15 मार्च को कर्नाटक हाईकोर्ट ने उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज की कुछ मुस्लिम छात्राओं की तरफ से क्लास में हिजाब पहनने की मांग करने वाली याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने अपने पुराने आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि हिजाब पहनना इस्लाम की जरूरी प्रैक्टिस का हिस्सा नहीं है। इसे संविधान के आर्टिकल 25 के तहत संरक्षण देने की जरूरत नहीं है।

दरअसल कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने फैसले में शिक्षण संस्थानों में हिजाब पर बैन को बरकरार रखा था। हाई कोर्ट ने कहा था कि हिजाब इस्लाम में जरूरी धार्मिक प्रथा नहीं है।

कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले के बाद हिजाब विवाद के मसले पर खासा बवाल हुआ था और यह मामला हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं ने कक्षाओं और परीक्षाओं का बहिष्कार कर दिया था। हाईकोर्ट के फैसले को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। कर्नाटक में बीते महीनों में हिजाब से लेकर हलाल मांस पर लगातार विवाद होता रहा है।

इन दोनों जजों की पीठ के बीच य़े पहला मामला नहीं है जहां दोनों जजों ने अलग-अलग फैसला सुनाया है। इससे पहले भी एक मामले में दोनों जजों ने अलग-अलग फैसला सुनाया था। हिजाब मामले में अलग-अलग फैसला सुनाने वाले दोनों जजों ने इससे पहले गणपति उत्सव के आयोजन स्थल को लेकर अलग-अलग फैसला सुनाया था। दरअसल, बेंगलुरु के चामराजपेट के ईदगाह मैदान में गणेश चतुर्थी मनाने की परमिशन देने पर मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति जताई थी।

गौरतलब है कि कर्नाटक हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कर्नाटक सरकार को चामराजपेट में ईदगाह मैदान के उपयोग की मांग करने वाले आवेदनों को मंजूर कर लिया था। हालांकि, इसके खिलाफ वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने तत्काल सुनवाई के लिए मामले का उल्लेख किया था। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश से अनावश्यक तनाव पैदा होगा। पूरे विवाद के बीच मामले को संभालने के लिए ईदगाह मैदान के चारों ओर चप्पे-चप्पे पर भारी संख्या में पुलिस की तैनाती की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की बेंच ने की थी। 30 अगस्त, 2022 को वक्फ बोर्ड द्वारा दायर याचिका के मामले में इन दोनों जजों की राय विभाजित रही थी। जस्टिस हेमंत गुप्ता हाईकोर्ट के आदेश को बनाए रखने के इच्छुक थे, लेकिन जस्टिस धूलिया इसके खिलाफ थे। इसके बाद मामले को तीन जजों की बेंच के पास भेजा गया था। जहां कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के ईदगाह मैदान में गणेश चतुर्थी मनाने की अनुमति देने से बेंच ने इनकार कर दिया था। कोर्ट ने आदेश दिया था कि जमीन पर यथास्थिति बरकरार रखी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दोनों पक्षों को सुनवाई के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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