Sunday, December 4, 2022

सबसे बड़ा सवाल: पेगासस किसने खरीदा और सरकार ने जांच में क्यों नहीं किया सहयोग?

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पेगासस जासूसी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जस्टिस रवीन्द्रन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दे दी है। पर पूरी रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक डोमेन में नहीं आयी है। जांच कैसे की गई, किन किन सुबूतों की पड़ताल की गई, यह सब अभी विस्तार से ज्ञात नहीं है। बस यह पता है कि, 29 उपकरणों में से 5 उपकरणों में मालवेयर पाए गए हैं। वे पेगासस के हैं, या किसी अन्य स्पाइवेयर के, यह भी स्पष्ट नहीं है। रिपोर्ट में जासूसी रोकने के उपाय भी सुझाए गए हैं और निजता के हनन को रोकने की बात भी की गई है। 

अब इस बिंदु पर आते हैं कि, यह मामला उठा कैसे और किस खुलासे के बाद, सरकार जासूसी के आरोपों के घेरे में आई। हुआ यह कि, न्यूयार्क टाइम्स के रॉनेन बर्गमन और मार्क मज़ेटी की एक रिपोर्ट ने देश और सरकार के अलोकतांत्रिक और नागरिक अधिकार विरोधी चेहरे को उजागर कर दिया है। इन खोजी पत्रकारों ने, पेगासस स्पाइवेयर पर एक रिपोर्ट तैयार की है जिसमें कहा गया है कि, “मेक्सिको और पनामा के अलावा भारत ने भी पेगासस जासूसी उपकरण ख़रीदा है। इज़रायल ने इस सॉफ़्टवेयर को बेच कर दुनिया में अपने कूटनीतिक प्रभाव का विस्तार किया है। जिन देशों ने इज़रायल से पेगासस ख़रीदा है वो अब इसके हाथ ब्लैकमेल हो रहे हैं।”

न्यूयार्क टाइम्स आगे लिखता है,”नरेंद्र मोदी 2017 में इजरायल गए थे, और उसी यात्रा के दौरान पेगासस ख़रीदने का सौदा हुआ। जिसका इस्तेमाल विपक्ष के नेताओं, पत्रकारों के फ़ोन से डेटा उड़ाने और बातचीत रिकार्ड करने में हुआ।”

हालांकि, रक्षा मंत्रालय पहले ही इस बात से इनकार कर चुका है कि रक्षा मंत्रालय और एनएसओ के बीच कोई सौदा नहीं हुआ है। न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार, पेगासस रक्षा सौदे का हिस्सा था। सरकार के लाख ना नुकुर के बाद एक साल पहले यह स्पष्ट हो गया था कि, भारत सरकार ने रक्षा उपकरणों के रूप में पेगासस स्पाइवेयर की खरीद की थी और उसका उपयोग सुप्रीम कोर्ट के जजों, निर्वाचन आयुक्त सहित विपक्ष के नेताओं और पत्रकारों सहित अनेक लोगों की जासूसी करने में प्रयोग के आरोप लगे थे। 

पेगासस जासूसी प्रकरण के इस खुलासे के बाद दुनिया भर में तहलका मच गया और इजरायली कंपनी ने इस पर लगातार अपनी सफाई दी। पेगासस स्पाइवेयर बनाने वाली इजराइली कम्पनी, एनएसओ ने तब इन खुलासों का खंडन तो किया पर जो प्रबलता उनके खंडन में होनी थी, उसका, उनके खंडन वक्तव्य में अभाव था। एक बात तो तय है कि, इस स्पाइवेयर का दुरुपयोग दुनिया भर मे हुआ है। दुनिया के इतिहास में फोन टैपिंग या जासूसी कोई नया काम नहीं है और न ही सरकारों के लिये वर्जित रहा है।

निजी जासूसी संस्थाओं से लेकर सभी सरकारों के खुफिया विभाग इसे अंजाम देते रहते हैं, और वे अपने-अपने टारगेट तय करके अपने उद्देश्य और जिज्ञासाओं के अनुसार, तरह तरह से निगरानी करते रहते हैं। गुप्तचरी, शासन प्रबन्धन का एक अनिवार्य पक्ष है। रहा सवाल खुफिया उपकरणों का तो, जैसे-जैसे वैज्ञानिक तरक़्क़ी होती जाती है, उसी के अनुपात में उन्नत खुफिया उपकरणों का प्रयोग होता जाता है। पर पेगासस स्पाइवेयर या सॉफ्टवेयर कोई सामान्य निगरानी डिवाइस नहीं है बल्कि यह बेहद उन्नत और सॉफिस्टिकेटेड साइबर निगरानी उपकरण है, जो कीमत में भी महंगा है और साथ ही इसे एक हथियार का दर्जा भी प्राप्त है। 

इजरायल की कम्पनी एनएसओ की बात मानें तो, उन्होंने इस सॉफ्टवेयर का अनुसंधान और विकास दुनिया भर में फेल रहे आतंकी संगठनों की जासूसी और उन पर निगरानी करने के लिए किया है और जैसा कि वे दावा करते हैं, इसे किसी निजी व्यक्ति को बेचने की भी, उन्होंने अनुमति नहीं दी है। कंपनी के अनुसार, इस सॉफ्टवेयर को सरकारी एजेंसी ही खरीद सकती है लेकिन, वह भी इसका इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों  के संबंध में ही करेगी।

पर, जब द गार्जियन, वाशिंगटन पोस्ट, द वायर जैसे अनेक वेबसाइट और अखबारों ने, इसका खुलासा एक साल पहले किया और यह दावा किया गया कि, इस स्पाइवेयर का इस्तेमाल भारत में विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, जजों, आदि महत्वपूर्ण लोगों की निगरानी करने के लिये किया गया है, तब इस खुलासे पर देश भर से सवाल उठने शुरू हो गए थे। उसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर हुईं और जांच के लिए अदालत ने एक न्यायिक कमेटी का गठन किया, जिसकी रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत कर दी गई है, जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है।

पेगासस खुलासे की पहली कड़ी में दावा किया गया था, कि भारत सरकार पत्रकारों की जासूसी करा रही है। जिन नामों का खुलासा हुआ है, उनमें पत्रकार, कानूनविद और विपक्षी नेता आदि शामिल हैं। खुलासे की जारी रिपोर्ट के अनुसार पेगासस ने भारत के लगभग, 300 बुद्धिजीवियों, वकीलों, मानवाधिकार एक्टिविस्ट, पत्रकारों और विरोधी दल के नेताओं के मोबाइल फोन की जानकारी को हैक किया है। वर्ष 2019 में भी एक बार, इजरायल द्वारा तैयार किये गये स्पाईवेयर पेगासस का नाम सुर्खियों में आया था, जब व्हाट्सएप कम्पनी ने कहा था कि  “वह इजरायल की इस कंपनी के खिलाफ केस करने जा  रहे हैं, क्योंकि इसी स्पाइवेयर के द्वारा, लगभग 1400 लोगों के व्हाट्सएप चैट और फोन आदि की जानकारी उनके फोन से हैक की गई थी।”

व्हाट्सएप, चूंकि अपने ग्राहकों को किसी अन्य के द्वारा न पढ़े और न सुने जा सकने वाले चैट और वार्तालाप की आश्वस्ति देता है, अतः यह उसके लिये बेहद गम्भीर बात थी कि उसके ग्राहकों की निजता में किसी अवांछित की सेंध पड़ रही है। 

अब एक नज़र भारत मे फोन टैपिंग के इतिहास पर डालते हैं। भारत में फोन टैपिंग की शुरुआत आज़ादी के बाद से ही हो गयी थी। कुछ उदाहरण देखें, 

● 1949 में, संचार मंत्री रफी अहमद किदवई ने अपनी फोन टैपिंग का आरोप लगाया था, जिसकी पुष्टि नहीं हो पायी थी।

● तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल केएस थिमाया ने 1959 में अपने और आर्मी ऑफिस के फोन टैप होने का आरोप लगाया था। 

● नेहरू सरकार के ही एक और मंत्री टीटी कृष्णामाचारी ने 1962 में फोन टैप होने का आरोप लगाया था। 

● 1988 में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े के कार्यकाल में भी फोन टैपिंग का बड़ा मामला सामने आया था। विपक्ष का आरोप था कि हेगड़े ने विपक्षी नेताओं के फोन टेप के आदेश देकर उनकी निजता में सेंध लगाई है। रामकृष्ण हेगड़े को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। 

● आज तक चैनल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जून 2004 से मार्च 2006 के बीच सरकार की एजेंसियों ने 40 हजार से ज्यादा फोन टैप किए थे।

● 2006 में अमर सिंह ने यूपीए सरकार पर अपनी फोन टैपिंग का आरोप लगाया था और यह दावा किया था कि इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) उनका फोन टैप कर रही है।  अमर सिंह ने केंद्र की यूपीए सरकार और सोनिया गांधी पर फोन टैपिंग का आरोप लगाया था. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय तक चला। 2011 में अमर सिंह ने केंद्र सरकार पर लगाए आरोपों को वापस ले लिया है। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अमर सिंह के फोन टेप को मीडिया में दिखाने या छापने पर लगी रोक भी हटा ली थी। 

● अक्टूबर 2007 में यूपीए सरकार पर, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फोन टेप करवाए जाने के आरोप लगे थे, जब नीतीश कुमार अपने एक सहयोगी से बात कर रहे थे कि कैसे बिहार के लिए केंद्र से ज्यादा पैसा मांगा जाए। 

● देश के बड़े उद्योगपतियों रतन टाटा और मुकेश अंबानी की कंपनियों के लिए पीआर का काम कर चुकी नीरा राडिया के फोन टैप का मामला सामने आने के बाद देश में राजनीतिक भूचाल आ गया था। नीरा राडिया की विभिन्न उद्योगपतियों, राजनीतिज्ञों, अधिकारियों और पत्रकारों से फोन पर हुई बातचीत के ब्यौरे मीडिया में प्रकाशित हुए थे।’आउटलुक’ मैगजीन ने अपनी वेबसाइट पर प्रमुखता से प्रकाशित एक खबर में कहा था कि उसे नीरा राडिया की बातचीत के 800 नए टेप मिले हैं। इस बातचीत के बाद से ही 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में नीरा राडिया की भूमिका पर सवाल उठने लगे थे। 

● आउटलुक पत्रिका ने अप्रैल 2010 में दावा किया था कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने देश के कुछ शीर्ष नेताओं के फोन टैप करवाए हैं, जिनमें तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार, कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और सीपीएम के पूर्व महासचिव प्रकाश करात का नाम सामने आया था। 

● फरवरी 2013 में अरुण जेटली राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे। उस समय उनके फोन टैपिंग मामले में करीब दस लोगों को गिरफ्तार किया गया था। यह मामला जनवरी में उस समय सामने आया था, जब विपक्ष ने सरकार पर जेटली का फोन टैप कराने का आरोप लगाया था। अरुण जेटली की जासूसी के आरोप में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने सहायक उपनिरीक्षक गोपाल, हेड कांस्टेबल हरीश, जासूस आलोक गुप्ता, सैफी और पुनीत के अलावा एक अन्य कांस्टेबल को गिरफ्तार किया गया था। 

● कर्नाटक सांसद सुमनलता अंबरीश ने दावा किया कि 2018-19 में राज्य में कांग्रेस-जेडीएस (JDS) सरकार के कार्यकाल के दौरान उनका टेलीफोन टैप किया गया था। 

● महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले ने कुछ ही दिन पहले विधानसभा में आरोप लगाया था कि साल 2016-17 में जब वो बीजेपी के सांसद थे तब उनका फोन टैप किया जा रहा था। 

● राजस्थान में पिछले महीने फोन टैप का मामला गरमाया था। यहां आरोप है कि गहलोत सरकार विधायकों के फोन टैप करवा रही है।

पेगासस जासूसी का मामला, जो एक साल पहले, लीक हुए आंकड़ों के आधार पर की गई, एक वैश्विक मीडिया संघ की जांच के बाद सामने आया है, के अनुसार, जांच में, इस बात के सबूत मिले हैं कि इजरायल स्थित कंपनी ‘एनएसओ ग्रुप के सैन्य दर्जे के मालवेयर का इस्तेमाल पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक असंतुष्टों की जासूसी करने के लिए किया जा रहा है। द वायर के अनुसार, पत्रकारिता संबंधी पेरिस स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘फॉरबिडन स्टोरीज एवं मानवाधिकार समूह ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा हासिल की गई और 16 समाचार संगठनों के साथ साझा की गई 50,000 से अधिक सेलफोन नंबरों की सूची से पत्रकारों ने 50 देशों में 1,000 से अधिक ऐसे व्यक्तियों की पहचान की है, जिन्हें एनएसओ के ग्राहकों ने संभावित निगरानी के लिए कथित तौर पर चुना था।

वैश्विक मीडिया संघ के सदस्य ‘द वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, जिन लोगों को संभावित निगरानी के लिए चुना गया, उनमें 189 पत्रकार, 600 से अधिक नेता एवं सरकारी अधिकारी, कम से कम 65 व्यावसायिक अधिकारी, 85 मानवाधिकार कार्यकर्ता और कई राष्ट्राध्यक्ष शामिल हैं। ये पत्रकार ‘द एसोसिएटेड प्रेस (एपी), ‘रॉयटर, ‘सीएनएन, ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल, ‘ले मांद और ‘द फाइनेंशियल टाइम्स जैसे संगठनों के लिए काम करते हैं। एनएसओ ग्रुप के स्पाइवेयर को मुख्य रूप से पश्चिम एशिया और मैक्सिको में 

तयशुदा टारगेट की निगरानी के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोप हैं। सऊदी अरब को एनएसओ के ग्राहकों में से एक बताया जाता है। इसके अलावा सूची में फ्रांस, हंगरी, भारत, अजरबैजान, कजाकिस्तान और पाकिस्तान सहित कई देशों के लोगों के भी फोन नम्बर हैं। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, इस सूची में मैक्सिको के नागरिकों के सर्वाधिक फोन नंबर हैं, जिनकी संख्या 15,000 है।

अखबारों के अनुसार, भारत मे जिनके नाम इस जासूसी में आ रहे हैं, उनमें से, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, भाजपा के मंत्रियों अश्विनी वैष्णव और प्रह्लाद सिंह पटेल, पूर्व निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर के नाम हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे तथा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद अभिषेक बनर्जी और भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई पर अप्रैल 2019 में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली उच्चतम न्यायालय की महिला कर्मचारी और उसके रिश्तेदारों से जुड़े 11 फोन नंबर हैकरों के निशाने पर थे। राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्रियों वैष्णव और प्रहलाद सिंह पटेल के अलावा जिन लोगों के फोन नंबरों को निशाना बनाने के लिये सूचीबद्ध किया गया उनमें चुनाव पर नजर रखने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर

डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के संस्थापक जगदीप छोकर और शीर्ष वायरोलॉजिस्ट गगनदीप कांग शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार सूची में राजस्थान की मुख्यमंत्री रहते वसुंधरा राजे सिंधिया के निजी सचिव और संजय काचरू का नाम शामिल था, जो 2014 से 2019 के दौरान केन्द्रीय मंत्री के रूप में स्मृति ईरानी के पहले कार्यकाल के दौरान उनके विशेष कार्याधिकारी (ओएसडी) थे। इस सूची में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े अन्य जूनियर नेताओं और विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया का फोन नंबर भी शामिल था। 

‘द गार्डियन’ की ओर से जारी इस बहुस्तरीय जांच की पहली किस्त में दावा किया गया है कि 40 भारतीय पत्रकारों सहित दुनियाभर के 180 संवाददाताओं के फोन हैक किए गए। इनमें ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ और ‘मिंट’ के तीन पत्रकारों के अलावा ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की संपादक रौला खलाफ तथा इंडिया टुडे, नेटवर्क-18, द हिंदू, द इंडियन एक्सप्रेस, द वॉल स्ट्रीट जर्नल, सीएनएन, द न्यूयॉर्क टाइम्स व ले माँद के वरिष्ठ संवाददाताओं के फोन शामिल हैं। जांच में दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक पूर्व प्रोफेसर और जून 2018 से अक्तूबर 2020 के बीच एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार आठ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के फोन हैक किए जाने का भी दावा किया गया है।

यह जांच एमनेस्टी इंटरनेशनल और फॉरबिडेन स्टोरीज को प्राप्त लगभग 50 हजार नामों और नंबरों पर आधारित है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इनमें से 67 फोन की फॉरेन्सिक जांच की है। इस दौरान 23 फोन हैक किये गए मिले, जबकि 14 अन्य में सेंधमारी की कोशिश करने की पुष्टि हुई। ‘द वायर’ ने खुलासा किया कि भारत में भी दस फोन की फॉरेन्सिक जांच करवाई गई। ये सभी या तो हैक हुए थे, या फिर इनकी हैकिंग का प्रयास किया गया था।

जासूसी के आरोपों के बीच, एक साल पहले, नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के बजट में की गई, अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी पर भी  सवाल उठने लगे थे। यह सवाल भाजपा सांसद डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने उठाया था। डॉ स्वामी ने ट्वीट किया है कि, उन्होंने राज्य सभा के पुस्तकालय से नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ( NSS ) के बजट के विवरण के बारे में पूछा तो पता चला कि,  वर्ष 2015 – 16 में ₹ 44 करोड़ और वर्ष 2016 – 17 में ₹ 33 करोड़ था। यही बजट अप्रत्याशित रूप से बढ़ कर, 2017 – 18 में, ₹ 333 करोड़ का हो गया। यह बजट बढ़ोत्तरी क्यों हुयी। अमूमन हर साल का बजट अपने पिछले साल के बजट की तुलना में कुछ न कुछ बढ़ता ही रहता है, इसका काऱण मुद्रास्फीति, बाजार की महंगाई का असर आदि होता है।

कभी कभी जब कोई नई योजनाएं आती हैं तब भी बजट में उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती है। यहीं, यह सवाल स्वाभाविक रूप से उपजता है कि 33 करोड़ रुपये की तुलना में 333 करोड़ की, की गयी अचानक वृद्धि किन खर्चों को पूरा करने के लिये की गई थी। स्वामी, एक आशंका यह भी जताते हैं कि कहीं बजट की  यह अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी पेगासस स्पाइवेयर के लिये आवश्यक संसाधन जुटाने, उसके लिये रिसर्च और डेवलपमेंट जैसे मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिये तो नही किया गया था। हालांकि सरकार इस मामले पर मौन है और पेगासस स्पाइवेयर खरीदे जाने या न खरीदे जाने के बारे में सरकार का अभी तक कोई अधिकृत वक्तव्य नहीं आया है। 

एनएसओ जिसने पेगासस स्पाइवेयर डेवलप किया है और बेचा है ने कहा है कि उसे निगरानी के लिये क्रेता के यहां एक इंस्टालेशन और सपोर्ट सिस्टम लगाना पड़ता है। बड़े पैमाने पर हुयी निगरानी की इस घटना को बिना देश मे कहीं एक बेस बनाये अंजाम नहीं दिया जा सकता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि एनएसओ का दिल्ली या आसपास कहीं न कहीं कोई कार्यालय या उसके सपोर्ट सिस्टम का आधार होगा, जहां से यह निगरानी की जाती रही है।

अगर सरकार ने यह निगरानी नहीं कराई है तो, फिर यह और अधिक गम्भीर बात है कि कोई देश मे घुस कर, अपना सर्विलांस सिस्टम इंस्टाल कर के देश के पत्रकारों, जजों, विपक्ष के नेताओं, उद्योगपतियों तक की लम्बे समय से निगरानी कर रहा है और सरकार को इसकी भनक तक नहीं लग सकी ! और आज जब यह सब मायाजाल खुला और सरकार से यह सवाल पूछा जाने लगा कि यह जासूसी कौन करा रहा था तो सरकार यह तो कह रही है कि, उसने यह सब कुछ नहीं किया, पर वह यह भी नहीं बता पा रही है कि, आखिर फिर यह सब किया किसने ?

यदि सरकार यह जासूसी कराती तो, इस पर जो सवाल उठते, वे निजता के अधिकार के उल्लंघन और सरकार द्वारा निहित स्वार्थपूर्ण ताक झांक के सम्बंध में ही उठते, और वह देश का आंतरिक मामला होता है। पर यदि यह जासूसी, सरकार की जानकारी के बिना, जैसा कि फिलहाल सरकार का स्टैंड है, की गई है तो यह एक प्रकार का साइबर हमला है और इस साइबर हमले पर चीनी घुसपैठ की नीति कि, न तो कोई घुसा था, न घुसा है के अनुरूप आचरण करना देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये घातक होगा। आज जब कोई भी आकर यह निगरानी कर ले जा रहा है तो, क्या वह देश के सेना प्रमुखों, पीएमओ या अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों की निगरानी नहीं कर सकता है ?

सरकार ने, निश्चित ही अपने संस्थानों की सुरक्षा के सभी जरूरी और आधुनिकतम बंदोबस्त कर रखे होंगे और वह सतर्क भी होगी, फिर भी किसी अन्य के द्वारा घुसकर इस प्रकार के महंगे स्पाइवेयर से सीजेआई के ऊपर महिला उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला अधिकारी तक की जासूसी कर जाय और सरकार इस पर जांच तक कराने को राजी नहीं हो रही है तो, या तो यह सरकार की अक्षमता है या उसकी संलिप्तता। दोनों ही स्थितियों में यह एक चिंताजनक स्थिति है। जांच में सहयोग न करने से सरकार की नीयत पर संदेह उठना स्वाभाविक है। अब सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम का इंतजार है। मुकदमा अभी लंबित है। 

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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