झारखंड की एक संथाली बस्ती की रात थी। टिमटिमाती लालटेन के नीचे एक बूढ़ी औरत चुपचाप बैठी थी। उसका पोता उससे पूछ रहा था — “दादी, हमारे गांव के पास वाली जमीन अब हमारी क्यों नहीं रही?”
दादी ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा, फिर फूटी आवाज़ में बोली —
“क्योंकि तुम्हारे दादा का खून इस मिट्टी में बहा था, पर ये मिट्टी अब किसी कंपनी की हो गई है…”
यह कहानी उन सैकड़ों झारखंडी गांवों की है, जहां आदिवासियों ने सदियों से जंगलों और पहाड़ियों को अपना माना, लेकिन राज्य और पूंजीवाद की मिलीभगत ने उन्हें विस्थापन, हिंसा और चुप्पी के हवाले कर दिया।
दरअसल इसी चुप्पी के खिलाफ जो पहला स्वर था, वह थे — शिबू सोरेन, जिसे आदिवासी समाज ने गुरुजी कहा।
शिबू सोरेन: मिट्टी से उपजा वह नेता, जो केवल सत्ता नहीं बल्कि स्वत्व चाहता था
11 जनवरी 1944 को बिहार के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन के पिता की हत्या महाजनों ने की थी; वह भी उस ज़मीन के लिए, जिसे उनके पुरखों ने पीढ़ियों तक जोता था। यह व्यक्तिगत त्रासदी, बाद में पूरे संथाल परगना के आदिवासी जनजीवन की सामूहिक पीड़ा में बदल गई।
उन्होंने 1970 के दशक में “झारखंड मुक्ति मोर्चा” की नींव रखी। एक ऐसा आंदोलन, जो किसी राजधानी के दरवाज़े पर नहीं, बल्कि जंगलों के बीच खड़ा हुआ। उन्होंने ‘जल-जंगल-ज़मीन’ को केवल नारा नहीं, संविधान के अंदर आदिवासियों का अधिकार घोषित किया।
संघर्ष, राज्य निर्माण और जटिल राजनीति का द्वंद्व
शिबू सोरेन ने झारखंड के निर्माण के लिए जो संघर्ष किया, वह केवल भौगोलिक नहीं था बल्कि वह सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता की मांग थी। जब 15 नवंबर, 2000 को झारखंड बना, तो झारखंड के गांवों में यह जश्न था कि “अब दिल्ली हमें नहीं, हम खुद अपने को चलाएंगे।”
लेकिन बहुत जल्दी आदिवासी जनता ने देखा कि उनके सपनों की ज़मीन फिर से सौदेबाज़ी की राजनीति में फंसने लगी। गुरु जी मुख्यमंत्री बने, मंत्री भी बने, लेकिन गठबंधन की सच्चाई और भ्रष्ट तंत्र की दीवारें उनकी वैचारिक ईमानदारी से टकराने लगीं।
मुकदमे, कलंक और आदिवासी प्रतीक का धुंधलापन
शिबू सोरेन पर शशिनाथ झा हत्या कांड, और JMM रिश्वत कांड (1993) जैसे आरोप लगे। उन्हें एक बार सज़ा भी हुई, पर बाद में वे बरी हुए। लेकिन ये मुकदमे सत्ता के उस खेल की पहचान भी हैं, जहां हाशिए के नेताओं को सज़ा जल्दी और न्याय देर से मिलता है।
आदिवासी समाज ने इन मामलों को गुरुजी की हार नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का हथियार माना, जिसने कभी उन्हें अपनी जगह पर खड़ा नहीं देखा।
विरासत और उपेक्षा: इतिहास का दोष किसका है?
आज जब उनके बेटे हेमंत सोरेन फिर से सत्ता में हैं, यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या शिबू सोरेन को भारतीय लोकतंत्र ने उनका पूरा सम्मान दिया?
उन्होंने संथाली भाषा को संविधान में स्थान दिलाया, आदिवासी भूमि-अधिकारों को कानून में दर्ज कराया, और एक पूरी पीढ़ी को आत्मगौरव सिखाया। परंतु मुख्यधारा का मीडिया, इतिहास और शिक्षाप्रणाली उन्हें अक्सर केवल “एक विवादित आदिवासी नेता” के रूप में दर्ज करती है।
जंगल में खड़ा एक संविधानवादी
शिबू सोरेन की अनकही कहानी, भारत के उस लोकतंत्र की है जिसे राजधानी में नहीं, जंगल की मिट्टी में बोया गया। वह नेता जिसने झारखंड को केवल नक्शे में नहीं, आदिवासी चेतना में स्थापित किया।
शायद यही समय है, जब हम गुरुजी को एक कलंकित नेता नहीं, एक भारतीय आदिवासी पुनर्जागरण के पुरोधा के रूप में पढ़ें और समझें।
(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)