वापसी पता नहीं नेहरू का मोदी को ख़त…

प्रिय माननीय नरेन्द्र मोदी,

27 मई 1964 को यहाँ आ जाने के बाद से मैंने वैसे तो ख़त लिखने से दूरी बनाये रखी है। लेकिन पुरानी आदतें आसानी से नहीं मिटतीं। मेरी बेटी यहाँ है, और मेरे नाती भी। हममें से कोई भी आपसे व्यक्तिगत तौर पर वाकिफ़ नहीं है, लेकिन हम अक्सर ही आपके प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल पर चर्चा करते हैं, क्योंकि आप उस बेहद ज़िम्मेदार पद पर आसीन होने वाले हमारे उत्तराधिकारियों की लम्बी श्रृंखला में से एक हैं।

मुझे यह जानकर ख़ुशी हुई कि 10 जून 2026 को आपने प्रधानमंत्री के रूप में 4,399 दिन पूरे कर लिए। चूँकि आप उत्कृष्ट स्वास्थ्य और भरपूर ऊर्जा से परिपूर्ण प्रतीत होते हैं, इसलिए सम्भव है कि आप अपने रूस के मित्र व्लादिमीर पुतिन का रिकॉर्ड भी तोड़ देंगे, जो 9 अगस्त 1999 से राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के रूप में सेवा दे रहे हैं। इस उपलब्धि पर मेरी ओर से हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

मैं अक्सर सोचता हूँ, हालाँकि, कि क्या आपके और मेरे बीच तुलना करना पूरी तरह उचित है। जब 1964 में मेरा निधन हुआ, तब भारत में औसत आयु लगभग 42 वर्ष थी। तब भी मैं 74 वर्ष तक जीवित रहा। आज भारत में औसत आयु लगभग 72 वर्ष है। उस दृष्टि से देखा जाए तो सम्भवतः आप 100 वर्ष की आयु भी पार कर जाएँ और हर तुलना में मुझसे आगे निकल जाएँ।

प्रधानमंत्री रहते हुए मैं जितनी आयु तक पहुँचा था, आप उससे पहले ही अधिक आयु के हो चुके हैं, क्योंकि 17 सितम्बर 2025 को आपने 75 वर्ष पूरे कर लिए।

मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं एक अर्थ में आपकी सराहना करता हूँ। जैसा कि आप ख़ुद कई बार ज़िक्र कर चुके हैं, मेरा जन्म तथाकथित तौर पर मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर हुआ था। मैं बचपन से यह कहानियाँ सुनकर बड़ा हुआ कि मेरे मैले कपड़े धुलाई के लिए पेरिस भेजे जाते थे। मेरे पिता मोतीलाल नेहरू का जन्म 6 मई 1861 को हुआ था, और संयोग से उसी दिन, उसी महीने और उसी वर्ष रवीन्द्रनाथ ठाकुर का भी जन्म हुआ था।

मेरे पिता ने बेशुमार धन अर्जित किया था और चाहते तो उससे कहीं अधिक सम्पत्ति जोड़ सकते थे। लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए ऐशो-आराम त्याग दिया। वे दो बार गिरफ़्तार किया हुए, दूसरी बार सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान मैं भी उनके साथ गिरफ़्तार हुआ था। उन्होंने कुल सात महीने जेल में गुज़ारे और बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण हर बार समय से पहले रिहा कर दिये गये। वास्तव में, जेल से अन्तिम रिहाई के कुछ समय बाद ही उनका निधन हो गया।

उनके जाने के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बना। उन दिनों मेरे लिए सबसे बड़ी ताकत महात्मा गांधी का समर्थन था। मैं बिना किसी संकोच के साथ यह कह सकता हूँ कि मैं उन्हें उनके अपने पुत्रों से भी अधिक प्रिय था। गांधीजी के समर्थन के कारण ही 1946 में मैं वायसराय की अध्यक्षता वाली कार्यकारी परिषद का उपाध्यक्ष बन सका।

उससे पहले मैंने लगभग नौ वर्ष जेल में बिताये थे। चूँकि आपका जन्म स्वतंत्रता के बाद हुआ, इसलिए आपको आज़ादी की लड़ाई में जेल जाने का अवसर नहीं मिला। फिर भी, यह मेरे लिए आश्चर्य का विषय है कि मेरी विचारहीन बेटी द्वारा लगाये गये आपातकाल के दौरान आप गिरफ्तारी से कैसे बच गये। कारण जो भी रहा हो, इसके लिये मैं आपके खिलाफ़ कोई द्वेष नहीं पालुंगा।

मैं आपकी इस ग़लतफ़हमी को दूर करना चाहूँगा कि 1947 और 2014 में प्रधानमंत्रित्व में समानता का पुट था।

ब्रिटिश सरकार द्वारा बिछायी गयी रेलवे लाइन, डाक और तार व्यवस्था और सैन्य छावनियों के अलावा राष्ट्रीय अवसंरचना के नाम पर बेहद कम चीज़ें थीं। भुखमरी से होने वाली मौत सामान्य थीं। निजी क्षेत्र का अस्तित्व न के बराबर था।

विभाजन ने हमारे ऊपर असम्भव से भार सौंप दिये थे। हमें एक नयी राजधानी की ज़रूरत थी, जो सीमा से यथासम्भव दूर हो। इस तरह चण्डीगढ़ का निर्माण हुआ, जो उस वक़्त आम के बाग सा था। मुझे ख़ुद स्विस-फ़्रांसीसी वास्तुकार ले कॉर्बूज़िए को ख़त लिख कर उन्हें इसके निर्माण के लिए अनुरोध करना पड़ा। मैंने उन्हें बेलागलपेट बताया कि भारत उन्हें फ़ीस देने के क़ाबिल नहीं है। हम उन्हें एक घर, एक गाड़ी और कर्मचारी दे सकते थे, इससे ज़्यादा नहीं। वे तैयार हो गये।

मैंने “मेक इन इण्डिया” का नारा तो नहीं दिया, लेकिन हमने भारत को निर्माण करने के क़ाबिल बनाया। मुझे इस बात की खुशी है कि आपने मेरे शब्दों को उधार लिया और ख़ुद को प्रधान सेवक कहा।

हमारी सर्वप्रथम ज़िम्मेदारी राष्ट्र-निर्माण था। संविधान के तहत जनवादी संस्थाओं का ख़ाका तैयार कर उन्हें स्थापित करना था। 

पहले आम चुनाव के लिए एक स्वतंत्र चुनाव आयोग की स्थापना की गयी। पश्चिम बंगाल के समकालीन मुख्य सचिव सुकुमार सेन को इस विशाल कार्य का भार सौंपा गया। 

तक़रीबन 17.6 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से लगभग 85 प्रतिशत न लिखना जानते थे न पढ़ना। हर मतदाता की पहचान और पंजीकरण किया जाना था। मतपेटियाँ बनायी जानी थीं। मतदान केन्द्र स्थापित किये जाने थे। चुनाव चिह्न तैयार करने थे।

सेन ने केवल एक नहीं बल्कि दो उल्लेखनीय चुनाव – 1952 और 1957 में सम्पन्न कराये। उनके सबसे छोटे भाई, अमिया सेन वह डॉक्टर थे जिन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर के अन्तिम समय में उनकी देखभाल की थी। टैगोर ने मृत्यु से पहले एक कविता बोलकर लिखवायी जिसे अमिया सेन ने अपने हाथों से दर्ज की।  

नहीं, मैंने सुकुमार सेन को किसी भी प्रकार की दीवानी या आपराधिक कार्यवाही से बचाव नहीं प्रदान किया। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने शान्तिपूर्वक कुलपति के रूप में सेवा की।

एक और मामले में मैं आपसे अधिक भाग्यशाली था। स्वाधीनता संग्राम में मेरी भूमिका के कारण मेरे लिए चुनाव जीतना अपेक्षाकृत आसान था। मैं बिरले ही मंदिरों, मस्जिदों या गिरिजाघरों में जाता था, और तब भी लोग मुझपर इतना भरोसा करते थे कि मुझे वोट देते थे।

1952 में काँग्रेस ने 44.99 प्रतिशत वोट के साथ 489 में से 364 सीटों पर जीत हासिल की। 1957 में 47.77 प्रतिशत वोट के साथ 494 में 371 सीटों पर जीत हासिल की। 1962 में मेरे आख़िरी चुनाव में पार्टी ने 494 में से 361 पर 44.77 प्रतिशत वोट के साथ जीत हासिल की।  

आपकी पार्टी द्वारा जीती गयी सीटों और मत प्रतिशत का उल्लेख करना मेरी अनुदारता होगी।

फिर भी मैं कल्पना कर सकता हूँ कि 2024 में बनारस में शुरुआती रुझानों में कॉंग्रेस के उम्मीदवार के पीछे चलने पर आपको कैसा महसूस हुआ होगा। या तब जब तमिलनाडु में आपकी पार्टी एआईएडीएमके के साथ गठबन्धन के बावजूद केवल एक सीट हासिल कर सकी।

मैंने भाखड़ा नंगल और हिरकुट बाँध के निर्माण को प्राथमिकता दी जिन्हें मैंने आधुनिक भारत का मन्दिर कहा था। ये उस जनता का प्रतीक थे जो विज्ञान और समूहिक प्रयास के माध्यम से भूख, बाढ़ और सूखे पर विजय पाने के लिए दृढ़ थे।

मुझे यहाँ किसी से यह सुनकर अचम्भा हुआ कि आप जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ों को गंगा आरती के दर्शन करवाने ले गये थे। मुझे याद है कि मैं चीन के प्रधानमंत्री चाउ-एन-लाई को भाखड़ा-नंगल बाँध दिखाने पंजाब ले गया था। शायद ये दोनों घटनाएँ अपने-अपने समय की सोच और प्राथमिकताओं को दर्शाती हैं। इतिहास में, शायद, इन दोनों की अपनी जगह हैं। 

तकनीक ने आपके लिए मन की बात के ज़रिये आपकी आवाज़ को भारत के हर कोने तक पहुँचना आसान बना दिया है। मुझे सिर्फ़ ख़तों का सहारा था। जेल में मुझे खाली समय ज़रूर मिला, लेकिन मैंने लिखने में उसका उपयोग किया। कारावास के दौरान मैंने किताबें लिखीं, क्योंकि यही मेरा देश की जनता के साथ बातचीत का ज़रिया था।

बतौर प्रधानमंत्री भी मैं लगातार ही मुख्यमंत्रियों को ख़त लिखा करता था क्योंकि मेरे अनुसार संघीय लोकतंत्र के लिए संवाद, प्रोत्साहन, व्याख्या बेहद ज़रूरी है। 

इसी क्रम में 15 अक्तूबर, 1947 को लिखे मेरे सबसे पहले पत्रों का अंश उद्धृत करना चाहूँगा :

“हमारे यहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यकों की इतनी बड़ी आबादी है कि वे अगर चाहें भी तो कहीं नहीं जा सकते। उन्हें भारत में ही रहना पड़ेगा। यह एक बुनियादी तथ्य है जिसपर बहसबाज़ी मुमकिन नहीं। हमें एक लोकतान्त्रिक देश में उन्हें सुरक्षा और नागरिक अधिकार देने होंगे।“

8 दशक बाद भी मेरे अनुसार ये शब्द प्रासंगिक हैं।

मेरे समझता हूँ कि आप मुख्यमंत्रियों को ख़त नहीं लिखा करते। आपके पास ‘X’ और अन्य सोशल मीडिया माध्यम हैं जिसके ज़रिये आप लोगों से सीधे मुख़ातिब होते हैं। मुझे यह भी बताया गया है कि आपकी किताब ‘एक्ज़ाम वॉरीयरस’ युवा पाठकों के बीच ख़ासी लोकप्रिय है। अपने कार्यकाल के दौरान मैं किताबें नहीं लिख सका। 

आपके विपरीत, मुझे हर भाषण की तैयारी करनी पड़ती थी। मैं विषय का अध्ययन करता, नोट्स लेता, मसौदों में संशोधन करता और इस तरह भाषण तैयार करता। आपके पास टेलीप्रोंप्टर की सुविधा है। 

इस अद्भुत उपकरण के बारे में मुझे ज़्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन मुझे बताया गया है कि यह वक्ता को भाषण को रटने के बोझ से मुक्त कर देता है। मेरे दौर में प्रधानमंत्री कार्यालय बेहद छोटा था। वह आज कि तरह के न भाषण तैयार कर सकता था, न ही उन्हें पारदर्शी स्क्रीन पर प्रदर्शित कर सकता था।

शायद टेलीप्रोंप्टर के इस्तेमाल के बचा समय नोटबन्दी जैसी साहसिक योजनाओं को बनाने और लागू करने में मददगार हो। हमें ऐसी सुविधाएं प्राप्त नहीं थीं।

हमारे समय में यात्रा करना अपने आप में एक काम होता था। कई गंतव्य स्थानों के लिए कोई सीधी उड़ान नहीं थी। संयुक्त राज्य कि यात्रा में कई स्थानों पर रुकना पड़ता था, अंजान हवाई अड्डों पर लम्बा और थकान भरा इंतज़ार करना होता था। आज आपके पास ऐसे विमान मौजूद हैं जो कुछ घण्टों के भीतर आपको महाद्वीपों के पार ले जा सकते हैं। मुझे बताया गया है कि अब नई दिल्ली से न्यू यॉर्क का सफ़र 14 घण्टे में पूरा किया जा सकता है। 

प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचने के लिए मैं आपको दोष नहीं देता हूँ। आपके पास मौजूद सोशल मीडिया के ज़रिये आप बिना किसी रुकावट या अहसहज सवाल का सामना किए संवाद कर सकते हैं। इसके विपरीत मुझे पत्रकारों से मिलना होता, सवालों का जवाब देना होता और अनिश्चितता के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस का सामना करना पड़ता। 

मेरी एक आलोचना इस बात पर होती है कि मैंने आईआईटी और एम्स जैसे संस्थानों को खड़ा करते हुए प्राथमिक शिक्षा पर नाकाफ़ी ध्यान दिया। इस आलोचना में सच्चाई का कुछ पुट है।

यह मेरी ग़लती रही कि मैंने स्कूली शिक्षा का भार राज्यों पर छोड़ दिया। मैंने साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए छात्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। आपने दूसरे रास्ते को वरीयता दी है, आप जनता के ख़र्च पर हर वर्ष छात्रों को अपने साथ संवाद के लिए आमंत्रित करते हैं। 

मैं मानता हूँ कि मेरी भाषा इतनी कल्पनाशील नहीं थी। विकास में पीछे रह गये ज़िलों को मैं “पिछड़े ज़िले” कहा करता था। आप उन्हें “आकांक्षी ज़िले” कहते हैं। यह अधिक विनीत और शायद ज़्यादा बुद्धिसंगत अभिव्यक्ति है। उम्मीद अक्सर दया से अधिक प्रेरणा देती है। 

आपके विपरीत, मुझे बुद्धिमान और आज़ाद ख़याल के लोगों के साथ काम करना पड़ता था। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी मुझसे असहमत हुए और इस्तीफ़ा दे दिया। डॉ बी आर अम्बेडकर ने मेरा मंत्रिमण्डल छोड़ दिया। सी डी देशमुख मतभेदों के बाद अलग हो गये। जॉन मथाई भी चले गये। लाल बहादुर शास्त्री बिना डर के अक्सर असहमति जताते थे। एक रेल दुर्घटना की ज़िम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। 

मुझे खुशी है कि आपके मंत्री कभी सार्वजनिक रूप से आपकी आलोचना नहीं करते। मैंने यह भी सुना कि उपराष्ट्रपति के तौर पर जब जगदीप धनखड़ ने अपने पद को प्रधानमंत्री के पद से स्वतंत्र सत्ता समझा तो उनका क्या हुआ। समय के साथ-साथ महत्वकांक्षाओं का प्रबन्धन अधिक प्रभावी हो गया है।

मैं आपके पहनावे का प्रशंसक हूँ। कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि आप महज़ कपड़े नहीं पहनते बल्कि पोशाक बकायदा तैयार करते हैं। 

हमारे ज़माने में एक ही वस्त्र को तब तक इस्तेमाल किया जाता था जब तक उसे बदल देने कि ज़रूरत न पड़ जाये। भारत की भीषण गर्मी में ताज़गी बनाये रखना मुश्किल था। सर्दियों में थोड़ी राहत थी। मैं निश्चित ही यह जानना चाहूँगा कि आप इतने व्यवस्थित और विविध परिधानों में पेश हुआ करते हैं।

अध्यात्म के बारे में मुझे ज़्यादा जानकारी नहीं है। मैं अज्ञेयवादी था और धार्मिक कर्मकाण्डों को संशय की नज़र से देखता था। आप अक्सर मंदिरों में दर्शन करते हैं, प्रसाद लेते हैं और पूरी तन्मयता के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। क्या आपके सतत्तर की उम्र में असाधारण ऊर्जा और युवा रूप का यही स्रोत है?

मैं जानता हूँ की चीन की दीवार का चाँद पर से दिखना एक मिथक है। इसके लिए इंसान की आँखों को कई हज़ार गुना शक्तिशाली होना चाहिए था।

मैं सरदार पटेल के सम्मान में बनायी गयी आपकी स्टेचू ऑफ़ यूनिटी के बारे में यही बात विश्वास के साथ नहीं कह सकता। मुझे बार-बार बताया जाता है कि पटेल और मैं विरोधी थे। सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा जटिल है।

वे मुझसे बड़े थे। उनका स्वभाव और सोच मुझसे अलग थी। हम बहस करते, असहमति दर्ज करते और अक्सर एक दूसरे से खिन्न हो जाया करते। इसके बावजूद, हमें नवस्वतंत्र भारत की सेवा में साथ काम करने में कोई रुकावट नहीं हुई। 

वे 71 की उम्र में गृह मंत्री बने और 1950 में उनका निधन हो गया। उनका जाना व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए और राजनीतिक तौर पर पूरे देश के लिए एक बड़ी क्षति थी। हमारे बीच मतभेद थे, लेकिन परस्पर सम्मान भी था। आज के सार्वजनिक जीवन को यह याद कर शायद फ़ायदा हो कि असहमति से स्नेह ख़त्म होना ज़रूरी नहीं, और प्रतिस्पर्धा से शिष्टाचार ख़त्म होना ज़रूरी नहीं।

इस ख़त के अन्त में मैं पुनः आपको आपके अनूठे कार्यकाल के लिए बधाई देता हूँ।

हर प्रधानमंत्री अपने पूर्ववर्ती द्वारा गढ़े गये देश को विरासत में हासिल करता है और अपनी निर्णय के आधार पर बदले भारत को विरासत में छोड़ जारता है। आपने एक ऐसे देश को विरासत में पाया जो 1947 में मुझे मिले भारत से ज़्यादा शक्तिशाली, समृद्ध और आत्मविश्वास से परिपूर्ण था।

आप अपने विश्वासों के अनुसार भारत की सेवा कीजिये, पर सनद रहे कि संस्थाएँ व्यक्तियों से ज़्यादा स्थायी होती हैं, असहमति का अर्थ बग़ावत नहीं है, बहुमत हमेशा स्थायी नहीं है, और सत्ता की असल परीक्षा इस बात से तय होती है कि वह उनसे कैसा व्यवहार करती है जो उससे असहमत हैं।

उस जगह से मेरा हार्दिक अभिनन्दन जहाँ चुनाव के परिणामों का कोई महत्व नहीं और जहाँ प्रतिष्ठाओं का पुनर्मूल्यांकन होता रहता है।

सादर,

जवाहरलाल नेहरू

(ए जे फ़िलिप का लेख। इंडियन करेंट्स से साभार। अनुवाद : वृषाली श्रुति। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)

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