इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, प्रयागराज के एक फैकल्टी मेंबर पर जाति-आधारित उत्पीड़न और भेदभाव के आरोपों की न्यायिक जांच का आदेश दिया है।
जस्टिस विनोद दिवाकर ने एक बीए एलएलबी (ऑनर्स) स्टूडेंट के आरोपों की जांच के लिए स्मॉल कॉज़ कोर्ट की जज अर्चना सिंह और चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट अरुण कुमार यादव को नियुक्त किया। ये आरोप लॉ डिपार्टमेंट के हेड और बॉयज़ हॉस्टल के वार्डन डॉ. दीपक शर्मा पर लगाए गए हैं।
16 सितंबर को जारी आदेश में कोर्ट ने कहा कि आरोप गंभीर हैं और आरोपी एकेडमिक व्यक्ति को अपनी बात रखने का पूरा मौका देने के बाद निष्पक्ष तरीके से इनकी जांच की जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा, “जांच का मकसद यह पता लगाना होगा कि क्या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को प्रतिवादी नंबर 6, या यूनिवर्सिटी में काम करने वाले या यूनिवर्सिटी के लिए काम करने वाले किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जाति-आधारित अपमान या भेदभाव का शिकार बनाया गया है, और क्या इस संबंध में की गई शिकायतों पर यूनिवर्सिटी ने लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई की है।”
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जांच अधिकारियों के सामने बयान देने वाले किसी भी छात्र की पहचान सुरक्षित रखने के लिए सभी उपाय किए जाएं।जांच 24 सितंबर से पहले पूरी करने का आदेश दिया गया है। कोर्ट ने कहा कि जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सौंपी जानी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जांच पूरी होने तक डॉ. शर्मा को सभी प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त रखा जाए। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि उसने उनके या किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया है।
कोर्ट ने यह आदेश पीड़ित छात्र के साथ एक पीएचडी स्कॉलर द्वारा दायर याचिका पर दिया। बताया गया कि छात्र ने पहले कुलपति के पास शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन बार-बार याद दिलाने के बावजूद डॉ. शर्मा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।
20 अगस्त को दायर शिकायत में आरोप लगाया गया कि शर्मा, जो “उच्च जाति” समुदाय से हैं, ने छात्र की जाति के कारण उसकी उत्तर पुस्तिकाओं का अधिक सख्ती से मूल्यांकन किया। यह भी आरोप है कि शर्मा ने कई मौकों पर छात्र की जाति और उसे मिलने वाले आरक्षण के लाभों के बारे में टिप्पणियां कीं।
शिकायत पर विचार करते हुए, कोर्ट ने कुलपति को एक स्वतंत्र समिति गठित करने का निर्देश दिया ताकि पांचवें सेमेस्टर में आरोपी द्वारा पढ़ाए और मूल्यांकित किए गए विषयों में छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन किया जा सके।
कोर्ट ने निर्देश दिया, “समिति यह प्रक्रिया पूरी करेगी और एक सप्ताह के भीतर वाइस चांसलर को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, और वाइस चांसलर सुनवाई की अगली तारीख पर इस कोर्ट के समक्ष रिपोर्ट पेश करेंगे।”
कोर्ट ने वीसी को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि इस मामले में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने या जांच के दौरान दिए गए किसी भी बयान के लिए किसी भी याचिकाकर्ता को शैक्षणिक या प्रशासनिक रूप से किसी प्रतिकूल परिणाम का सामना न करना पड़े।
इसके अलावा, कोर्ट ने निर्देश दिया कि डॉ. शर्मा को याचिकाकर्ता-छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन, या किसी भी याचिकाकर्ता से संबंधित किसी भी अनुशासनात्मक या छात्रावास-संबंधी मामले में कोई भूमिका नहीं दी जाएगी।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)