जलवायु परिवर्तन से वनीला के पौधों के विलुप्त होने का खतरा

जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी परिणाम सामने आ रहे हैं। धरती का तापमान बढ़ने से समुद्र और धरती पर ढेरों जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों की दुर्लभ प्रजातियाँ प्रतिदिन नष्ट हो रही हैं। खाद्य चक्र के टूटने के कारण कई दुर्लभ पौधों की प्रजातियाँ समाप्त हो रही हैं, जो अपने परागण के लिए उन कीट-पतंगों पर निर्भर थीं, जो अब बढ़ते तापमान के कारण विलुप्त हो रहे हैं। इन्हीं में एक पौधा वनीला का भी है।

जलवायु परिवर्तन वनीला के पौधों के आवास की परिस्थितियों को बदल रहा है, जिसके कारण विश्व भर में पैदा होने वाले वनीला की उपज पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है। बेल्जियम की ल्यूवेन यूनिवर्सिटी और कोस्टा रिका यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक टीम ने वनीला के पौधों पर शोध किया है। इस शोध का नतीजा फ्रंटियर्स इन प्लांट साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि चरम जलवायु परिस्थितियाँ जंगली वनीला की प्रजातियों के आवास को प्रभावित कर रही हैं। पहले ये पौधे और इनका परागण करने वाले कीट मुख्य रूप से मध्य अमेरिका के उष्णकटिबंधीय इलाकों में पाए जाते थे। मैडागास्कर विश्व में वनीला का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, इसके बाद इंडोनेशिया का स्थान आता है। इसके अलावा, चीन, मेक्सिको और पापुआ न्यू गिनी भी वनीला के प्रमुख उत्पादक देशों में शामिल हैं। मैडागास्कर बीते कुछ वर्षों में पर्यावरणीय समस्याओं के कारण कई बार सुर्खियों में रहा है।

वनीला एक मसाला है, जो वनीला ऑर्किड की फलियों से प्राप्त होता है। अपने मधुर स्वाद और खुशबू के कारण यह विभिन्न प्रकार के भोजन और मीठे व्यंजनों में उपयोग किया जाता है। आइसक्रीम और बेकिंग सहित कई मीठी चीज़ों में वनीला स्वाद को कई गुना बढ़ा देता है। वनीला एक्सट्रैक्ट, वनीला पाउडर, वनीला पेस्ट और वनीला शुगर जैसे विभिन्न रूपों में इसका उपयोग होता है।

आइसक्रीम की दुनिया में वनीला कई वर्षों से सबसे पसंदीदा फ्लेवर रहा है। कई आइसक्रीम ब्रांड की कुल बिक्री का लगभग आधा हिस्सा केवल वनीला फ्लेवर से ही आता है। इसके अलावा, कुछ नमकीन व्यंजनों में भी वनीला डालकर स्वाद के नए आयाम पैदा किए जाते हैं।

वनीला का परागण मुख्य रूप से कीटों द्वारा होता है। ऐसे में कुछ क्षेत्र इस पौधे के लिए अधिक अनुकूल हो सकते हैं, लेकिन वही क्षेत्र अब उन कीटों के लिए उपयukt नहीं हैं, जो वनीला का परागण करते हैं। इन बदलावों का परिणाम यह हो सकता है कि भविष्य में पौधों और उनके परागण करने वाले कीटों के आवास अलग-अलग हो जाएँ। जाहिर है, इससे परागण में कमी आएगी। जंगली वनीला प्रजातियों की राष्ट्रीय आबादी और उनकी विशाल जेनेटिक विविधता, जो वनीला के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है, खतरे में है।

शोधकर्ताओं ने मॉडलों का उपयोग कर 2050 तक दो जलवायु परिस्थितियों में 11 वनीला प्रजातियों और सात कीट प्रजातियों के फैलाव वाले क्षेत्रों का विश्लेषण किया। इनमें एक परिस्थिति मध्यम स्तर की है, जिसमें कुछ हद तक जलवायु सुरक्षा है, जबकि दूसरी में अधिक संघर्ष और कम जलवायु सुरक्षा है। इन मॉडलों के आधार पर सभी कीट प्रजातियों के लिए उपयुक्त आवास में कमी की भविष्यवाणी की गई है, खासकर कम जलवायु सुरक्षा वाले वातावरण में।

व्यावसायिक रूप से उगाए जाने वाले वनीला में जेनेटिक विविधता कम होती है, जिसके कारण यह बीमारियों, सूखे और गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील है। वास्तव में, ये पौधे पहले से ही ग्लोबल वॉर्मिंग का शिकार हो रहे हैं।

शोधकर्ताओं ने इस समस्या से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की माँग की है। उनका कहना है कि अधिक शोध के माध्यम से वनीला की खेती के लचीलेपन को बढ़ाने पर काम किया जाना चाहिए, ताकि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के छोटे किसानों की आजीविका को बचाया जा सके। शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण किसी एक पौधे की प्रजाति का नष्ट होना कोई अकेला मामला नहीं है।

अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के घने वर्षा वनों में ऐसी कई अन्य पेड़-पौधों और कीट-पतंगों की प्रजातियाँ चुपके से नष्ट हो रही हैं, जिनके बारे में वैज्ञानिकों को अभी तक पूरी जानकारी नहीं है। मधुमक्खियों के विलुप्त होने का भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है, जिससे पर्यावरणीय विनाश के साथ-साथ एक बड़े आर्थिक संकट की भी आशंका है। इससे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है।

(स्वदेश कुमार सिन्हा लेखक और टिप्पणीकार हैं)

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