मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति प्रक्रिया मामला बड़ी संविधान पीठ को भेजने की केंद्र की याचिका पर फैसला सुरक्षित

supreme court delhi

देश में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया है कि संसद ने नया कानून बनाते समय मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल से भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को बाहर रखने का फैसला क्यों किया? इसीके साथ सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने की केंद्र सरकार की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि “चुनाव आयोग को न केवल स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए, बल्कि उसे स्वतंत्र रूप से काम करते हुए दिखना भी चाहिए।”

अन्य चयन समितियों से तुलना: पीठ ने टिप्पणी की कि जब सीबीआई (सीबीआई) निदेशक और लोकपाल की नियुक्ति करने वाले चयन पैनल में मुख्य न्यायाधीश शामिल हैं, तो देश के लोकतंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के पदों की चयन प्रक्रिया से सीजेआई  को बाहर रखने का क्या कारण हो सकता है?

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह प्रधानमंत्री पर अविश्वास का मामला नहीं है। पीठ ने कहा- “हम यह नहीं कह रहे हैं कि मौजूदा समिति से निष्पक्षता हासिल नहीं हुई है। लेकिन जैसे न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए, हम उसी दूसरे पहलू की बात कर रहे हैं।”

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अटॉर्नी जनरल (आर. वेंकटरमणी) ने सरकार का पक्ष रखा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि अदालत को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ काम करेंगे। उन्होंने कहा, “लोगों को प्रधानमंत्री पर भरोसा होना चाहिए। अगर उनके फैसलों को अविश्वास की नजर से देखा जाएगा, तो फिर क्या मंत्रिमंडल चुनते समय भी किसी पूर्व न्यायाधीश या बाहरी व्यक्ति से सलाह लेने का प्रावधान होना चाहिए?”

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि केवल इसलिए संसद के कानून पर सवाल नहीं उठाया जा सकता कि कोई दूसरा मॉडल भी संभव था। उन्होंने कहा कि “संसद का मुंह बंद नहीं किया जा सकता” और राज्य के तीनों अंगों (कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका) की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए।

केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि सीजेआई  की जगह कैबिनेट मंत्री को रखने से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती। पिछले सात दशकों से अधिक समय से चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां पूरी तरह कार्यपालिका द्वारा ही की जाती रही हैं और देश में हमेशा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न हुए हैं।

केंद्र सरकार ने आग्रह किया कि इस मामले में कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हैं, इसलिए इसे एक बड़ी संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं (प्रशांत भूषण, गोपाल शंकरनारायणन, डी. शेषाद्रि नायडू और संजय पारिख) ने इस मांग का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि 20 दिनों की लंबी सुनवाई के बाद सरकार अब यह मांग उठा रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पाँच जजों की बड़ी बेंच के पास भेजा जाना चाहिए।

कोर्ट अभी कई ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है जिनमें ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। यह कानून चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को बाहर रखता है। 2023 के इस कानून के प्रावधानों के तहत, चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता शामिल होते हैं।

इससे पहले वर्ष 2023 में ही सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने निर्देश दिया था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक चयन पैनल में प्रधानमंत्री, सीजेआई और विपक्ष के नेता शामिल रहेंगे। हालांकि, संसद ने बाद में कानून बनाकर सीजेआई की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया।

जनहित याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि चयन समिति से सीजेआई को बाहर रखने से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता कमज़ोर होती है। कांग्रेस नेता जया ठाकुर और ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ सहित कई याचिकाकर्ताओं ने इस कानून को चुनौती दी है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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