Tuesday, October 4, 2022

एमपी के एक चैनल ने शुरू किया महिलाओं के लिए पीरियड लीव

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साल 2018 में श्वेता रानी भारद्वाज एक रिसर्च एसोसिएट कम कंटेंट क्रिएटर के तौर पर हाइटेक सिटी, हैदराबाद में जॉब कर रही थीं। माहवारी शुरू होने पर उन्होंने मेल भेज कर अवकाश मांगा तो श्वेता को मेल की भाषा में माहवारी का जिक्र न करने के लिए कहा गया था, इस पर श्वेता ने कम्पनी को महिलाओं के उन दिनों की गम्भीरता से अवगत कराया। श्वेता को पीरियड लीव के लिए आवाज उठाने का नतीजा अपनी नौकरी छूटने के रूप में मिला।

 लैंगिक समानता की बात बोलते हुए तो अच्छी लगती है पर सच यह है कि वास्तव में अभी ये समानता दूर की कौड़ी है। माहवारी के दौरान होने वाली परेशानियों को किसी से साझा न कर पाने की वजह से महिलाएं आज भी उन दिनों में घुट कर जीती हैं।

तेजी से भागते जमाने में अब उन दिनों के बीच महिलाओं को अच्छा माहौल देने के लिए विश्व के अन्य देशों के साथ-साथ भारत में भी आवाजें उठ रही हैं। लोकसभा में महिलाओं के माहवारी वाले दिनों में  अवकाश दिलाने के लिए ‘The Menstruation Benefit Bill 2017’ पेश हुआ था पर बात बनी नहीं।

सरकार नए श्रम कानून में जहां काम के घण्टों की संख्या 8-9 से बढ़ाकर 12 घंटे करने की सोच रही है ,वहीं ऐसे हालातों में भी मध्य प्रदेश के न्यूज पोर्टल ‘एमपी ब्रेकिंग न्यूज‘ ने अपने यहां कार्यरत महिला कर्मचारियों को महीने में 2 दिन की पीरियड लीव देने का निर्णय लिया है।

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एमपी ब्रेकिंग न्यूज के सम्पादक गौरव शर्मा कहते हैं कि महिलाओं के पीरियड्स या माहवारी में कोई ऐसी बात नहीं है जो छुपाने वाली हो। संस्था में इस अवकाश को लागू कराने के लिए हमारे न्यूज पोर्टल के मुख्य सम्पादक वीरेंद्र कुमार शर्मा, सीईओ श्रुति कुशवाहा और मेरे बीच मात्र पांच मिनट का डिस्कशन हुआ जिसके बाद हमने इसे लागू कर दिया।

आज के दौर में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो महिलाओं की इन दो-तीन दिन होने वाली असहनीय तकलीफ को नहीं देखता।

इसी महीने से हमने इस अवकाश को शुरू कर दिया है और हम उम्मीद करते हैं कि ये और जगह भी लागू हो।

पोर्टल की सीईओ श्रुति कुशवाहा इस बारे में कहती हैं कि दुनिया भर में पीरियड लीव को लेकर मुहिम छिड़ी हुई है। लेकिन हम तो अब भी उसी मानसिकता से संघर्ष कर रहे हैं जहां अक्सर ये माना जाता है कि महिलाओं को नौकरी पर रखो तो वो कभी मैटरनिटी लीव पर चली जाएंगी, कभी चाइल्ड केयर लीव पर। इसे लेकर कितने जोक्स क्रेक किये जाते हैं, मज़ाक बनाया जाता है, बेहूदा कमेंट किये जाते हैं। ऐसे में पीरियड लीव की बात पर संवेदनशीलता की उम्मीद करना बेमानी ही लगता है।

लेकिन आज मेरे लिए इस मामले में एक कदम आगे बढ़ना संभव हुआ है। मैं जिस संस्थान MP Breaking News में कार्यरत हूं, वहां फीमेल स्टाफ को महीने में 2 दिन की पीरियड लीव दिए जाने का निर्णय लिया गया है। संभवतः किसी मीडिया संस्थान में ये नियम लागू करने वाले हम पहले हैं। इस निर्णय में मैं भी सहभागी हूं और मेरे लिए निजी खुशी भी है क्योंकि ये भी कई संघर्षों में से एक रहा है।

खास बात ये कि हमारे संस्थान में ‘वर्क फ्रॉम होम’ व्यवस्था लागू है और कुछ महिला सदस्य तो ऐसी हैं जिनसे मैनेजमेंट कभी आमने सामने मिला ही नहीं। केवल फोनो/ऑनलाइन इंटरव्यू हुआ और उन्होंने घर से काम शुरू कर दिया। उम्मीद है कि इस मुद्दे पर जागरूकता बढ़ेगी तथा अधिक से अधिक कार्यस्थलों पर पीरियड लीव का नियम लागू किया जाएगा।

पोर्टल की सीईओ श्रुति कुशवाहा

श्रुति कुशवाहा आगे कहती हैं कि उन्हें ‘वजूद औरत का’ किताब का ‘अगर पुरूष को मासिक धर्म होता’ निबंध पढ़कर पूरे देशभर में महिलाओं के लिए यह पीरियड लीव शुरू करवाने की इच्छा होती है । इस किताब में ग्लोरिया स्टायनेम और एक्टिविस्ट रुचिरा गुप्ता ने साथ मिलकर ग्लोरिया के कुछ अभूतपूर्व निबन्‍धों को प्रस्तुत किया है और इस किताब का हिंदी अनुवाद भावना मिश्रा द्वारा किया गया है। ‘अगर पुरुष को मासिक धर्म होता’ निबंध का एक अंश इस प्रकार है।

निबंध अंश

अगर किसी जादू से अचानक पुरुषों में मासिक धर्म शुरू हो जाए और स्त्रियों में बंद हो जाए ,तो सोचो भला क्या होगा? जाहिर है कि, मासिक धर्म एक ईर्ष्या योग्य, गौरव करने लायक और पुरुषोचित घटना हो जाएगी। पुरुष इस बारे में शेखी बघारेंगे कि उन्हें कितने दिनों तक और कितना रक्तस्त्राव हुआ। नौजवान लड़के ईर्ष्या योग्य मर्दानगी की शुरुआत के दिनों में इस पर चर्चा करेंगे। तोहफे, धार्मिक संस्कार, पारिवारिक रात्रिभोज और कुँवारे लड़कों की अश्लील पार्टी का आयोजन करके इसके होने के दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाएगा।

(हिमांशु जोशी लेखक हैं और आजकल उत्तराखंड में रहते हैं।)

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