Wednesday, October 5, 2022

पाटलिपुत्र की जंग: टिकट की दौड़ में सिपाही से मात खा गए पूर्व पुलिस मुखिया गुप्तेश्वर!

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पटना। सियासत के खेल में 11 वर्ष बाद एक बार फिर गुप्तेश्वर पांडे झटका खा गए। शराबबंदी की घोषणा के बाद सुशासन बाबू की नजरों में चहेते बने 1987 बैच के आईपीएस गुप्तेश्वर पांडे ने 22 सितंबर को पुलिस प्रमुख की कुर्सी छोड़ जेडीयू का दामन थामा। इसके साथ ही बक्सर या ब्रह्मपुर की सीट से विधानसभा चुनाव या वाल्मीकि नगर सीट से पार्लियामेंट उपचुनाव में उतरने की चर्चा शुरू हो गई। लेकिन इन सीटों पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा हो जाने के बाद पूर्व डीजीपी को लेकर चल रहे अटकलों पर विराम लग गया है। सोशल मीडिया पर पूर्व डीजीपी के टिकट की दौड़ में गच्चा खाने पर चहेते अफसोस जता रहे हैं, हालांकि जदयू नेतृत्व के गुप्तेश्वर पांडे को लेकर ‘गुप्त’ एजेंडा तय करने की बात भी कही जा रही है। जिसमें वेटिंग एमएलसी के रूप में भी अब अटकलें जोरों पर हैं।

गुप्तेश्वर पांडे अपने कार्यकाल में किसी न किसी रूप में चर्चा में रहे। पुलिस अफसर के प्रोटोकाल से आगे बढ़कर सुशासन बाबू को लेकर उनके दिए जाने वाले बयानों में राजनीति का अश्क पहले से ही नजर आते रहा है। विरोधी दलों के आरोप इनके जदयू की सदस्यता ग्रहण करने के बाद आखिरकार सही साबित हुए। फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के मौत के बाद पुलिस प्रमुख ने महाराष्ट्र पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाया, तो सुशांत की करीबी अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के एक बयान पर तल्ख टिप्पणी की। 

मौत को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद डीजीपी ने मीडिया से सवाल के जवाब में कहा था कि मुख्यमंत्री पर टिप्पणी करने की औकात रिया चक्रवर्ती की नहीं है। हालांकि उन्होंने इस पर बाद में सफाई देते हुए माफी भी मांग ली। गोपालगंज जिले के कुचायकोट सीट से सत्ताधारी दल के बाहुबली विधायक अमरेंद्र पांडे उर्फ पप्पू पांडे व उनके भाइयों के तिहरा हत्याकांड में शामिल होने व प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव के घटना को लेकर हमलावर रुख अपनाने पर गुप्तेश्वर पांडे आगे आए। एक वीडियो जारी कर घटना की निष्पक्ष जांच कराने व आरोपों से संबंधित कुछ तथ्यों का खंडन करने को लेकर उनकी चर्चा जोरों पर रही। उसके चंद दिनों बाद ही पुलिस प्रमुख ने वीआरएस ले लिया।

इसके बाद राजनीति में आने की अटकलें लगाई जाने लगीं। हालांकि शुरुआत में उन्होंने इसका खंडन किया। लेकिन कुछ दिन बाद ही ना ना करते जदयू का दामन थामने के साथ ही टिकट की दौड़ में शामिल हो गए। लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रमुख घटक भाजपा के कोटे में बक्सर व ब्रह्मपुर सीट चले जाने पर उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। हालांकि पूर्व में ऐसी कई परिस्थितियों में सहयोगी दल के चुनाव चिन्ह पर लोग भाग्य आजमाते रहे हैं। लेकिन यह चर्चा है कि उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी व केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे को गुप्तेश्वर पांडे किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं थे।

 बैजनाथ महतो के निधन के बाद वाल्मीकि नगर सीट खाली होने पर हो रहे उपचुनाव को लेकर पार्टी ने उनके बेटे को उम्मीदवार घोषित कर दिया है। ऐसे में गुप्तेश्वर पांडे इस सीट को लेकर भी अब ना उम्मीद हो गए हैं। राजनीति में अटकलों का खेल हमेशा चलता रहा है ऐसे में अब विधानसभा चुनाव लड़ने की उम्मीद खत्म होने के बाद कुछ लोग एमएलसी बनने की बात कर रहे हैं। जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि नेतृत्व ने विधान परिषद में गुप्तेश्वर पांडे को भेजने का आश्वासन दिया है हालांकि पूर्व पुलिस प्रमुख ने इस तरह की किसी चर्चा पर हामी नहीं भरी है। फिलहाल पूर्व डीजीपी ने राजनीति में जब कदम रख दिया है तो वेटिंग एमएलसी के रूप में चर्चा बनी रह सकती है।

रॉबिनहुड की शक्ल में आए नजर

गुप्तेश्वर पांडे वर्ष 2009 में भी पार्लियामेंट चुनाव में हिस्सा लेने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लिए थे। लेकिन टिकट न मिलने पर आवेदन वापस लेकर फिर नौकरी में लौट आए। एक बार फिर वीआरएस लेने के बाद 22 सितंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मौजूदगी में जदयू की सदस्यता ग्रहण की। इस दौरान उनसे संबंधित एक म्यूजिक वीडियो लांच हुआ जिसमें वे रॉबिनहुड की मुद्रा में नजर आए। इसके पूर्व बेवर जेल में बंद मोकामा के बाहुबली नेता अनंत सिंह ने भी गीतकार उदित नारायण की आवाज में एक म्यूजिक वीडियो लांच किया था। जिसमें वो पटना की सड़कों पर बग्गी में चलते हुए नजर आ रहे थे।

टिकट की दौड़ में सिपाही ने पछाड़ा डीजीपी को

बक्सर सीट से भाजपा ने परशुराम चतुर्वेदी को उम्मीदवार बनाया है। इसी सीट से गुप्तेश्वर पांडे चुनाव लड़ना चाहते थे। भाजपा उम्मीदवार परशुराम चतुर्वेदी बिहार पुलिस में तैनात रहे। सेवानिवृत्त होने के बाद भाजपा की राजनीति से जुड़ गए। आखिरकार नेतृत्व ने उनके नाम पर मुहर लगा दी है। बिहार की राजनीति में एक उदाहरण सोम प्रकाश भी हैं। वर्ष 2010 में दरोगा की नौकरी छोड़कर औरंगाबाद जिले के ओबरा विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़े तथा पुलिस अफसर  के रूप में अपने कार्यों को लेकर लोकप्रिय रहने का प्रतिफल मिला और मतदाताओं ने उन्हें भारी बहुमत से चुनाव जिताया।

पुलिस अफसरों को नकारती रही है जनता

पूर्व डीजी डीपी ओझा ने वर्ष 2004 में बेगूसराय सीट से निर्दलीय चुनाव लड़कर भाग्य आजमाया था लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। बिहार में डीजी रहे आशीष सिन्हा नौकरी छोड़ कर राजद से जुड़े। वे बाद में 2014 के संसदीय चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर नालंदा से चुनाव लड़े लेकिन। उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। पूर्व डीजी आरआर प्रसाद को तो बिहार की राजनीति में पंचायत चुनाव तक में भी मात खानी पड़ी।

(जितेंद्र उपाध्याय स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल पटना में रहते हैं।)

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