Friday, August 12, 2022

गुजरात मॉडल में प्रतिबंधित है दलितों का किसी मंदिर में प्रवेश!

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अहमदाबाद/बचाऊ। गुजरात का कच्छ देश का सबसे बड़ा जिला है। 45674 वर्ग किलो मीटर का इसका क्षेत्रफल केरल और हरियाणा जैसे राज्यों से भी बड़ा है। 26 जनवरी 2001 को जब देश अपना 52 वां गणतंत्र दिवस मना रहा था। उस समय कच्छ भूकंप से दहल गया। इस भूकंप में 13200 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई थी और लगभग 340000 बिल्डिंगें जमींदोज हो गई थीं। भूकंप का एपिसेंटर बचाऊ तहसील का चोबरी गांव था। 20 वर्ष बाद अब लोगों को भूकंप का एपिसेंटर भले ही याद न हो लेकिन जातिवादी हिंदुत्वादी लोगों को हजारों वर्ष पहले बनी वर्ण व्यवस्था अब भी याद है। 24 अक्तूबर को बचाऊ तहसील के ही नेर गांव के लोगों ने अपने ही गांव के 65 वर्षीय जग्गा भाई वाघेला और उनके परिवार को पीट डाला क्योंकि जग्गा भाई दलित समुदाय से होते हुए गांव में बने मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

पीड़ित भूरा भाई जग्गा भाई वाघेला बताते हैं, ” पांच छ साल पहले गांव के सार्वजनिक स्थान पर राम के मंदिर का निर्माण हुआ था। गांव के दलित भी इस मंदिर में आस्था रखते थे। निर्माण में चंदा भी दिया था और प्राण प्रतिष्ठा में शामिल भी होना चाहते थे। लेकिन शुरू से गांव के दबंग और कट्टर सोच वाले मंदिर में दलितों के प्रवेश के खिलाफ थे। जिस कारण प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम बार-बार टल रहा था। 20 अक्तूबर को राम के बुत में प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में अन्य जाति के लोग दलितों के मंदिर प्रवेश का विरोध कर रहे थे। प्रशासन के दखल के बाद दबंग मंदिर के बाहर से दर्शन के लिए तैयार हुए लेकिन दलितों की भी जिद थी दर्शन के लिए मंदिर में प्रवेश करेंगे। गांव के अन्य जाति वालों ने पुलिस और प्रशासन को भी साफ कह दिया था कि दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा।

प्रशासन ने दलितों के मंदिर प्रवेश के विरोध को देखते हुए 20 अक्तूबर को DySP, 3 PI, 8 PSI, 200 लेडी पुलिस और 90 SRP का बंदोबस्त कर दिया था। पुलिस और प्रशासन की उपस्थिति में गांव के दलितों ने राम के मंदिर में प्रवेश किया जिससे अन्य समुदाय के दबंग नाराज़ हो गए हैं।” नेर गांव में सबसे बड़ी संख्या कोली समाज की है। गांव में लगभग 90-100 घर कोली , 70-80 घर अहीर , 65 – 75 घर भरवाड़ , 30-35 ब्राह्मण ,13 घर दलित और 7-8 घर भील समुदाय के हैं। राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के नरेश माहेश्वरी बताते हैं, “दलितों के राम मंदिर में प्रवेश के बाद अन्य जातियों द्वारा दलितों का सामाजिक बहिष्कार दुर्भाग्यपूर्ण है। 20 अक्तूबर के बाद गांव के दूध वाले ने दलितों को दूध और किराना वाले ने किराना देने से मना कर दिया था। क्योंकि दलितों ने गांव के अन्य जाति के निर्णय के खिलाफ जाकर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होकर मंदिर में प्रवेश किया था।”

भूरा भाई आगे बताते हैं कि “मंदिर प्रवेश से नाराज़ गांव वालों ने दलितों के खेतों में पशु छोड़ दिए। पशु पूरी फसल खा गए। 24 अक्तूबर को दबंगों ने हमारे घर में आग लगा दी। 26 अक्तूबर को दबंगों ने मुझे और मेरे भाई गोविंद को हमारे ही खेत में बंधक बनाकर बुरी तरह से पिटाई की। दूसरी तरफ हमारे घर पर हमला कर 65 वर्षीय हमारे पिता जग्गा भाई वाघेला , माता बधी बेन , चाचा धनशा भाई , हंसमुख भाई , जमु बेन , खीमजी भाई , दाई बेन इत्यादि को बुरी तरह से पिटाई कर घायल कर दिया”।

गंभीर रूप से घायल जग्गा भाई और उनके परिवार को बचाऊ से डॉक्टरों ने भुज सिविल अस्पताल रेफर कर दिया जो अब गौतम अडानी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (GAIMS)में हैं। भूरा भाई के चाचा धंशा भाई को ऑपरेशन कर प्लेट डाली गई है। लगभग 8 दिन अस्पताल में रहने के बाद 4 तारीख को दिवाली के त्योहार को देखते हुए उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। लेकिन भूरा भाई का कहना है कि सभी लोग स्वस्थ नहीं हुए हैं। इसलिए गंभीर रूप से घायल लोगों को दोबारा अस्पताल भेजने की आवश्यकता है।

जुलाई, 2016 में ऊना की घटना हुई थी जिसमें गौ रक्षकों ने मरी हुई गाय की चमड़ी निकालने के कारण उच्च जाति ( दरबार जाति) के लोगों ने दलित सरवैया परिवार की बेरहमी से पिटाई की थी। घटना का वीडियो वायरल होने के बाद राज्य के दलित संगठन और समाज के लोग आंदोलित हो उठे थे। लेकिन वाघेला परिवार की पिटाई मामले में ऐसा नहीं हुआ। ऊना घटना में सक्रिय रहे दलित चिंतक केवल सिंह राठौड़ संविधान गौरव दिवस की व्यस्तता के कारण नेर गांव नहीं जा सके। केवल सिंह कहते हैं ” हमारे संगठन सामाजिक जागृति एकता मिशन में पच्चास हजार से अधिक सदस्य हैं। संगठन में सभी समुदाय के लोग जुड़े हुए हैं। हमारा कार्यालय गांधीनगर में है। कोई पीड़ित हमसे लिखित में मदद मांगता है तो हम निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मदद के लिए तैयार हैं। नेर गांव के जग्गा भाई और उनके परिवार ने अभी तक हमसे संपर्क नहीं किया है। यदि संपर्क करते हैं तो अवश्य मदद की जाएगी।” केवल सिंह राठौड़ ऊना के रहने वाले हैं। 28 नवंबर को संविधान गौरव दिवस का एक बड़ा आयोजन कर रहे हैं।

कच्छ लोकसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। गांधीधाम विधान सभा जिसमें नेर गांव आता है। वह भी आरक्षित है। सांसद और विधायक दोनों अनुसूचित जाति से हैं। ज़िला कलेक्टर भी अनुसूचित जाति से हैं। इन सबके बावजूद दलितों का मंदिर प्रवेश प्रतिबंधित है। नेर गांव की घटना पर न केवल भाजपा नेता या उनसे जुड़े लोग ही आंख मूंदे हुए हैं बल्कि कांग्रेस पार्टी भी आंख बंद किए हुए है। कांग्रेस पार्टी के विधायक नौशाद सोलंकी पीड़ितों से मिलने ज़रूर गए लेकिन व्यक्तिगत हैसियत से। नौशाद सोलंकी कहते हैं। ” नेर गांव के पीड़ितों से मिलने की पहल भले ही व्यक्तिगत हो लेकिन मेरे वहां जाने से पूरी कांग्रेस शामिल हो गई। ज़िला संगठन के सभी लोग साथ थे।”

सोलंकी आगे बताते हैं, नेर गांव घटना एक छोटा मुद्दा था लेकिन बड़ा हो गया। बात केवल मुद्दे की नहीं है। यह छुआछूत तो है ही। कुछ लोग भड़काने का काम कर रहे हैं। हम सभी लीडरों को ऐसे मामले में भड़काना नहीं चाहिए बल्कि सामाजिक आन्दोलन के द्वारा लोगों को जोड़कर इसका हल निकालना चाहिए। पीड़ितों को आगे भी उसी गांव में रहना है। मंदिर में दलितों को प्रवेश से रोकने की घटनाएं केवल कच्छ जिले में ही नहीं होती हैं बल्कि राज्य के अन्य गावों में भी देखने सुनने को मिलती हैं। इसलिए सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता है।”

नेर गांव में हुई इस छुआ छूत की घटना से नाराज़ दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने कच्छ जिले के रापर तहसील के वर्नू गांव के एक मंदिर में राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के साथियों के साथ मंदिर में प्रवेश किया। वर्नू गांव के इस मंदिर में दलितों के लिए प्रवेश प्रतिबंधित था। मेवानी के मंदिर प्रवेश की घोषणा के बाद पुलिस प्रशासन सक्रियता और समझदारी दिखाते हुए पहले से पुलिस बंदोबस्त कर मंदिर प्रवेश की व्यवस्था कर रखी थी ताकि किसी प्रकार से दलितों और अन्य समुदाय के बीच किसी प्रकार का टकराव न हो। मंदिर प्रवेश के बाद मेवानी ने अन्य समुदाय के लोगों से कहा ” हम यहां अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने नहीं आए हैं। हम आपसे हाथ जोड़कर विनती करने आए हैं। आप सब के बीच सामाजिक सौहार्द बना रहे। सभी समुदाय को नागरिक अधिकार मिले।”

मेवानी ने आगे कहा ” गुजरात में 18000 गांव हैं जहां दलित रहते हैं। मैं राज्य सरकार को चुनौती देता हूं केवल एक गांव को छुआछूत से मुक्त करके बताए।” मेवानी ने भावनगर जिले के छह मंदिरों में प्रवेश करने का ऐलान किया है। जहां दलितों के लिए प्रवेश प्रतिबंधित है। जिग्नेश मेवानी ने ज़िला पुलिस अधीक्षक से मिलकर दलितों को संवैधानिक रूप से मिली ज़मीनें दबंगों से छुड़ाकर दलितों को कब्ज़ा देने के लिए आगाह भी किया। उन्होंने कहा कि इस काम को यदि पुलिस नहीं करती है तो राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच बड़ा आंदोलन करेगा।

जिग्नेश मेवानी के वार्नू गांव के मंदिर प्रवेश और नेर गांव के पीड़ितों से मिलने के कार्यक्रम के बाद राज्य सरकार हरकत में आ गई थी। सरकार ने तुरंत सभी छह पीड़ितों को साढ़े तीन-तीन लाख रुपए (कुल 21लाख) सहयोग का ऐलान कर दिया। 1 अक्तूबर को नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष अशोक हाती के हाथों एक एक लाख का चेक भी पीड़ितों तक पहुंचा दिया। हालांकि चेक देने का काम सामाजिक कल्याण विभाग का था।
राज्य के अन्य दलित संगठन और विपक्षी दल नेर गांव की घटना को बड़ा मुद्दा बनाने से भले ही बच रहे हों लेकिन राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने के मूड में नहीं दिख रहा है। मेवानी 10 नवंबर को एक और आंदोलन का ऐलान कर सकते हैं।

(अहमदाबाद से जनचौक संवाददाता कलीम सिद्दीकी की रिपोर्ट।)

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