Monday, August 15, 2022

लखीमपुर खीरी: लवप्रीत के लिए कुछ आँखें आज भी हर शाम इंतजार करती हैं

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“जैसे हम अपने बेटे के लिए तरस रहे हैं, कभी उसके बच्चे भी अपने बाप के लिए तरसेंगे” यह कहना है तीन अक्टूबर को लखीमपुर की घटना में शहीद हुए लवप्रीत की मां का।

एक कुर्सी पर बैठी लवप्रीत की मां आंखों में आंसू लिए उस दिन को याद करते हुए बताती हैं कि “मैंने लवप्रीत को उस दिन कार्यक्रम में जाने से मना किया था। लेकिन उसने मुझसे कहा कि वह शाम छह बजे तक वापस आ जाएगा।”

वे खुद-ब-खुद कहने लगती हैं, “वह छह बजे की शाम आज तक नहीं आ पाई है, जब मेरा बेटा वापस आ जाए। लेकिन नेताजी की इतनी पावर है कि सारे सबूत उनके बेटे के खिलाफ होने के बाद भी अब वह जेल से बाहर आ गया है। क्या कह सकते हैं। हमारी तो पूरी दुनिया ही उजड़ गई है। हमारा तो एक ही सहारा था।”

लवप्रीत के माता – पिता

मैंने उनसे पूछा कि यूपी में सरकार का कहना है कि गुंडाराज खत्म हो गया है इस पर लवप्रीत की मम्मी थोड़े गुस्से में कहती हैं “गुंडाराज कहां खत्म हुआ? यह तो एक बार फिर से तैयार हो गया है। सरेआम नेता का बेटा बिना किसी खौफ के किसानों को मार देता है और अब घर भी वापस आ गया है।”

वहीं दूसरी ओर जवान बेटे की मौत से सदमे में डूबे पिता सतनाम सिंह मुझसे बात करते हुए कहते हैं कि सिर्फ 4 महीने में बेल नहीं मिलनी चाहिए थी। क्योंकि राज्य में आचार संहिता लगी हुई है चुनाव होने वाले हैं ऐसे में वह कोई भी गतिविधि कर सकता है। जिससे जनता को नुकसान हो सकता है।  वह मंत्री का बेटा है और बेटे की चलती है।

राज्य सरकार और केंद्र सरकार की बात करते हुए सतनाम सिंह कहते हैं कि “इनकी सारी बातें झूठी है।” जमानत का जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि न्यायालय द्वारा जमानत के लिए जो आदेश दिया गया है वह भी गलत है।

बहुत ही धीमी आवाज़ में सतनाम सिंह मुझसे बात करते हैं। हर शब्द के साथ वह बेटे को याद करते हैं। बताते हैं कि “मेरा बेटा बड़ा होशियार था। मुझे बहुत सारी चीज़ें उसे सिखाने की जरूरत नहीं पड़ी। जब वह छोटा था तो एक दिन में ही साइकिल चलाना सीख गया था। हमें इस बारे में पता ही नहीं चला। बाइक भी एक घंटे मे ही सीख ली थी। लेकिन क्या करें इतना होशियार होने के बाद भी वह हमारे पास नहीं रहा।”

एक बार फिर वह घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं कि अब आप खुद ही देखिए यह मामला पूरी दुनिया में हाइलाइटेड था। फिर भी सिर्फ 4 महीने में ही आशीष मिश्रा को जमानत मिल जाती है। वे आशीष मिश्रा की जमानत पर तल्ख स्वर में कहते हैं “अब इस न्याय के बारे में क्या कहें? सरकार अपनी मनमानी कर रही है, अब हमें इनसे किसी तरह की उम्मीद नहीं है।”

मेरे बगल में ही बैठी लवप्रीत की दो छोटी बहनें अपने भाई की फ़ोटो को दिखाती हुई कहती हैं कि भाई को फ़ोटो का बहुत शौक था। लेकिन एक घटना ने हमसे हमारा भाई छीन लिया है। लेकिन हमें उम्मीद है सरकार भले ही हमें न्याय न दे लेकिन ऊपरवाले पर भरोसा है। एक दिन आशीष मिश्रा के साथ भी ऐसा ही होगा। इतना कहते ही दोनों बहनें भावुक हो जाती हैं।

इसके बाद मैं लखीमपुर खीरी के निघासन में आई। निघासन के चौराहे पर किसी से भी रमन के बारे में पूछने पर लगता है कि वे दिवंगत पत्रकार रमन कश्यप के बारे में जानते हैं।

एक दुकानदार से मैंने दिवंगत पत्रकार के घर का पता पूछा और वहां आसानी से पहुंच गई। यहां पहुंची तो देखा, घर के बाहर पुलिस फोर्स तैनात थी और पास में ही कुछ बच्चे खेल रहे थे।  यहीं पर मेरी मुलाक़ात दिवंगत पत्रकार के भाई पवन कश्यप से होती है। आशीष मिश्रा को जमानत मिल जाने पर बात करते हुए वे कहते हैं “इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि निर्दोष किसान जेल में बंद हैं और आरोपी की जमानत हो गई है, जबकि वह इतनी बड़ी राष्ट्रव्यापी घटना का मुख्य अभियुक्त है।”

पत्रकार रमन कश्यप के घर के दीवार पर लगी तस्वीर

वे कहते हैं “चुनाव के लिहाज से देखा जाए तो भाजपा को इस जमानत से नुकसान होने वाला है, क्योंकि भाजपा जिन ब्राह्मण वोटरों को खुश करने की कोशिश कर रही है वे भी अच्छी तरह से जानते हैं कि ये हत्यारे हैं, और जब यह बाहर आएंगे तो सब को इससे नुकसान होने वाला है।” वे आगे कहते हैं “अब ब्राह्मण इतना नादान नहीं रहा, जो इनके बहकावे में आ जाएगा।”

भाजपा के 5 साल की सरकार के बारे में जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि अब तो युवाओं को रोजगार के बदले लाठी दी जा रही है। इस सरकार के बारे में ज्यादा क्या कहें। यहाँ पर सभी लोग आवारा पशुओं से परेशान हैं। लेकिन सरकार को इस सबसे कोई लेना देना नहीं है।

भाई की मौत का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि इस सरकार के शासन में तो न्याय मिलना बहुत मुश्किल है। शायद सरकार बदल जाये तो न्याय मिल जाये।

अब इस घटना को चुनावी माहौल के तौर पर देखा जा रहा है इस घटना की चर्चा करते हुए लखीमपुर खीरी के एक सरकारी टीचर ने नाम ना लिखने की शर्त पर बताया  कि इस क्षेत्र में आठ सीटें हैं।  इस बार के चुनाव का सबसे अहम मुद्दा किसान आंदोलन और खेतों में आवारा जानवरों का लगातार होने वाला हमला है। यहां के लोग खेतों में जानवरों द्वारा हो रहे नुकसान से  बहुत परेशान हैं,  जिसका सीधा असर वोट में देखने को मिलेगा। फिलहाल यहां की सभी 8 सीटों पर भाजपा का कब्जा है। लेकिन इस बार इसमें भारी उलटफेर देखने को मिल सकता है।

वहीं दूसरी ओर लखीमपुर खीरी की गहरी जानकारी रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर मुझसे बात की और कहा कि “इस जिले में किसान आंदोलन का असर वोटिंग के दौरान देखने को मिलेगा। लेकिन सिख समुदाय की संख्या इतनी ज्यादा नहीं है कि वह वोटिंग में निर्णायक साबित हो। लेकिन आम जनता की बात करें तो लोग चुनावी माहौल में खुलकर महंगाई, बेरोजगारी, जानवरों द्वारा फसलों को बर्बाद करने इत्यादि पर बात कर रहे हैं।”

इन सभी मुद्दों का गहरा असर वोटिंग में जरूर देखने को मिल सकता है, क्योंकि यहां की जनता में सरकार के प्रति बहुत गुस्सा है। यहां की ज्यादातर जनता खेती पर निर्भर है और यदि उनकी खेती-बाड़ी ही बर्बाद हो रही है, तो लोगों में नाराजगी का होना तो लाजमी सी बात है।

लखीमपुर खीरी और किसान आंदोलन के दौरान इस घटना से प्रभावित इलाकों जिसमें पीलीभीत, पूरनपुर, पलिया बीसलपुर के इलाके आते हैं, में चौथे चरण में चुनाव होने हैं, जिसकी तारीख 23 फरवरी है। पहले दो चरण के चुनाव जिसमें पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी और रालोद का गठबंधन था, के चुनावी रेस में आगे रहने की खबरें हैं। आज तीसरे चरण के लिए मतदान जारी है। देखना है चौथे चरण में किसान आंदोलन के आखिरी पड़ाव में बाजी किसके हाथ में रहने वाली है, लेकिन इतना तय है कि लखीमपुरखीरी की यह लोमहर्षक घटना आज भी किसानों को सत्ता की बेरहम बानगी की रह-रहकर याद दिला जाती है।

(प्रीति आजाद की रिपोर्ट)

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