Tuesday, November 29, 2022

जस्टिस रमना की शख्सियत में सीख और सलाह ज्यादा थी उस पर चलने की कोशिश कम

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विधायी और कार्यकारी कार्यों की न्यायिक समीक्षा संवैधानिक योजना का एक अभिन्न अंग है। मैं यहां तक कहूंगा कि यह भारतीय संविधान का हृदय और आत्मा है। मेरे विनम्र विचार में, न्यायिक समीक्षा के अभाव में, हमारे संविधान में लोगों का विश्वास कम हो जाता। भारत के तत्कालीन चीफ जस्टिस एनवी रमना ने 23 जुलाई, 2022 को भारत के शीर्ष न्यायाधीश के रूप में अपने 16 महीने के कार्यकाल के दौरान दिए गए कम से कम 29 व्याख्यानों में से एक के दौरान यह कहा था।

इसके बावजूद चीफ जस्टिस के रूप में रमना के समय में, सर्वोच्च न्यायालय ने 53 मामलों में न्यायिक समीक्षा की इस शक्ति का प्रयोग नहीं किया, जिसमें एक संविधान पीठ की आवश्यकता होती है, जिसमें पांच या अधिक न्यायाधीश शामिल होते हैं और संवैधानिक महत्व के मामलों पर विचार-विमर्श करते हैं; और कई अन्य मामलों में जिन्हें संविधान पीठ की आवश्यकता नहीं है, लेकिन व्यापक प्रभाव और राष्ट्रीय महत्व के हैं।

अब अवकाश ग्रहण के पश्चात पूर्व चीफ जस्टिस रमना ने रविवार को कहा कि अदालतों को निष्पक्ष होना चाहिए और उसके फैसलों से लोकतंत्र में सुधार होना चाहिए, लेकिन कुछ स्थितियों में अदालतों से विपक्ष की भूमिका निभाने या उसकी जगह लेने की अपेक्षा की जाती है। इससे जस्टिस रमना की छवि लम्बी लम्बी बातें करने वाले और सिद्धांत बघारने वाले न्यायाधीश की ही बनी है।

कैपिटल फाउंडेशन सोसाइटी से जस्टिस वी आर कृष्ण अय्यर पुरस्कार प्राप्त करने के बाद अपने सम्बोधन में जस्टिस रमना ने कहा कि 1960 और 1970 के दशक आधुनिक भारतीय इतिहास में सबसे चुनौतीपूर्ण अवधि थे। उन्होंने कहा, ‘‘इस काल ने संसद और न्यायपालिका के बीच संघर्ष देखा। संसद ने अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए कोशिश की, जबकि उच्चतम न्यायालय का प्रयास संवैधानिक सर्वोच्चता बरकरार रखने के लिए था। पूर्व चीफ जस्टिस ने कहा कि अदालतों ने यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है कि संवैधानिक अधिकारों ने अपना अर्थ नहीं खोया है।

उन्होंने कहा कि अदालतों ने इस विचार को सुदृढ़ किया है कि न्यायिक समुदाय के कल्याण के साथ व्यक्तिगत जरूरतों को संतुलित करने की मांग करता है, जिसके परिणामस्वरूप देश लिखित संविधान द्वारा शासित सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में फल-फूल रहा है।

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एके पटनायक की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया, जिन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया।

जस्टिस रमना ने कहा कि उनके लिए भारतीय न्यायपालिका में मेरे अनुभव विषय पर व्याख्यान देना उचित नहीं है, क्योंकि वह हाल ही में मुख्य  न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने इसके बदले ‘72 वर्षों में भारतीय न्यायपालिका की यात्रा’ विषय पर व्याख्यान दिया।

जस्टिस रमना ने कहा कि न्यायपालिका को जनहित याचिका प्रणाली के दुरुपयोग सहित कई सवालों की जांच करने की जरूरत है। उन्होंने न्यायपालिका को बढ़ते मुकदमों सहित विभिन्न उभरती चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने की आवश्यकता भी जताई। जस्टिस रमना ने कहा कि अदालतों को निष्पक्ष होना चाहिए और जनता के फैसलों से लोकतंत्र में सुधार होना चाहिए। लेकिन कुछ स्थितियों में अदालतों से विपक्ष की भूमिका निभाने या उसे दबाने की उम्मीद की जाती है।

पूर्व चीफ जस्टिस ने कहा कि अदालतों ने यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है कि संवैधानिक अधिकार एक मृत पत्र नहीं है। उन्होंने इस विचार पर जोर दिया कि न्याय समुदाय, कल्याण के साथ व्यक्तिगत जरूरतों को संतुलित करने की मांग करता है, जिसके परिणामस्वरूप देश एक लिखित संविधान द्वारा शासित सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में फलता-फूलता है। पूर्व चीफ जस्टिस ने कहा कि एक स्वर में बोलना एक स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत नहीं है और न्यायिक संस्थान के साथ-साथ लोकतंत्र के लिए विविध विचार आवश्यक हैं।

जिन 53 मामलों में जस्टिस रमना ने संविधान पीठ का गठन नहीं किया उनमें जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 का हनन 1,115 दिनों से पेंडिंग पड़ा है, पड़ा रहा और जाने कब तक पेंडिंग पड़ा रहेगा। या फिर राजनीतिक चंदे को बढ़ावा देने के लिए चुनावी बांड को चुनौती का केस जो 1,816 दिन से पेंडिंग पड़ा है। कर्नाटक सरकार ने सरकारी शिक्षण संस्थानों में मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पर प्रतिबंध लगाया था, वह भी 159 दिन से पेंडिंग पड़ा है। ईडब्ल्यूएस आरक्षण का मामला 1,323 दिन से पेंडिंग पड़ा है।

यूएपीए को भी चुनौती दी गई है क्योंकि ये असहमति को दबाने का औजार बन चुका है तो यह भी मामला 1105 दिन से पेंडिंग पड़ा है। नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 की भी चुनौती 987 दिन से पेंडिंग पड़ी है।

जस्टिस रमना ने इनमें से एक भी मामला नहीं छुआ। और यह सब तब हुआ, जब पूरे सोलह महीने तक जस्टिस रमना सुप्रीम कोर्ट के मास्टर ऑफ रोस्टर रहे। मास्टर ऑफ रोस्टर, अर्थात इन मामलों को सुनवाई के लिए लिस्ट करने का जब चाहे आदेश दे सकते थे और सुनवाई के लिए संविधान पीठ का गठन कर सकते थे।

जस्टिस रमना पांच जजों की इकलौती संविधान पीठ गठित की थी ताकि वह गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड और अडानी पावर लिमिटेड के बीच फैसला कर सके। 22 अगस्त 2022 को भी जस्टिस रमना ने अचानक एक संविधान पीठ बना दी, और वह भी उस मामले में, जो साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। इस मामले में दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच एडमिनिस्ट्रेशन पर कंट्रोल करने का विवाद था। हालांकि इसकी सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है।

इतना ही नहीं, जस्टिस रमना साहब ने कोर्ट को सुधारने की लंबे समय से चली आ रही मांग पर कुछ नहीं किया। मामले मुकदमों को सुप्रीम कोर्ट में लिस्ट करने के लिए भारत को एक पारदर्शी प्रणाली चाहिए, उसमें भी उन्होंने कुछ नहीं किया। न तो उन्होंने अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग के कोई मानदंड तय किए, और न ही उन्होंने इस पर कोई काम किया कि जजों को कैसे चुना जाना चाहिए।

इन 53 मामलों की चुनौतियों में रमना के न्यायालय में कोई प्रगति नहीं देखी गई, जैसा कि उनके पूर्ववर्तियों की अदालतों में हुआ था। इसी तरह, हमने जिन अन्य मामलों का विश्लेषण किया उनमें बहुत कम या कोई प्रगति नहीं दिखाई दी। इन लंबित मामलों में से, हमने छह की पहचान की:

-जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 का हनन (1,115 दिनों से लंबित)

– अपारदर्शी होने और संदिग्ध राजनीतिक चंदे को बढ़ावा देने के लिए चुनावी बांड को चुनौती (1,816 दिन)

– कर्नाटक सरकार ने सरकारी शिक्षण संस्थानों में मुस्लिम छात्रों के हिजाब पर प्रतिबंध (159 दिन)

– केंद्र सरकार की ईडब्लूएस आरक्षण नीति केवल आर्थिक मानदंडों पर आधारित है न कि जाति के कारकों पर (1,323 दिन)

-गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए), 1967 को चुनौती, असहमति को दबाने के लिए एक उपकरण के रूप में व्यापक रूप से आलोचना की गई (1105 दिन)

-नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 को चुनौती, जो केवल तीन पड़ोसी देशों के गैर-मुस्लिमों को फास्ट ट्रैक नागरिकता प्रदान करता है (987 दिन)

ऐसे अन्य मामले भी हैं जिन्हें तत्कालीन चीफ जस्टिस रमना ने अछूते छोड़ दिए थे, भले ही वकीलों के कई बार अनुरोध किये हों। तत्कालीन चीफ जस्टिस  रमना ने पेगासस मामले को सूचीबद्ध नहीं किया, जिसमें पत्रकार और नागरिक समाज के सदस्य इस बात की जांच करने के लिए न्यायिक जांच की मांग करते हैं कि क्या केंद्र सरकार ने पत्रकारों और अन्य नागरिकों की जासूसी करने के लिए पेगासस नामक इज़राइली स्पाइवेयर का इस्तेमाल किया और यदि उचित प्रक्रिया का पालन किया गया था। 22 जुलाई 2021 से लंबित 11 याचिकाओं के 12 अगस्त 2022 को सूचीबद्ध होने की उम्मीद थी। रमना की सेवानिवृत्ति के बाद अब यह मामला लम्बित है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस आर वी रवींद्रन की अध्यक्षता वाली एक तकनीकी समिति ने कथित तौर पर अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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