Thursday, October 6, 2022

महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई

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महाराष्ट्र विधानसभा के डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल और शिवसेना के चीफ व्हिप सुनील प्रभु ने अयोग्यता की कार्यवाही के खिलाफ एकनाथ शिंदे और बागी विधायकों द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल कर दिया है। महाराष्ट्र के सियासी संकट पर आज होने वाली सुनवाई से पहले, अपने जवाब में सुनील प्रभु ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि बागी विधायकों को अयोग्य घोषित किया जाए और अयोग्यता की कार्यवाही पूरी होने तक उन्हें निलंबित रखा जाए जबकि डिप्टी स्पीकर ने अपने जवाब में कहा है कि अनवैरिफाइड मेल आईडी से आया था अविश्वास प्रस्ताव, इसलिए अस्वीकार किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने 27 जून को डिप्टी स्पीकर को नोटिस जारी कर एकनाथ शिंदे गुट द्वारा उनकी अयोग्यता नोटिस के खिलाफ दायर याचिका पर जवाब मांगा था। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में शिवसेना चीफ व्हिप सुनील प्रभु ने कहा है कि बागी विधायक पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं और महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित किए जाने के योग्य हैं।

प्रभु ने कहा है कि बागी विधायकों ने “दलबदल का संवैधानिक पाप” किया है। उन्होंने एकनाथ शिंदे पर भाजपा से मिले होने का आरोप लगाया है। अपने जवाब में उन्होंने आगे कहा है कि महाराष्ट्र के विधायक असम में बैठकर प्रस्ताव पारित कर रहे थे, जिसका प्रभाव उनकी अपनी सरकार पर पड़ रहा था।

सुनील प्रभु ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि दलबदल को पुरस्कृत करने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता है कि वह अपने नेता को मुख्यमंत्री का पद दे। प्रभु ने यह भी कहा है कि बागी विधायकों को अयोग्यता की कार्यवाही पूरी होने तक निलंबित किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 27 जून को डिप्टी स्पीकर को नोटिस जारी किया था और एकनाथ शिंदे गुट द्वारा अयोग्यता नोटिस के खिलाफ दायर याचिका पर जवाब मांगा था।

डिप्टी स्पीकर नरहरि सीताराम जिरवाल ने बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता कार्रवाई को वैध ठहराया है। साथ ही हलफनामे में कहा है कि उन्हें हटाने के लिए नोटिस केवल तभी दिया जा सकता है जब विधानसभा सत्र चल रहा हो। उन्होंने हलफनामे में सवाल उठाया कि अगर एकनाथ शिंदे गुट 24 घंटे में सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दे सकता है तो 48 घंटों में मेरे द्वारा जारी अयोग्यता नोटिस का जवाब क्यों नहीं दे सकता है।अयोग्यता याचिकाओं का जवाब देने के लिए याचिकाकर्ताओं को 48 घंटे देने में कुछ भी गलत नहीं है।

जिरवाल का कहना है कि सबसे पहले 48 घंटे का नोटिस दिया गया था।साथ ही उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने कभी मुझसे संपर्क नहीं किया।उन्होंने कहा कि असत्यापित ईमेल के जरिये 39 विधायकों के पार्टी छोड़ने  का नोटिस मेरे पास आया था, इसलिए मैंने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि कथित नोटिस एक ऐसे व्यक्ति की ईमेल आईडी से भेजा गया था, जो विधानसभा का सदस्य नहीं है और एक ऐसे व्यक्ति द्वारा दिया गया जो विधायक नहीं है। इसलिए उसकी प्रामाणिकता/सत्यता पर संदेह किया और इसे रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर दिया गया। 

उन्होंने उक्त मेल का जवाब देते हुए कहा था कि वह प्रस्ताव को अस्वीकार कर रहे हैं। कथित नोटिस को रिकॉर्ड में लेने से इनकार करने की सूचना उसी ईमेल आईडी पर भेजी गई थी, जहां से यह आया था। जिरवाल ने अपने जवाब में कहा कि यह समझने में विफल हूं कि याचिकाकर्ता इस तथ्य को सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान मे क्यों नहीं लाए।

जिरवाल का कहना है कि संविधान, संसदीय सम्मेलन और विधानसभा नियमों के प्रावधानों के तहत, डिप्टी स्पीकर को हटाने का नोटिस तभी दिया जा सकता है जब विधानसभा का सत्र चल रहा हो। इसलिए नोटिस संविधान के अनुच्छेद 179 (सी) के तहत कभी भी वैध नोटिस नहीं था।

इस बीच एक स्पीकर द्वारा शिंदे गुट के 39 विधायक और उद्धव गुट के 14 विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। शिवसेना विधायकों को इस नोटिस का एक सप्ताह के भीतर जवाब देना है। महाराष्ट्र विधानसभा के प्रधान सचिव राजेंद्र भागवत ने शिवसेना के 53 विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है ।इसमें संतोष बांगर भी शामिल हैं जो 4 जुलाई को फ्लोर टेस्ट के दिन ठाकरे गुट से शिंदे गुट में शामिल हो गए थे । नोटिस दलबदल के कानून के तहत अयोग्यता के नियम के मुताबिक जारी किया गया है ।

ठाकरे सरकार के दौरान जब शिंदे गुट के विधायकों ने शिवसेना से विद्रोह कर दिया था तब दोनों गुटों ने एक-दूसरे पर स्पीकर के चुनाव विश्वास मत पर वोटिंग के समय पार्टी व्हिप का उल्लंघन का आरोप लगाया है । इसके मुताबिक दोनों पक्षों के विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है।

महाराष्ट्र विधानसभा के प्रधान सचिव राजेंद्र भागवत ने उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को नोटिस जारी नहीं किया है। नोटिस जारी किए गए विधायकों में से शिंदे गुट के 39 और 14 विधायक ठाकरे गुट के हैं ।  4 जुलाई को फ्लोर टेस्ट से पहले एकनाथ शिंदे गुट की तरफ से मुख्य सचेतक भरत गोगावले ने एक व्हिप जारी करके कहा था कि सभी शिवसेना विधायक सरकार के पक्ष में वोट करेंगे । वहीं उद्धव ठाकरे गुट के चीफ व्हिप सुनील प्रभु ने भी इसी तरह का एक व्हिप जारी किया लेकिन उन्होंने सरकार के खिलाफ वोटिंग का निर्देश दिया था।

एकनाथ शिंदे ने विश्वास मत 164 वोटों के साथ जीत लिया था। जबकि शिंदे के विपक्ष में 99 वोट पड़े थे हालांकि उन्हें ये यहां पर महज 144 विधायकों के वोट की जरूरत ही थी। शिंदे समर्थक शिवसेना के 40 विधायकों ने पक्ष में वोट किया था जबकि पार्टी के 15 विधायकों ने विपक्ष में वोट दिया था। इसके बाद गोगावले ने स्पीकर को अप्लीकेशन देकर विपक्ष में वोट करने वाले 14 विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की थी जिसमें उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे का नाम नहीं था। वहीं इसके जवाब में पूर्व सीएम उद्धव खेमे की तरफ से 39 विधायकों पर अयोग्यता की कार्रवाई करने की मांग की गई थी।

जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस जेके माहेश्वरी की पीठ 11 जुलाई को मामले को सुनेगी। शिवसेना नेता सुभाष देसाई की ओर से याचिका दायर की गई है। देसाई ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए शिंदे गुट और भाजपा गठबंधन को आमंत्रित करने के राज्यपाल के 30 जून के फैसले को चुनौती दी है। ठाकरे गुट ने तीन और चार जुलाई को हुई विधानसभा की कार्यवाही की वैधता को भी चुनौती दी है, जिसमें सदन में नए अध्यक्ष का चुनाव किया गया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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