Wednesday, August 10, 2022

उत्तर प्रदेश : मोदी-अमित शाह क्यों चाहते हैं सपा से सीधा मुकाबला !

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उत्तर प्रदेश में मतदान शुरू होने में कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। सरकारी तथा कारपारेट ताकत के सहारे चुनाव मैदान में खड़ी भाजपा को चुनाव आयोग और मीडिया का पूरा सहयोग मिल रहा है। लेकिन काफी मशक्कत के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी के अभियान में कोई गर्मी नहीं दिखाई दे रही है। हिंदू-मुसलमान के बीच ध्रुवीकरण का उनका अभियान सफल होता नहीं दिखाई दे रहा है। अब उनकी कोशिश समाजवादी पार्टी बनाम भाजपा की सीधी लड़ाई बनाने की है।

इस सीधी लड़ाई की भाजपा की नैरेटिव को गोदी मीडिया पूरी ताकत से  प्रचारित कर रहा है। क्या यह दिलचस्प नहीं है कि सत्तासीन पार्टी विपक्ष के वोटों में विभाजन के बदले उसे एक जगह इकट्ठा होते देखना चाहती है? क्या उत्तर प्रदेश जैसे विशाल प्रदेश में अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाली पाटियों का खत्म होना भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक नहीं है? सबसे बड़ा सवाल है कि इसके पीछे आरएसएस का असली उद्देश्य क्या है?

प्रधानमंत्री मोदी तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही अपना चुनाव अभियान पूरा कर लिया था। उन्होंने प्रदेश के हर हिस्से में रैलियां कर ली थीं और अब कोरोना के कारण लगी पाबंदियों के उल्लंघन में भी बाकी पार्टियों को उन्होंने पीछे छोड़ रखा है। प्रधानमंत्री पहले से ही सरकारी कार्यक्रमों का उपयोग चुनावी रैलियों के लिए करते आ रहे हैं। अब भी उस तरह का कोई मौका छोड़ नहीं रहे हैं। इन सबके बावजूद पराजय का डर हर भाजपा नेता की आंखों में दिखाई दे रहा है।

ऐसे समय में वे चुनाव को पश्चिम बंगाल की तरह दो पार्टियों के बीच सीधी लड़ाई में क्यों बदल देना चाहते हैं? आम तौर पर भाजपा को कोई चुनौती नहीं है वाली नैरेटिव गढ़ने वाला मीडिया भी भाजपा की इसी लाइन को प्रचारित करने लगा है। जमीनी वास्तविकता और आम लोगों की जरूरतों से कोई सरोकार नहीं रखने वाला मीडिया जमीनी वास्तविकता की दुहाई देने लगा है और चिल्लाने लगा है कि समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच ही सीधी लड़ाई है। क्या क्षेत्रीय और सामाजिक विविधताओं से भरे उत्तर प्रदेश में इस तरह की वास्तविकता मौजूद है?  

उत्तर प्रदेश में संघ परिवार की रणनीति को समझने के लिए हमें यह देखना पड़ेगा कि वह भारतीय राजनीति में विचारधाराओं की विविधता को समाप्त करने में कितना जोर लगाता रहा है। वामपंथी पार्टियां और कांग्रेस उसके खास निशाने पर रहे हैं। 2014 में सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने अपना निशाना वामपंथ और प्रगतिशील विचारधाराओं के उन केंद्रों को बनाया जहां से वे संजीवनी पाते थे। उनका हमला झेलने वाले केंद्रों में जेएनयू का नाम सबसे पहला है। विचारधाराओं तथा राजनीतिक विमर्श को ताकत देने वाले इस विश्वविद्यालय को बदनाम करने तथा उसकी स्वायत्तता को नष्ट करने में मोदी सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी।

यही तरीका उन्होंने देश के तमाम विश्वविद्यालयों में अपनाया। उसने लोकतांत्रिक, सेकुलर तथा प्रगतिशील विचारों से जुड़े संगठनों तथा व्यक्तियों के खिलाफ भी यही रणनीति अपनाई। उनकी विचारधारा से जुड़े लोगों ने इस काल में ही एमएम कलबुर्गी, गोविंद पानसरे तथा गौरी लंकेश की हत्या की। प्रगतिशीलता तथा आम लोगों की आवाज को दबाने के लिए हिंसा का सहारा लेने का ही एक उदाहरण है सुल्ली और बुल्ली डील्स पर जानी-मानी महिलाओं की नीलामी। इसे महिलाओं के खिलाफ एक हिंसक अभियान ही कहा जाएगा।  

वामपंथ और प्रगतिशील आवाजों की जगह विचारधारा के मामले में कमजोर संगठनों तथा राजनीतिक दलों को बढ़ावा देना और उन्हें ही राजनीति की मुख्यधारा में दिखाना आरएसएस की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। पश्चिम बंगाल के विधान सभा चुनावों में उसने यही रणनीति अपनाई थी और सीपीएम तथा कांग्रेस को राज्य की राजनीति में हाशिए पर भेजने में सफलता पा ली।

उत्तर प्रदेश में सीधा मुकाबला कई वजहों से प्रधानमंत्री मोदी के लिए बहुत मायने रखता है। इस प्रदेश में कांग्रेस को उभरने से रोकने के पीछे मोदी का गणित यह है कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की संभावना कम हो जाएगी और 2024 का चुनाव उनके लिए आसान होगा। समाजवादी पार्टी को वह उसी तरह अपने शिकंजे में ले सकते हैं जिस तरह उन्होंने बहुजन समाज पार्टी को अपने नियंत्रण में ले रखा है।

समाजवादी पार्टी में मौसम के हिसाब से अपना रंग बदलने वाले नेताओं का आना भले ही पार्टी को बढ़ती ताकत दे रहा हो, यह उसे अवसरवादी भी बना रहा है। सपा का भाजपा का साथ छोड़ आए ओमप्रकाश राजभर की पार्टी से हाथ मिलाना भले ही चुनाव के लिए लाभकारी सिद्ध होता हो, यह सिद्धांतहीन राजनीति का हिस्सा है। जब सरकार बनाने में उनकी भूमिका रही तो राजभर जैसे लोग भाजपा के साथ हाथ मिलाने मे संकोच नहीं करेंगे। यही बात आरएलडी के जयंत चौधरी पर लागू होती है।

सवाल उठता है कि समाजवादी पार्टी ने बिहार की तरह एक प्रगतिशील गठबंधन बनाने की कोशिश क्यों नहीं की? तेजस्वी यादव ने प्रगतिशील गठबंधन बना कर आरजेडी को विचारधारा की राजनीति से जोड़ दिया। इसने न केवल उनकी पार्टी को पुनर्जीवन दिया है, बल्कि भाजपा के खिलाफ राज्य में एक मजबूत वैचारिक विकल्प खड़ा करने में मदद की है। सपा नेता अखिलेश ने अवसरवादी नेताओं और जाति आधारित पार्टियों से समझौता कर सिर्फ एक चुनावी गठबंधन खड़ा करने का काम किया है जो प्रदेश या देश की राजनीति में हिंदुत्व के खिलाफ लंबे समय की राजनीति का आधार नहीं बन सकता है। उन्होंने सामाजिक समीकरण साधने पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखा। मुख्यमंत्री योगी और प्रधानमंत्री मोदी की नाकामियों के कारण उनकी इस रणनीति के कारगर होने की काफी संभावना भी है।  

लेकिन एक बेहतर छवि वाले युवा नेता के रूप में अखिलेश को विचारधारा की राजनीति में अपनी जगह बनाने कोशिश करनी चाहिए थी। इसके लिए उन्हें जरूरी जोखिम उठाना चाहिए था और सीमित शक्ति वाली वामपंथी दलों के साथ, सांकेतिक ही सही, समझौता करना चाहिए था। उन्होंने कांग्रेस या बहुजन समाज पार्टी के साथ भी, कामचलाऊ ही सही, किसी तरह का रिश्ता बनाने की कोशिश नहीं की। प्रगतिशील संगठनों और पार्टियों से दूरी बना कर वह किस हद तक प्रगतिशील राजनीति कर सकते हैं?

सबसे अहम सवाल है कि क्या उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रीय, सामाजिक तथा आर्थिक विविधता वाले प्रदेश में दो पार्टियों का सीधा मुकाबला संभव है? क्या बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के पक्के समर्थक अपना वोट समाजवादी पार्टी को देंगे? भले ही मीडिया कुछ भी प्रचार कर रहा हो मायावती के वोट बैंक में सेंध लगाना आसान नहीं है। इसी तरह कम संख्या में ही सही कांग्रेस का भी एक समर्थक समूह है। यह भी है कि प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्र अलग-अलग तरह से मतदान करते हैं। भारतीय लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि चुनावों में वैचारिक विविधता नजर आए और लोग जातियों और धर्मों की जगह विचारधाराओं में अपनी आस्था जाहिर करें।
(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)








 

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