स्थाई तौर पर न बसने की कसम खाने वालों को सरकार भी उजाड़ने पर है आतुर

हाल ही में दिल्ली में चुनी हुई सरकार ने गड़िया लोहारों की बसी हुई बस्तियों को अवैध करार देते हुए उजाड़ दिया। यह घटना बीती 20 जून को राजपुरी बस्ती में हुई। यह कच्ची बस्ती गड़िया लोहार समाज की थी। गड़िया लोहार समाज का संबंध राजस्थान से है। आज के इतिहास में सबसे विवादित विषयों में से एक मेवाड़–मुगल संघर्ष से इस समुदाय का अतीत में जुड़ाव रहा है। मेवाड़ को 1568 ईस्वी में मुगलों द्वारा जीत लेने के बाद महाराणा प्रताप को मेवाड़ के जंगलों में भटकने के लिए विवश होना पड़ा।

महाराणा ने संघर्ष का रास्ता चुना, इसी रास्ते में बहुत से मेवाड़ वासियों ने महाराणा प्रताप का साथ दिया। इनमें दो समुदायों का नाम प्रमुख है। मेवाड़ के भील आदिवासी और गड़िया लोहार समुदाय, भील सीधे युद्ध के मैदान में कूद गए वहीं लोहारों ने राणा का भरपूर साथ देने के लिए हथियार बनाए, लड़े, अनेक दुख सहे और 5 शपथ ली कि जब तक मेवाड़ पर फिर से अधिकार नहीं हो जायेगा तब तक वह मेवाड़ नहीं लौटेंगे। 

1. बस्ती या जंगल कहीं भी पक्का घर बनाकर नहीं रहेंगे

2. खाट पर नहीं सोयेंगे

3. चित्तौड़गढ़ किले पर नहीं चढे़ंगे

4. दीपक नहीं जलाएंगे

5. पानी खींचने का रस्सा नहीं रखेंगे

एक मत यह भी है कि हर समय में किसी भी समाज की दो मूलभूत जरूरतें रही हैं एक नमक और दूसरा धातु ऐसे में दुनिया भर के समाजों में इन जरूरतों को पूरा करने का काम घुमंतू लोगों के हिस्से में ही आया है। ऐसे में इस तरह के इतिहास पर सवाल तो है इसके बावजूद यह बात बहुत ठोस तरह से कही जा सकती है कि इतिहास हो या मिथक गड़िया लोहार समाज के आम लोगों का इन कहानियों में पूरा विश्वास रहा है।

भारतीय समाज की गतियों में मिथक और ऐतिहासिक घटनाओं का बड़ा प्रभाव रहा है। हिंदुत्व की राजनीति ने हर जाति को उसका नायक राजा के रूप में दिया है, जिन जातियों को राजा न मिल सका उन्हें इतिहास के किसी बड़े नायक या घटना से जोड़कर भी गौरव भाव से भर दिया है। इसलिए इन घटनाओं के पुख्ता सबूत न होने के बावजूद भी इन कहानियों ने इन समाजों की संरचना, जीवन दर्शन और सामूहिक अभिव्यक्ति निर्माण में इन मिथकों या स्मृतियों का बड़ा योगदान है।

मणि मधुकर ने राजस्थान के अकाल पर लिखे रिपोर्ताज ‘सूखे सरोवर का भूगोल’ में एक रिपोर्ट ‘न देस न गाड़ी’ शीर्षक से गड़िया लोहार समाज पर लिखा है। इसी में वह गड़िया लोहार समाज के जीवन दर्शन को उस समाज से जुड़ी कहावत ‘उंधी खाट घालज्यो अर फिरता ही मरज्यो’ से समझाने की कोशिश की, इसका अर्थ है उलटी खाट रखना और भटकते हुए ही मरना। यहां यह देखिए कि इतिहास की एक घटना कैसे समाज की गति को तय करती है।

इतिहास की बड़ी घटना और उसके गर्वीले भाव से भरे हुए इस समाज ने आज़ादी के बाद भी भटकते रहने का ही मार्ग चुना। लोकतंत्र में चुनाव को लेकर केदारनाथ सिंह की कविता है ‘मतदान केंद्र पर झपकी’ है। लेकिन यह झपकी गड़िया लोहार समाज की अब तक बनी हुई है। मणि मधुकर ने अपनी रिपोर्ट में एक लुहार से पूछा कि क्या तुमने कभी वोट दिया है ? 

उसने इंकार में सिर हिलाया “कुछ गाड़िए एक बार वोट देने गए थे। एक मोटर में सेठ लोग लेने आये थे उन्हें। सबको सिनेमा दिखाया और पूछा 

सवाल –अपने मुल्क का नाम जानते हो? 

उत्तर – मेवाड़ राणाजी का। 

सवाल – किसी एक जगह बसने के बारे में सोचा है? 

उत्तर – पाप की बात मत बोलो। 

ऐसे ही अपने लिए शहर कि कल्पना का उत्तर वह यह देते हैं कि राज का आदमी परेशान न करें और पुलिस का नामों निशान न हो।

1947 में मुल्क आजाद हुआ, गुलामी की जंजीरें खुलने के साथ इस सरजमीं के बाशिंदों को इस लोकतंत्र के बसंत से बहुत उम्मीदें थीं। लेकिन बात अटक गई उन समाजों को लेकर जो सदा से इस मुल्क के किसी जमीन के टुकड़े को अपना घर नहीं मानते थे। बल्कि उनका घर इस मुल्क की हवाएं थीं, जिधर वह बहतीं उधर ही वह चलते लोहे को पिघलाते, सांचों में ढालते और युद्धों के लिए हथियार बनाने वाले लोग कामगार लोगों की मेहनत मजूरी के लिए औजार बनाने में लग गए। जो मानते थे इस जमीन पर वह भूमिहीन तो हैं लेकिन यहां का कंकड़–कंकड़, पत्थर–पत्थर उन लोगों के स्पर्श से वाकिफ है। 

यह लोग लोकतंत्र के पहले चुनाव के मतदान में पंक्तिबद्ध नहीं हुए, ना ही किसी पंचवर्षीय योजना के विमर्श में इन समाजों को जगह मिली। 

इन समाजों की पहली सुध माणिक्य लाल वर्मा ने ली। उन्होंने नेहरू को पत्र लिखा था। फिर देशभर में घुमक्कड़ जीवन जी रहे गड़िया लोहारों तक संदेश भेजकर 6 अप्रैल, 1955 चित्तौड़ में एकत्र किया गया। उनको मुश्किल से यह समझाया गया कि वे आज़ादी के जिस संकल्प के साथ जो कठोर जीवन यापन कर रहे थे, वो पूरा हो चुका है। अब आपका चित्तौड़ भी आजाद है। नेहरू चाहते थे कि इनका दुर्ग प्रवेश बहुत भव्य हो। उन्होंने अपना कार्यक्रम तय करने के साथ ही निर्देश दिए कि किले के हर दरवाजे पर एक मुख्यमंत्री अगवानी में खड़े रहें। सभा में भीड़ उमड़ी थी। नेहरू के साथ राजस्थान के सीएम मोहनलाल सुखाडिया सहित सभी प्रमुख नेता व मेवाड़ महाराणा भी मौजूद रहे।

नेहरू ने अपने भाषण में कहा– 

हमें आजाद हुए सात साल हो गए। एक काम पूरा हुआ और आज हम चित्तौड़ आए। मैं देश में बहुत घूमा हूं, बचपन में चित्तौड़ और मेवाड़ की कहानियां पढ़ता था तो दिल पर उसका बहुत असर पड़ता था। क्योंकि महाराणा ने अपने संदेश में कहा है कि इस पहाड़ के एक-एक पत्थर और एक-एक जर्रे में आजादी की कहानी भरी पड़ी है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि मैं अभी तक यहां नहीं आ सका। आज पहली बार आया और ऐसे सुअवसर पर आया कि आप (गड़िया लोहार) भी पहली बार आए। 

यह पहली और शायद अंतिम कोशिश थी जिसमें गड़िया लोहारों के जीवन और उनके बसने को लेकर भारतीय राष्ट्र ने गंभीरता से सोचा। लेकिन वह सफल नहीं हो सके। हाथ के काम में दक्ष समाज फिर से उन्हीं राहों पर लोहा पिघलाने निकल पड़ा जो काम उसने सदियों से किया। 

गड़िया लोहारों की राजनीति – 

भारतीय उग्र राष्ट्रवादियों और दक्षिणपंथी राजनीति ने महाराणा प्रताप को जिस रंग में मुल्क में पेश किया। उसी का परिणाम हुआ कि यह समाज भी धीरे–धीरे राष्ट्रवाद का प्रबल समर्थक हो गया। 

चुनावी राजनीति में संख्या बल न होने, संगठित न रह पाने के कारण न इनका शोर हुआ और ना ही इनकी कोई पूछ। लेकिन फिर भी इनकी अभिव्यक्ति धीरे–धीरे वैसी ही होती गई जैसा दक्षिणपंथ चाहता था। 

दिल्ली की इन बस्तियों में इन समाजों की सुध सरकारों ने 2000 का साल आते-आते ली, कुछ आवासीय बस्तियों की योजनाएं कागजों पर आईं लेकिन जमीन पर नहीं उतरीं।

और फिर यह राजनीति घूम फिर कर यहीं पहुंच गई। जिनके लोगों ने मेवाड़ के राणाजी का साथ दिया। उन्हें फिर से उजड़ने का फरमान जारी हुआ। राजस्थान के लोक समाज के अध्येता और जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता पारस बंजारा बताते हैं कि कैसे इस मुल्क में मौजूदा निजाम की खड़ी करी हुई बहस जिसमें वह इस मुल्क के मुसलमानों का भय दिखाकर CAA/NRC जैसे कानून लाते हैं या हाल ही में बिहार जैसे राज्यों में जो वोटर रिविजन कार्यक्रम चल रहा है। इनसे उस समाज पर भी सवाल उठते हैं। 

भारतीय दक्षिणपंथ ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि जो लोग इतिहास में उनके हिसाब से रहे हैं, वह उनके साथ न्याय करेंगे। इस घटिया इतिहासबोध के चलते ही आज की भाजपा सरकार की रीति–नीति में भारतीय मुसलमान निशाने पर है। 

लेकिन इन सब के इतर वह समुदाय है जो दक्षिणपंथ के लेंस से ही देखें तो आज महाराणा प्रताप इस मुल्क में स्वाभिमान और स्वतंत्रता के प्रतीक हैं। लेकिन जिन समुदायों की वजह से महाराणा प्रताप बने आज उन्हीं समुदायों को दर-बदर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। भाजपा सिर्फ प्रतीकों की राजनीति करती है लेकिन जिनकी वजह से यह प्रतीक बनें उन्हें इसलिए तूल नहीं देती, क्योंकि वह सामाजिक संरचना में उस तरह से प्रभावशाली नहीं रहे। इसीलिए आज उन्हीं की कच्ची बस्तियों को अवैध कहकर उजाड़ दिया जा रहा है जो समुदाय मेवाड़ उजड़ने को अपना उजड़ना समझकर पल भर में चित्तौड़ से चल दिए। तमाम इतिहास से करीब-करीब कटे हुए और अपने इतिहास की धुंधली गति से बेवजह भटकते हुए ये बेज़मीन लोग! अब इनकी आस पर कौए उड़ रहे हैं। गिद्ध मंडरा रहे हैं, धुआं उठ रहा है।

सिपाही जिनके लिए सबसे बड़ा हाकिम है। राशनकार्ड जिन्होंने कभी देखा तक नहीं और भरपेट भोजन जिनका एक सपना है।

ऐसे में उखड़े हुए, उजड़े हुए जुझारू जन, क्या कभी आबाद हो सकेंगे? कब वह दिन आयेगा? जब ये किसी के बाशिंदों के संसार की गति में हिस्सा लेंगे ! 

(दीपक हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में विकास संचार के छात्र हैं।)

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