जिस देश की नींव “ला इलाह इल्लल्लाह” जैसे मज़बूत धार्मिक नारे पर रखी गई थी, आज वही देश अपने सबसे बड़े आस्था संकट से जूझ रहा है। ताज़ा रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि पाकिस्तान में 10 लाख से ज़्यादा लोग इस्लाम छोड़कर नास्तिक संघों से जुड़ चुके हैं, और यह संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।
भले ही सरकार ने इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं की है, लेकिन इतना तो साफ है कि धार्मिक कट्टरता, हिंसा और पाखंड ने आम लोगों को धीरे-धीरे इस्लाम से दूर कर दिया है।
यह कोई बौद्धिक बहस या वैचारिक क्रांति नहीं है- यह एक चुपचाप किया जा रहा ख़ामोश विरोध है, जो जबरन थोपे गए धर्म, डराने वाले कानूनों और धार्मिक हिंसा के ख़िलाफ है।
कुछ आंकड़े, जो बहुत कुछ कहते हैं
WIN-Gallup International की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान उन 10 देशों में शामिल था जहां सबसे तेज़ी से लोग धर्म से दूर हो रहे थे। उस वक्त 2% पाकिस्तानी खुद को पक्का नास्तिक मानते थे।
पाकिस्तान की आबादी उस समय लगभग 20 करोड़ थी, यानी करीब 40 लाख लोग धर्म को छोड़ चुके थे। 2025 तक यह संख्या 50 लाख से भी ऊपर पहुंच चुकी मानी जा रही है।
Reddit, Discord और YouTube जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर पाकिस्तान के हजारों युवा खुद को खुलेआम “Ex-Muslim” या नास्तिक घोषित कर रहे हैं। North America और Britain के Ex-Muslim संगठनों में भी पाकिस्तान से जुड़ने वाले लोगों की संख्या में तेज़ी आई है।
आख़िर लोग क्यों छोड़ रहे हैं इस्लाम? इसके निम्नलिखित कारण बताये जा रहे हैं:
धार्मिक आतंकवाद और खून-खराबा
पाकिस्तान में पिछले 20 सालों में धर्म के नाम पर जो हिंसा हुई है, उसने आम लोगों का भरोसा तोड़ दिया है।
लाल मस्जिद (2007) और पेशावर स्कूल हमला (2014) जैसी घटनाओं में सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान गई। TTP और ISIS जैसे आतंकी संगठनों ने कुरान और हदीस का नाम लेकर आत्मघाती हमलों को जायज़ ठहराया।
साल 2023 में ही पाकिस्तान में 262 आतंकी हमले हुए, जिनमें 600 से ज़्यादा लोग मारे गए। जब धर्म खून बहाने का ज़रिया बन जाए, तो उसका सम्मान बचाना मुश्किल होता है।
ईशनिंदा क़ानून और धार्मिक दमन
पाकिस्तान का 295B और 295C धारा वाला ईशनिंदा कानून इतना सख़्त है कि झूठे आरोप लगाकर किसी की भी जान ली जा सकती है।
प्रोफेसर जुनैद हाफीज को सालों जेल में रहना पड़ा और श्रीलंकाई नागरिक प्रियांथा कुमारा को भीड़ ने जिंदा जला दिया।
पाकिस्तान में इस्लाम छोड़ना सिर्फ सामाजिक नहीं, कानूनी अपराध भी है। ऐसे माहौल में नास्तिकता किसी फैशन का हिस्सा नहीं, लोगों की मजबूरी बन जाती है।
नयी पीढ़ी का मोहभंग
पाकिस्तान की 64% आबादी 30 साल से कम उम्र की है। इंटरनेट और वैश्विक सोच से जुड़ी ये पीढ़ी धर्म की कट्टर व्याख्या से बुरी तरह थक चुकी है।
लाहौर में किए गए एक निजी सर्वे में पता चला कि वहां के 28% युवा खुद को धार्मिक नहीं मानते, हालांकि वे यह बात समाज में खुले तौर पर नहीं कह सकते, क्योंकि चारों ओर खौफ़ का माहौल है।
इस्लामीकरण की उलटी चाल
पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना एक ऐसा देश चाहते थे, जहां हर धर्म के लोग बराबरी से जी सकें। लेकिन जनरल ज़िया-उल-हक के शासनकाल में इस्लाम को ज़बरन सरकारी ढांचे में घुसा दिया गया।
हदूद कानून, शरीयत कोर्ट, और ईशनिंदा कानून ने धर्म को डर और दबाव का औज़ार बना दिया।
जब धर्म को प्रेम और समझदारी से नहीं, बल्कि डर और ज़ोर-जबरदस्ती से थोपने की कोशिश होती है, तो लोग उससे नफ़रत करने लगते हैं।
आस्था की मौत नहीं, आज़ादी की मांग
पाकिस्तान में लोग इस्लाम इसलिए नहीं छोड़ रहे कि वे आस्थाहीन हो गए हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें धर्म को खुलकर जीने नहीं दिया गया।
यह विरोध है उन मौलवियों के ख़िलाफ,जो हत्या को जिहाद मानते हैं, और उन कानूनों के ख़िलाफ, जो इंसान को सवाल पूछने का हक नहीं देते।
अगर इस्लाम को वाकई बचाना है, तो पहले लोगों को उसे न अपनाने की आज़ादी दीजिए, क्योंकि धर्म की असली ताक़त डर में नहीं, स्वतंत्रता में होती है।
भारत के लिए चेतावनी: पाकिस्तान की नकल ठीक नहीं
पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा है, वह केवल उनका संकट नहीं, हमारे लिए भी एक चेतावनी है। भारत को इससे सबक लेने की जरूरत है।
धर्म और सरकार का मेल, धर्म को ही खोखला करता है
पाकिस्तान ने इस्लाम को शासन का हिस्सा बना दिया और नतीजा यह हुआ कि न धर्म बचा, न लोकतंत्र। अगर भारत भी हिंदू धर्म को सत्ता, कानून और शिक्षा में ज़बरदस्ती घुसाने की कोशिश करेगा, तो उसे भी वही अंजाम भुगतना पड़ सकता है।
धर्म का ज़ोर-जबरदस्ती से थोपना, विद्रोह को जन्म देता है
पाकिस्तान में जबरन नमाज़, हिजाब, और धार्मिक शिक्षा ने युवाओं को धर्म से ही विमुख कर दिया है। भारत में भी अगर कोई कहे कि “जय श्रीराम बोलो, वरना मरो”, तो वह दिन दूर नहीं जब युवा धर्म से नहीं, धार्मिक आतंक से भागेंगे।
अल्पसंख्यकों का दमन, समाज को असहिष्णु बनाता है
पाकिस्तान में शिया, अहमदी और गैर-मुस्लिमों पर हुए हमलों ने समाज को हिंसक बना दिया है। अगर भारत में भी मुसलमानों, ईसाइयों या किसी भी धर्म को शत्रु बनाया गया, तो यही नफ़रत एक दिन बहुसंख्यकों को भी निगल जाएगी।
धर्म आधारित राजनीति देश के लिए नुकसानदेह
पाकिस्तान ने धर्म के नाम पर वोट मांगे, कट्टरता फैलाई और आज वहां न धर्म बचा, न शांति।
भारत को इस राजनीतिक चाल से बचना होगा, वरना समाज टूटेगा और आस्था का मूल भाव ख़त्म हो जाएगा।
धर्मनिरपेक्षता ही भारत की असली ताक़त
भारत का संविधान कहता है कि धर्म व्यक्तिगत आस्था है, सरकार का काम धर्म थोपना नहीं है। अगर भारत धर्मनिरपेक्षता छोड़कर धार्मिक राष्ट्र बनने की ओर चला, तो वही हाल होगा जो आज पाकिस्तान भुगत रहा है।
पाकिस्तान हमारे लिए एक मुकम्मल आईना है
पाकिस्तान में धर्म के नाम पर जो कट्टरता फैली हुई है, उसने खुद धर्म को बेहद नुक़सान पहुंचाया है। भारत को यह समझना होगा कि धर्म जब प्रेम, करुणा और विवेक के साथ होता है, तभी वह बच पाता है।
धर्म को जब राजनीति अपने कब्जे में लेती है, तो वो न धर्म को बचा पाती है, न देश को एक रख पाती है। भारत को पाकिस्तान की राह पर नहीं, समझदारी, इंसानियत और विवेक की राह पर चलना होगा। यही असली धर्म है, और यही भारत का भविष्य भी है।
(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनकी यह रिपोर्ट A Journal for Rational Thought and Democratic Freedom in South Asia पर आधारित है।)