भारतीय भाषा समूह ने किया बांग्ला भाषी प्रवासी मजदूरों के साथ हुई घटनाओं का विरोध

नई दिल्ली। भारतीय भाषा समूह ने देश के विभिन्न हिस्सों में बांग्ला भाषी प्रवासी मज़दूरों के साथ हाल में हुई घटनाओं पर चिंता जाहिर किया है ।उसने कहा है कि यह भाषाई हमला हमारे देश की विविधता के लिए गंभीर ख़तरा है।

उसका कहना है कि पिछले एक महीने में देश के अलग-अलग हिस्सों से खबरें आई हैं कि बांग्ला भाषी प्रवासी मज़दूरों को प्रताड़ित किया जा रहा है, पीटा जा रहा है, गिरफ्तार किया जा रहा है, बांग्लादेश भेजा जा रहा है, और वैध पहचान पत्र दिखाने के बावजूद उन्हें रिहा नहीं किया जा रहा है। बांग्ला भाषा एक वैश्विक भाषा है और भारत की संवैधानिक भाषाओं में एक है।  

समूह का कहना है कि बांग्ला भाषियों का केवल इतना ही ‘अपराध’ है कि वे अपनी मातृभाषा बंगाली में बात करते हैं। 25 मई को बीरभूम जिले के छह प्रवासी मजदूरों (जिनमें दो बच्चे भी शामिल थे) को दिल्ली से बांग्लादेश भेज दिया गया। उनके मोबाइल जब्त किए जाने के साथ-साथ उनके पैसे भी रख लिए गए।

 उसने बताया कि 14 जून को महाराष्ट्र के ठाणे से 7-8 बंगाली प्रवासी मजदूरों (जो मुर्शिदाबाद और बर्दवान के रहने वाले थे) को महाराष्ट्र पुलिस ने हिरासत में लिया और उन्हें सीधे बांग्ला देश भेज दिया। आधार और पैन कार्ड जैसे वैध दस्तावेज दिखाने के बावजूद उन्हें छोड़ा नहीं किया गया।

गौरतलब है कि 11 जुलाई को ही दिल्ली के जय हिंद कॉलोनी (जहां बड़ी संख्या में बंगाली प्रवासी मजदूर रहते हैं) से ज़बरन हटा दिया गया। इनमें से कई लोग पिछले 40 वर्षों से वहां रह रहे थे। उनकी बिजली और वाटर की सप्लाई बंद कर दी गई।

चुंचुड़ा निवासी देबाशीष दास को ओडिशा में काम के दौरान बांग्लादेशी होने के संदेह में पुलिस ने परेशान किया। वैध दस्तावेज दिखाने के बावजूद उन्हें प्रताड़ित किया गया। हालांकि वह किसी तरह घर लौटने में कामयाब रहे। 

समूह ने कहा कि सिर्फ़ गिरफ्तारी ही नहीं, बल्कि शारीरिक प्रताड़ना भी की जा रही है, जैसा कि शमशेरगंज निवासी सुजन सरकार के साथ ओडिशा में हुआ—केवल इसलिए क्योंकि वह बंगाली हैं।

कुछ दिन पहले असम के मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अगली जनगणना में जो भी खुद को बंगाली कहेगा, वही यह साबित करेगा कि राज्य में कितने ‘विदेशी’ हैं।

इस गंभीर मुद्दे को लेकर पश्चिम बंगाल में तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो गई है। 

समूह ने बताया कि ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार में मतदाता सूची में किए गए संशोधन की प्रक्रिया के दौरान बांग्ला भाषियों को बांग्लादेशी’ कहकर बदनाम किया जा रहा है।

हमारी इस समझ पर भी यह हमला है कि कोई भी भाषा किसी धर्म विशेष से नहीं जुड़ी होती है। 

समूह ने कहा कि वह इन बांग्ला भाषी नागरिकों की गिरफ़्तारी और उत्पीड़न का कड़ा विरोध करता है। ये कार्रवाइयां भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त प्रवासी मज़दूरों के अधिकारों का, और उनके मौलिक अधिकारों—जैसे समानता का अधिकार, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, और अंतरराज्यीय प्रवासी मज़दूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा—का उल्लंघन हैं।

हम इन कार्रवाइयों में छिपे सांप्रदायिक मंसूबों की भी कड़ी निंदा की जानी चाहिए। एक लोकतांत्रिक देश में किसी को उसकी मातृभाषा बोलने के लिए प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।

इस विरोध पर हस्ताक्षर करने वालों में प्रो. जयति घोष, प्रो. मनोरंजन मोहंथी, नेशनल एलांयस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट की अरुंधती घुरू, मैगसेसे पुरस्कार और समाजवादी पार्टी (इंडिया) के महासचिव संदीप पांडे , सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अरुण मांजी, एडवोकेट ऑन रिकार्ड एस एस नेहरा, अनहद एवं सांस्कृतिकर्मी शबनम हाशमी, वरिष्ठ रेडियो पत्रकार दीपक धोलकिया, मशहूर पर्यावरणविद् दूनू रॉय, वरिष्ठ लेखक सुभाष गाताड़े, सिटीजन ऑर डेमोक्रेसी के महासचिव प्रो. शशि शेखर सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता मनीषा बनर्जी, राजेश रामकृष्णन (चेन्नई) एवं पत्रकार लेखक अनिल चमड़िया शामिल हैं।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)

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