“तुम जो अन्न खाते हो
उसे उगाया है किसी ने
तुम जो कपड़े पहनते हो
उसे बुना है किसी ने
तुम जिस घर में रहते हो
उसे बनाया है किसी ने
इसीलिए कहता हूं
हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए
कि रोज हम थोड़ा – थोड़ा कर इनका कर्ज उतार सकें।,”
कॉमरेड अजीजुल हक
जरा सोचिए एक आदमी को अपनी राजनीतिक-वैचारिक प्रतिबद्धता के चलते ज़िंदगी के 18 साल जेल में बिताने पड़े। लंबे समय तक वो भूमिगत भी रहे। राज्य ने उस आदमी की जवानी छीन ली। उसे उन लोगों के प्रति गहरा गुस्सा होना चाहिए जिन्होंने उसे 18 साल जेल में सड़ा दिया, उसे सोचना चाहिए, मैं एक बार यहाँ से बाहर निकल सकता हूँ, मैं उनसे मिलूँगा। लेकिन वह आदमी जेल से बाहर आकर कहता है, “लोगों से प्यार करना ज़रूरी है। लोगों में तरह-तरह के शक, झगड़े, स्वार्थ होते हैं। फिर भी, लोगों से पागलों की तरह प्यार करना ज़रूरी है। लोग ही हैं जो बुरे वक़्त से अच्छे वक़्त की दहलीज़ तक ले जाते हैं।”
उस आदमी को जेल में मानसिक यातनाएँ दी गईं। उसके हाथ-पैर काट दिए गए, उसे किसी तरह लकवा मार गया। उसे बिजली के झटके दिए गए। उसके सिर पर चोट मारी गई जिससे न्यूरॉन डैमेज हो गए। फिर भी, वह आदमी लिखता है, “मेरे पूरे शरीर पर ज़ख्म हैं! बस मेरे दिल का प्यार बरकरार है! ज़ख्मों के बदले प्यार, क्या यह कोई छोटा ईनाम है? मेरा दिल अभी भी ताज़ा है और प्यार कर सकता है। अगर ज़ख्म न होते, तो नफ़रत न होती। अगर नफ़रत न होती, तो प्यार न होता!”
कॉमरेड अज़ीज़ुल हक़। आज उनका निधन हो गया। महाश्वेता देवी ने अपनी किताब “हज़ार चौरासी की मां” में लिखा है कि प्यार और क्रांति का कभी हिसाब-किताब नहीं करना चाहिए। अज़ीज़ुल हक़ जीवन भर इसी दर्शन का झंडा लेकर प्रेम के पोस्टर बॉय की तरह चले। इतने ज़ुल्म, इतने अंधेरे के बावजूद, कोई अफ़सोस नहीं, कोई पछतावा नहीं, कोई दबा हुआ गुस्सा नहीं, उनका जीवन बस प्यार का सार बना रहा। इसीलिए अपने आखिरी दिनों में भी, वह अपनी बेटी से कहते रहे “तुम तो बस ज़िंदगी में मज़ा ले रही हो, हम तो ज़िंदगी का मज़ा लेते थे।”
60 और 70 के दशक में नक्सलबाड़ी आंदोलन में हिस्सेदारी और उसके चलते अमानवीय जेल यातनाओं को सहकर भी वो टूटे नहीं। कैद होते हुए भी बदलाव की उम्मीद लिए जीते रहे। 1942 में हावड़ा में जन्में अजीजुल हक का सोमवार को कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया। चारू मजूमदार को अपना वैचारिक गुरु मानने वाले अजीजुल हक नक्सलबाड़ी के कद्दावर नेताओं में से थे। कविता लिखने वाले अजीजुल हक एक प्रतिबद्ध राजनैतिक विचारक और लेखक थे। यह उनकी जिजीविषा ही थी कि 1989 में जेल से रिहा होने के बाद भी वो जनाधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे। वो एक अनथके पथिक थे जो लगातार चलते ही रहे। उनके निधन पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने X हैंडल पर लिखा है, वो एक जुझारू और दृढ़ निश्चयी नेता थे। लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने कभी अपना सिर नहीं झुकाया।
( भास्कर गुहा नियोगी पत्रकार हैं।)