देश के ग्रामीण क्षेत्र में चिकित्सा कर्मियों तथा बुनियादी ढांचे की बेहद कमी है। प्रति 1800 पर एक का अनुपात है, 78%डॉक्टर शहरी क्षेत्र में सेवाएं दे रहे हैं। दरसल स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति की भारी कमी है। यहां तक कि तमिलनाडु जैसे तुलनात्मक रूप से विकसित राज्य में पेशेवरों की 30%से अधिक कमी है। देश में 61% पीएचसी में केवल एक डॉक्टर है, 7% पीएचसी बिना डॉक्टर के हैं, 33%पीएचसी में लैब तकनीशियन और 20% में फार्मासिस्ट नहीं हैं।
उड़ीसा जैसे राज्य में 3000 यानी आधे डाक्टर के पद खाली हैं। दरअसल स्वास्थ्य सेवाओं की इस बदहाल स्थिति का एक प्रमुख कारण यह है कि स्वास्थ्य बजट में कोई वास्तविक वृद्धि नहीं हो रही है, न सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने की कोई ठोस योजना है।दक्षिण के राज्यों में स्थिति बेहतर है क्योंकि वहां स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा बेहतर है।
कोविड ने भारत की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं की असलियत को बेनकाब कर दिया था और यह साबित कर दिया था कि भारत का स्वास्थ्य ढांचा ऐसी किसी आपदा को झेलने में असमर्थ है। देश में मरीजों की संख्या जाहिर है बढ़ती जा रही है लेकिन चरमराते सरकारी ढांचे के कारण लोग निजी क्षेत्र की शरण में जाने को मजबूर हैं। पीएचसी (22%), उपस्वास्थ्य केंद्र (20%) कमी है। केवल 7% उपस्वास्थ्य केंद्र और 12% PHC स्थापित मानदंडों को पूरा करते हैं। हालत यह है देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 28 गांवों पर 1 PHC है।
स्वास्थ्य सेवाओं का हाल यह है कि 70% लोग प्राइवेट सेक्टर पर निर्भर हैं।अगर किसी कारणवश निजी स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा जाय तो देश में स्वास्थ्य का पूरा ढांचा ध्वस्त हो जाएगा। स्थिति यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों की तो बात ही छोड़ दीजिए, टीयर 2 और टीयर 3 के शहरों में भी पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं और टीयर 1 के शहरों में सुपर स्पेशलाइजेशन का रुझान है। जहां तक निजी क्षेत्र की बात है तो वहां पारदर्शिता का अभाव है और आए दिन वहां तरह-तरह के कदाचार की शिकायतें आती रहती हैं, उनके ऊपर सरकार का कोई नियंत्रण और जवाबदेही नहीं है, नतीजतन बड़े पैमाने पर वहां मरीजों और उनके परिजनों का शोषण होता है। सरकारी सुविधाओं का हाल यह है कि मरीज स्वास्थ्य संबंधी खर्च का 61% स्वयं वहन करते हैं। जिसके फलस्वरूप 6.3 करोड़ लोग हर साल गरीबी रेखा के नीचे खिसक जाते हैं।
श्रीलंका, थाईलैंड और चीन के साथ ही समान स्तर से भारत ने शुरुआत की थी लेकिन देखते-देखते ये देश आगे निकल गए और भारत इनसे पिछड़ता चला गया। दरअसल भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में इस पिछड़ेपन की जड़ें देश के औपनिवेशिक अतीत में मौजूद हैं। औपनिवेशिक काल में जिस तरह स्वास्थ्य और शिक्षा सबसे उपेक्षित थे और शासन मूलतः औपनिवेशिक शोषण और अभिजात्य वर्ग की सेवा के लिए था। स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति कमोबेश वही नीति आज भी कायम है।
अपर्याप्त फंडिंग के कारण तमाम PHC पर user चार्ज वसूला जाता है, जाहिर है गरीबों के लिए यह बोझ असहनीय होता है। WHO के अनुसार आदर्श स्थिति में डॉक्टर और मरीज का अनुपात एक हजार मरीज पर एक डॉक्टर होना चाहिए।लेकिन भारत में यह अनुपात लगभग डेढ़ गुना, 1445मरीज पर एक डॉक्टर है। ग्रामीण क्षेत्रों में हाल और बुरा है जहां अधिकांश PHC पर केवल एक डॉक्टर है। शिशु चिकित्सक अथवा महिला चिकित्सक और भी कम हैं।
भारत में MMR (deaths per One million live births) दर 97 है।यह अफसोसनाक है कि भारत से Tb और मलेरिया जैसी बीमारियों तक का अभी उन्मूलन नहीं हो सका है। मध्य प्रदेश में18%आबादी नजदीकी PHC से 5 किमी से अधिक की दूरी पर है।जाहिर है गर्भवती महिलाओं के लिए और गम्भीर मरीजों के लिए यह दूरी बहुत भारी पड़ती होगी। ग्रामीण भारत में 3100 पर एक बिस्तर उपलब्ध है।बिहार में 18000लोगों पर एक बिस्तर उपलब्ध है।UP में 39000लोगों पर एक बिस्तर उपलब्ध है। गांवों में औसतन 26हजार आबादी पर एक डॉक्टर उपलब्ध है जबकि WHO के मानक के अनुसार प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए।
दरअसल भारत में स्वास्थ्य पर जीडीपी का मात्र 2% के आसपास खर्च किया जाता है जबकि हमारी जैसी अन्य अर्थव्यवस्थाओं में जीडीपी का 3से 5% तक खर्च किया जाता है। चिकित्सकों की लगातार बनी रहने वाली कमी और जो असमान वितरण है, वह एक बड़ी समस्या है।ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकों की भीषण कमी है।डाक्टरों के भर्ती की प्रक्रिया बेहद धीमी और छिटपुट तरीके से है। नतीजतन ग्रामीण इलाकों में अधिकांश लोग झोला छाप डॉक्टरों पर निर्भर हैं। उच्चतम न्यायालय की पीठजिसमें जस्टिस गवाई और जस्टिस नागरत्ना थीं, ने भी शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के बीच भेदभाव पर गम्भीर चिंता व्यक्त की है।
दरअसल डॉक्टर आमतौर पर गांव में जाते ही नहीं हैं बल्कि शहर में ही अपनी निजी प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं। आज गांवों में 80% चिकित्सा विशेषज्ञों की कमी है, 83% सर्जन की कमी है, 81.6%बाल रोग विशेषज्ञों की कमी है, 79.1% फिजीशियन की कमी है, 72.2% स्त्री रोग विशेषज्ञों की कमी है। गरीबों और समृद्ध लोगों के बीच चिकित्सा सुविधाओं के अंतर के कारण औसत आयु में 7 वर्ष का अंतर है। कल्पना की जा सकती है कि अगर चिकित्सा का आधा खर्च अपनी जेब से करना पड़ता है तो 27/रुपये प्रतिदिन कमाने वाले किस तरह अपना चिकित्सा खर्च वहां वहन करते होंगे।
आज जरूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर सार्वजनिक खर्च बढ़ाया जाय। इसे कम से कम जीडीपी का 5% किया जाय। ग्रामीण क्षेत्र में बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जाय और डाक्टरों को ग्रामीण क्षेत्र में सेवा के लिए पर्याप्त इंसेंटिव दिया जाय। निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर नकेल कसी जाय और उनके द्वारा होने वाली लूट पर रोक लगाई जाय।
(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)