सर्वे के अनुसार बिहार में दलितों के बीच महागठबंधन को निर्णायक बढ़त

बिहार में हाल ही में हुए एक सर्वे में दलितों के बीच महागठबंधन को बढ़त मिलती दिख रही है। यह सर्वे National Confederation of Dalit and Adivasi Organisations औरThe Convergent Media के 98 दलित कार्यकर्ताओं ने मिलकर किया है जिसके लिए पहले उन्हें प्रशिक्षण दिया गया। सर्वे 49 विधानसभा क्षेत्रों में किया गया जिसमें 11आरक्षित क्षेत्र हैं। सर्वे बिहार के सभी 6 क्षेत्रों में किया गया जिसमें कोसी मिथिलांचल सीमांचल भोजपुर चंपारण मगध पाटलिपुत्र शामिल हैं।इनमें महागठबंधन की बढ़त सबसे अधिक कोसी अंचल में है 72.33%,और भोजपुर में 53.75%है। NDA की बढ़त केवल एक क्षेत्र में है सीमांचल में 42.51%। जातिगत जनगणना का श्रेय 58.38%लोग राहुल तेजस्वी की जोड़ी को देते हैं।

सर्वे से ऐसा लगता है कि महादलित तबके में बिखराव हो रहा है और उसका एक हिस्सा  छिटककर अब महागठबंधन की ओर आ रहा है। बिहार में दलित कुल आबादी का 19.65%हैं।इस तरह एक ब्लॉक के बतौर चुनाव में वे निर्णायक साबित हो सकता है।इनमें पासवान 31%, रविदास 30.72%, मुसहर 17.08% हैं। शेष में  कम संख्या वाली 20 जातियां शामिल हैं। सर्वे के अनुसार ऐसा नहीं है कि महागठबंधन के मतों में कोई बड़ी वृद्धि हो रही है, यह वृद्धि मात्र 0.19% है। दरअसल यह फर्क इसलिए पड़ रहा है कि NDA के मतों में4.6%की गिरावट हो रही है। महा गठबंधन का मुख्य आधार रविदास तथा अन्य छोटी जातियां हैं जबकि NDA का मुख्य आधार दुसाध और वाल्मीकि समुदाय है।

48.43% दलित सरकार से असंतुष्ट हैं। अभी जो SIR की कवायद चल रही है उसमें71.51% दलितों को अपना नाम कटने का डर है।दलितों में 27.4% को चुनाव आयोग पर विश्वास नहीं है,जबकि 51% को विश्वास है।

दलितों में 58%बेरोजगारी को सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं। यह बड़ा स्वाभाविक है। जमीन पूंजी और उत्पादन के किसी भी साधन से वंचित दलितों के पास रोजगार ही जीवन का एकमात्र साधन है।

गांवों में मशीनीकरण के चलते दूसरों के खेत में काम का परम्परागत विकल्प अब रहा नहीं। मनरेगा इन दलित मजदूरों के लिए जीवन का बहुत बड़ा आधार बनकर आई थी, लेकिन उसको भी जिस तरह तमाम तरीकों से विफल करने का मोदी सरकार ने प्रयास किया है, उससे मजदूरों के सामने रोजगार का बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

जिस तरह उसका बजट लगातार घटाया गया है,मजदूरी की निम्न दरों में कोई वृद्धि नहीं की गई है, और अब आधार कार्ड से उसे जोड़ने, काम करते हुए कार्यस्थल की फोटो अपलोड करने जैसे प्रावधान जोड़े जा रहे हैं, उससे मनरेगा के तहत दलित मजदूरों को काम मिलना कठिन होता जा रहा है। मनरेगा गरीबों के लिए आजीविका का कितना बड़ा आधार था,यह कोविड के दौरान साबित हो गया जब करोड़ों मजदूर अपने घरों को वापस लौट कर गए और मनरेगा उनकी जीवन रेखा बना,लेकिन मोदी सरकार इस विकल्प को भी कमजोर करने पर आमादा है।

सरकार की गलत नीतियों के चलते MSME सेक्टर जिस तरह बैठ गया, उसके सबसे बदतरीन शिकार ये मजदूर ही हुए, वहां भी काम के अवसर उनके लिए खत्म हो गए।

जहां तक सरकारी नौकरियों की बात है,उसके लिए जितना कम कहा जाय उतना ही अच्छा।अंधाधुंध निजीकरण के चलते सरकारी नौकरियों के अवसर खत्म होते जा रहे हैं, फलस्वरूप आरक्षण भी खत्म होता जा रहा है। निजी क्षेत्र में आरक्षण है नहीं,आउटसोर्सिंग, ठेकेदारी व्यवस्था और लैटरल एंट्री जैसे तरीकों से सरकारी नौकरियों में पढ़े लिखे दलितों के लिए भी रोजगार के दरवाजे बंद कर दिए जा रहे हैं।

ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से रोजी रोजगार का मुद्दा दलितों मेहनतकशों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है।महागठबंधन के प्रति उनके आकर्षण का यह बड़ा कारण है। विपक्ष से उन्हें शायद उम्मीद है कि उनकी सरकार बनने पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। पिछली बार जिस तरह महागठबंधन ने नौकरियों का वायदा करके लहर पैदा कर दी थी,और अपने अल्प कार्यकाल में उसे पूरा करके भी दिखाया, आशा की जानी चाहिए कि इस बार भी रोजगार को सबसे बड़ा मुद्दा मानने वाले युवा श्रमिक और दलित नीतीश भाजपा के मनसूबों पर पानी फेरने का काम करेंगे।

इस सर्वे की विशेषता यह है कि यह दलितों के बीच दलित कार्यकर्ताओं द्वारा ही किया गया है।इसलिए इसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती है क्योंकि भारतीय समाज की जिस तरह की संरचना है उसमें दलित गैरदलित  सर्वे करने वालों के बीच अपने को उतना सहज नहीं पाते कि अपने मन की बात खुलकर रख सकें। लेकिन दलित मूल के सर्वे करने वालों के बीच स्वाभाविक रूप से वे अपने दिल की असली बात रख सकते हैं। 18हजार के पर्याप्त बड़े डेटा बेस पर ये सर्वेक्षण किया गया है।

इस सर्वे के नतीजों के आधार पर महागठबंधन को 46.13%लोगों का समर्थन प्राप्त है जबकि NDA को 31.93%लोगों का ही समर्थन मिल रहा है,एक छोटे हिस्से का रुझान प्रशांत किशोर की जन सूरज पार्टी की ओर भी देखा गया है। पिछले चुनाव में भी अंतर था लेकिन इस बार खास बात यह है कि वह अंतर बढ़ गया है,ऐसा NDA के प्रति रुझान में गिरावट के कारण हुआ है।

एक थोड़ा चौंकाने वाला नतीजा यह है कि जाति जनगणना का श्रेय 33% लोग मोदी को देते हैं जबकि राहुल को 30%लोग और तेजस्वी को 27% लोग देते हैं, बहरहाल राहुल और तेजस्वी का प्रतिशत जोड़ दिया जाय तो 57%हो जाता है जो महागठबंधन को श्रेय माना जा सकता है।दलितों के बीच लोकप्रियता के क्रम में राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के प्रति 47.5%और राहुल के प्रति 40%रुझान है।दरअसल इसमें खास बात यह है कि मोदी की लोकप्रियता में पहले की तुलना में गिरावट हुई है और बिहार में तुलनात्मक रूप से बेहद कमजोर पार्टी होने के बावजूद राहुल की लोकप्रियता में वृद्धि हुई है।

दलितों में लोकप्रियता के पैमाने पर नीतीश कुमार चिराग पासवान से नीचे हैं। सर्वे करने वालों के अनुसार दलितों और पिछड़ों विशेषकर अति पिछड़ों के बीच में एकता बढ़ी है। जिस तरह PDA का नारा देकर अखिलेश ने UP में MY समीकरण से निकलने में सफलता पाई है, उसी तरह A to Z का नारा देकर तेजस्वी  MY समीकरण से निकलने और अपने सामाजिक आधार को विस्तार देने में सफल रहे हैं।

जाति जनगणना से दरअसल दलितों को कोई लाभ होने वाला नहीं है। उनकी जनगणना तो पहले से ही होती है। लेकिन उसका समर्थन करके दलितों ने पिछड़ों के, अतिपिछड़ों के साथ एकता का संदेश दिया है।

आरक्षण बढ़ाने की मांग का सर्वे के अनुसार 82.89% दलितों ने समर्थन किया है जो जाहिर है पिछड़ों,अतिपिछड़ों की मांग के लिए समर्थन है। 48% दलित नीतीश सरकार के कम काज को खराब मानते हैं।

दलितों के द्वारा दलितों के बीच किए गए सर्वेक्षण से यह साफ है कि संघ भाजपा द्वारा किए गए लाख प्रयास के बावजूद दलितों का हिंदुत्वकरण करने में वह सफल नहीं हो पाई है।राम विलास पासवान जैसे कद्दावर नेता के बल पर पासवान समुदाय,नीतीश द्वारा महादलित पर प्रभाव और मांझी जैसे नेताओं के बल पर NDA को जो भी समर्थन मिल जाय लेकिन भाजपा अपने बल पर वाल्मीकि समुदाय को छोड़कर किसी दलित जाति में अपना स्वतंत्र आधार बना पाने में सफल नहीं हुई है। डॉ अम्बेडकर के प्रभाव वाले रविदास समुदाय का उससे खास दुराव है।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनाव आयोग की SIR जैसी तमाम तिकड़मों की काट करते हुए महागठबंधन दलितों के बीच अपने प्रति व्यापक समर्थन को वोटों में तब्दील कर पाएगा ?बिहार चुनाव के जनादेश में वोट  चोरी को रोकना निर्णायक कारक साबित होगा,यह तय है।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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