चीन की आत्मनिर्भर तकनीकी क्रांति के आगे पस्त अमेरिका और एकल ध्रुवीय विश्व के मोह में पड़े भारत का भ्रम

अमेरिका आज जिस रास्ते पर चल रहा है, वह विरोधाभासों और अस्थिर प्राथमिकताओं से भरा हुआ है। एक ओर वह वैश्विक नेतृत्व की बात करता है, वहीं दूसरी ओर व्यापारिक लाभ के लिए तमाम सुरक्षा सिद्धांतों की बलि देता है। हाल की घटनाओं की श्रृंखला देखें तो साफ़ हो जाता है कि अमेरिका अब ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है जहाँ वह अपने ही घोषित सिद्धांतों से पीछे हटने को तैयार है, बशर्ते उसके कुछ आर्थिक या राजनीतिक लक्ष्य पूरे हो जाएँ।

ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते की अमेरिका यात्रा का अचानक रद्द हो जाना सिर्फ राजनयिक घटना नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक था कि अमेरिका अपनी विदेश नीति में अब किस हद तक लचीलापन दिखा रहा है। यह यात्रा, जिसमें डलास और न्यूयॉर्क जैसे प्रमुख शहरों में रुकने की योजना थी, ट्रंप प्रशासन के संशोधित प्रस्तावों के कारण रद्द करनी पड़ी।

प्रशासन ने साफ़ शब्दों में ‘ना’ नहीं कहा, लेकिन इतने प्रतिबंध और शर्तें जोड़ दीं कि स्पष्ट हो गया वह यह यात्रा नहीं चाहता। इसी के साथ ताइवान के रक्षा मंत्री वेलिंगटन कू की पेंटागन के वरिष्ठ अधिकारियों से प्रस्तावित बैठक भी खामोशी से रद्द कर दी गई, जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ट्रंप से फोन पर अमेरिका से ताइवान के साथ ‘मिनिमम एंगेजमेंट’ की मांग की।

इस घटना-श्रृंखला ने यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका की ताइवान नीति अब कूटनीतिक सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि व्यापारिक दबावों पर आधारित है। यह और अधिक स्पष्ट तब हुआ जब ट्रंप प्रशासन ने एनविडिया के अत्याधुनिक एआई चिप H20 पर लगी पाबंदियों को हटा लिया। यह वही चिप है जिसे पहले सुरक्षा कारणों से प्रतिबंधित किया गया था क्योंकि इसका इस्तेमाल चीन की सैन्य क्षमता को तेज़ी से बढ़ाने में हो सकता था, चाहे वो परमाणु हथियारों की सिमुलेशन हो, या ड्रोन और साइबर हथियारों का विकास। लेकिन एनविडिया के CEO की लॉबिंग और कंपनी के आश्वासन के बाद कि इन चिप्स का इस्तेमाल सैन्य क्षेत्र में नहीं होगा, अमेरिका ने यह प्रतिबंध वापस ले लिया।

यह निर्णय सुरक्षा विशेषज्ञों को चौंकाने वाला लगा। बीस से अधिक अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों ने इस कदम को रणनीतिक भूल बताया और चेताया कि इससे अमेरिका की एआई में बढ़त खतरे में पड़ जाएगी। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इन चेतावनियों की अनदेखी की और प्रतिबंध हटाए रखे। इससे अमेरिका में यह धारणा बलवती हुई कि अमेरिका की तकनीकी सुरक्षा नीतियाँ अब निजी कॉर्पोरेट हितों के अधीन हो चुकी हैं।

इसी प्रकार हुवेई के Ascend चिप्स के खिलाफ अमेरिका के वाणिज्य विभाग ने पहले कड़ा बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि इनका इस्तेमाल नियमों का उल्लंघन है। लेकिन व्यापार वार्ता के चलते कुछ ही दिनों में उसी बयान को संशोधित कर ‘रिस्क अलर्ट’ में बदल दिया गया। यह भाषाई बदलाव केवल शब्दों तक सीमित नहीं था। यह स्पष्ट संदेश था कि अमेरिका अब प्रतिबंधों को किसी स्थायी नीति की तरह नहीं, बल्कि मोलभाव के औज़ार की तरह देख रहा है।

इन घटनाओं के समानांतर अमेरिका भारत के मामले में कड़ा रुख दिखा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि भारत पर 20–25% टैरिफ लगाया जा सकता है। यह रणनीतिक दवाब था। ट्रंप ने कहा कि भारत एक अच्छा मित्र रहा है, लेकिन वह दुनिया में सबसे ज्यादा टैरिफ लगाता है। ऐसा नहीं चल सकता। यह बयान उन्होंने स्कॉटलैंड से लौटते वक्त एयरफोर्स वन में दिया।

पहली नज़र में भारत और अमेरिका के व्यापारिक तनाव को देखकर यह कहा जा सकता है कि अमेरिका चीन के बाद अब भारत पर नज़रें टेढ़ी कर रहा है। डोनाल्ड ट्रम्प की धमकी कि भारत पर 20-25% टैरिफ लगाया जा सकता है, सतही तौर पर दिखाई देने वाली सख़्ती है। लेकिन अगर गहराई से देखें, तो यह कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं, बल्कि उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत अमेरिका विकासशील देशों के भीतर अंतर्विरोधों को बढ़ावा देकर उन्हें अपनी ही नीतियों के खिलाफ खड़ा करना चाहता है। चीन पहले ही यह समझ चुका है कि अमेरिका का असली खेल भारत बनाम चीन नहीं, बल्कि भारत बनाम भारत कर देना है, यानी भारत को खुद अपनी सामाजिक-आर्थिक खामियों और नीतिगत भ्रमों में उलझाकर रखना।

भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में व्यापार समझौतों को लेकर जो वार्ताएँ चली हैं, उनमें असल टकराव टैरिफ का नहीं, बल्कि भारतीय बाज़ार की आत्मनिर्भरता को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कृषि और डेयरी क्षेत्र को खोल दे, जीएम (genetically modified) उत्पादों को अनुमति दे और अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए रास्ता साफ़ करे।

लेकिन भारत में इन सवालों पर पहले से ही मतभेद हैं। किसान संगठन, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और पर्यावरण कार्यकर्ता इन नीतियों का विरोध करते रहे हैं। अमेरिका इन्हीं मतभेदों को पहचानकर भारतीय नीति-निर्माण को अंदर से तोड़ना चाहता है। ट्रंप के बयानों से ज़्यादा खतरनाक है वह दबाव, जो अमेरिकी लॉबियों के ज़रिए भारत के भीतर किसानों और उपभोक्ताओं के हितों को आपस में टकरा देने के लिए डाला जा रहा है।

एक तरफ भारत चीन से मुकाबला करने की बात करता है, दूसरी तरफ वह खुद ही अपनी उत्पादन क्षमता, श्रम शक्ति और बाज़ार संरचना को विश्व व्यापार के शर्तों के अधीन गिरवी रख रहा है। टेक्सटाइल, फार्मा, कृषि और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में भारत अगर अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट नहीं करता, तो चीन से मुकाबला सिर्फ नारों तक सीमित रहेगा।

जब अमेरिका वियतनाम, इंडोनेशिया, जापान और यूरोपीय संघ से व्यापार समझौते करता है लेकिन भारत के साथ नहीं करता, तो इसका कारण भारत का स्वाभिमानी रुख नहीं है, बल्कि उसका अस्पष्ट रवैया है, जो हर क्षेत्र में अलग-अलग वर्गों के बीच टकराव पैदा कर देता है। इसीलिए असली लड़ाई भारत बनाम चीन नहीं, भारत बनाम भारत है। एक तरफ ऐसा भारत जो विश्व मंच पर ताक़तवर दिखना चाहता है, और दूसरी तरफ वो भारत जो आंतरिक असमानताओं, नीतिगत भ्रमों और सामाजिक तनावों से ग्रस्त है।

चीन यह समझता है कि अमेरिका किसी देश को सैन्य युद्ध में नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक तनावों के ज़रिए हराता है। यही कारण है कि चीन घरेलू बाजार को नियंत्रित करने, नीतिगत स्पष्टता रखने और टेक्नोलॉजी को आत्मनिर्भरता का औजार बनाने पर ज़ोर देता है। दूसरी ओर भारत में नीतियाँ बार-बार बदलती हैं, केंद्र और राज्य सरकारें अलग-अलग दिशा में चलती हैं, और निजी लॉबियाँ नीति निर्धारण को प्रभावित करती हैं। ऐसे में अमेरिका का टैरिफ तो बाहरी चीज है; असल लड़ाई भारत को अंदर से अस्थिर करके उसकी नीति-स्वातंत्र्य को पंगु बनाना है।

अगर भारत को अमेरिका की इस रणनीति का जवाब देना है, तो उसे चीन से लड़ने की जगह खुद से टकराने की प्रवृत्ति को खत्म करना होगा। स्पष्ट नीति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, और सामाजिक-सांस्कृतिक एकता के बिना भारत कोई भी वैश्विक शक्ति नहीं बन सकता। जब तक भारत ‘भारत बनाम भारत’ की इस लड़ाई से बाहर नहीं निकलता, तब तक वह अमेरिका या चीन, किसी का भी प्रभावशाली साझेदार नहीं बन पाएगा।

यह घटनाएं वैश्विक शक्ति संतुलन के गहरे परिवर्तन को रेखांकित करती हैं। एक ओर अमेरिका अपने पुराने सिद्धांतों से पीछे हट रहा है, तकनीकी प्रतिबंधों को सौदेबाज़ी का हिस्सा बना रहा है, और अपने सहयोगियों के साथ अस्थिर व्यवहार कर रहा है, वहीं दूसरी ओर उभरती शक्तियाँ जैसे चीन स्थिर, दृढ़ और दीर्घकालिक रणनीतियों के साथ आगे बढ़ रही हैं।

चीन, जिसने वर्षों से तकनीकी आत्मनिर्भरता पर बल दिया है, अब देख रहा है कि अमेरिका स्वयं अपनी तकनीकी बढ़त को बाज़ार में बेचने को तैयार है। इससे चीन को न केवल राहत मिल रही है, बल्कि यह उसे वैधता भी दे रहा है कि वह अपने तकनीकी विकास को ‘नैतिक प्रश्नों’ से परे रखे।

दूसरी ओर, अमेरिका की प्रतिबंध नीति अब इतने विरोधाभासों से घिरी हुई है कि वह किसी गंभीर रणनीतिक उद्देश्य की प्रतीक नहीं रही। ताइवान को समर्थन देने का दिखावा, फिर झुक जाना, एआई तकनीक को चीन तक न पहुंचने देने की बात, फिर उसके लिए रास्ता खोल देना, भारत को रणनीतिक साझेदार बताना, फिर उस पर टैरिफ की धमकी देना; इन सबका सामूहिक परिणाम यह है कि अमेरिका अब विश्व मंच पर स्थिर नेतृत्व देने में असमर्थ दिख रहा है।

इन सबके बीच ट्रंप की चीन यात्रा को लेकर आई टिप्पणियाँ भी ध्यान देने योग्य हैं। पहले उन्होंने कहा कि शी जिनपिंग ने उन्हें आमंत्रित किया है और वे जल्द चीन जा सकते हैं। फिर कुछ ही दिनों बाद उन्होंने कहा कि वे तब तक नहीं जाएंगे जब तक उन्हें शी का औपचारिक निमंत्रण न मिले। यह असमंजस और सार्वजनिक बयानबाज़ी की ये श्रृंखला बताती है कि अमेरिका अब पहल करने वाला पक्ष नहीं रहा, बल्कि उसे परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया देनी पड़ रही है।

व्यापार युद्ध की बात करें तो अप्रैल में ट्रंप द्वारा घोषित 145% टैरिफ और फिर चीन की ओर से रेयर-अर्थ मिनरल्स के निर्यात पर रोक ने यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका के पास इस वक़्त उस स्तर की तैयारी नहीं है जो दीर्घकालिक व्यापार संघर्ष के लिए आवश्यक होती है। इसके बाद दोनों पक्षों ने लंदन में मुलाकात कर व्यापारिक प्रतिबंधों को रोके रखने की अनौपचारिक सहमति बनाई, और तब से कोई नया नियंत्रण लागू नहीं किया गया। इससे स्पष्ट है कि अमेरिका भी अब इस युद्ध को थामने के मूड में है, भले ही उसने इसकी शुरुआत की हो।

अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों को व्यापार सौदों में बदलने की यह प्रवृत्ति लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक स्थिरता को तोड़ रही है। कार्टर प्रशासन के बाद से यह स्पष्ट नीति थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े तकनीकी नियंत्रण किसी व्यापारिक समझौते का हिस्सा नहीं बनेंगे। लेकिन अब ट्रंप प्रशासन खुलेआम इन्हें सौदेबाज़ी की चीज़ बना रहा है। यह न केवल वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका की भूमिका को कमजोर करता है, बल्कि आने वाले समय में अन्य देश भी इन नियंत्रणों को गंभीरता से लेना बंद कर सकते हैं।

फिलहाल जो परिदृश्य उभर रहा है वह यही दिखाता है कि अमेरिका अपने ही जाल में उलझ गया है; वह जितना ज़ोर लगाता है बाहर निकलने का, उतना ही गहरे धँसता जाता है; और तब, दुनिया के बाकी हिस्से, चाहे वह चीन हो, भारत हो, या यूरोप, यह महसूस करते हैं कि अब अमेरिका से दिशा नहीं, सिर्फ़ संकेत मिलते हैं, और वो भी अक्सर भ्रमित करने वाले। ये संकेत किसी दीर्घकालिक नीति की घोषणा नहीं, बल्कि तात्कालिक दबावों की प्रतिक्रियाएं होते हैं। इस विश्वव्यवस्था में जो देश अपने पथ पर स्थिर रहेंगे, वही अंततः निर्णायक सिद्ध होंगे। अमेरिका, फिलहाल, वह देश नहीं दिखता।

(मनोज अभिज्ञान एडवोकेट और टिप्पणीकार हैं)

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