ग्राउंड रिपोर्ट : बनारस के राजातालाब में खौफ का पहरा; कांवड़, कानून और बंद दरवाज़ों के पीछे सिसक रहा इंसाफ़ !

वाराणसी। राजातालाब क्षेत्र का रानी बाजार रोज़ की तरह चहल-पहल से भरा हुआ था। दुकानें खुली थीं। बच्चे खेल रहे थे। मोहल्ले के लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे। उसी शाम अचानक मंजर बदल गया। एक घटना ने पूरे इलाके की शांति और विश्वास को झकझोर दिया। एक कांवड़िए के साथ कथित मारपीट के बाद गंगापुर का माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया। भारी पुलिस बल की तैनाती हुई। दुकानें आधी खुली–आधी बंद हो गईं और मुस्लिम समुदाय के घरों के दरवाज़े, कम से कम अनिश्चितकाल के लिए बंद हो गए।

कांवड़िए के साथ कथित मारपीट की घटना के बाद राजातालाब थाना क्षेत्र के बढ़ैनी कला गांव निवासी पल्टू यादव और शुभम यादव की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ संगीन धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कांवड़ यात्रा से लौटते समय कथित रूप से हमला किया गया। यह घटना 28 जुलाई की शाम लगभग बजे की है, जब दोनों अदलपुर से बोल बम यात्रा पूरी कर जल लेकर अपने गांव लौट रहे थे। राजातालाब रेलवे फाटक के पास पहले से मौजूद 10–12 अज्ञात लोगों ने उन्हें रोक लिया। आरोपियों ने मुंह बांध रखा था और कथित तौर पर धार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा, “बोल बम तुम्हारे लिए नहीं है।

एफआईआर के मुताबिक, “जब पीड़ितों ने इसका विरोध किया तो आरोप है कि हमलावरों ने भद्दी-भद्दी गालियां दीं और लात-घूंसों, डंडों व धारदार हथियारों से हमला कर दिया।” पल्टू यादव के सिर और शरीर के अन्य हिस्सों पर गंभीर चोटें आईं। पीड़ितों का दावा है कि हमलावर उन्हें जबरन एक घर में खींचकर ले गए, जहां उन्हें फिर से पीटा गया और जान से मारने की धमकी दी गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके मोबाइल फोन और अन्य सामान छीन लिए गए और जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया गया।

घटना के बाद स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप से दोनों की जान बच पाई और पुलिस को सूचना दी गई। पल्टू यादव की तहरीर पर राजातालाब थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई है। एफआईआर संख्या 192765970 के तहत गंभीर धाराओं में मामला दर्ज करते हुए उपनिरीक्षक रोहित दुबे को जांच सौंपी गई है। पीड़ित पल्टू यादव का कहना है कि, “हमने तो केवल भगवान भोलेनाथ की सेवा के लिए जल चढ़ाने का संकल्प लिया था, लेकिन हमें पीटा गया, धमकाया गया और हमारी आस्था का अपमान किया गया।”

मुसलमानों के घर पर फोर्स का पहरा

जनचौक की टीम जब घटनास्थल घर पहुंची तो मौके पर भारी पुलिस फोर्स पहरा देती नज़र आई। तस्वीरें खींचने और पीड़ितों से मिलने पर भी पाबंदी थी। संपर्क साधा गया तो पता चला कि घरों में कुछ गिनी-चुनी महिलाएं व बच्चे हैं। कोई पुरुष नहीं है। सब के सब खौफ के चलते अपना सामान समेटकर पलायन कर गए हैं और पड़ोस के एक गैर जिले में अपने परिचितों के यहां रह रहे हैं।

काफी प्रयास के बाद कुछ पीड़ितों से मुलाकात हुई और उस किशोरी से भी, जिसका वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में किशोरी रोते-बिलखते हुए कांवड़ियों पर इल्जाम लगा रही है कि घटना के समय वह अपनी दुकान में थी और उसके साथ दरिंदगी करने की कोशिश की गई। दरिंदगी से बचने के लिए वो चीखते हुए भागी तो कांवड़िया ने उसे दौड़ा लिया और हमारे घर में घुस गया।

हर दुकान के बाहर फोर्स

घटना के बाद से किशोरी दहशत में है। हमारी मुलाकात हुई तो वह बात करने की स्थिति में नहीं थी। एक चिकित्सक उसका उपचार कर रहे थे। पास में मां शबनम परवीन बैठी थीं और माहौल बेहद ग़मगीन था। परवीन की आंखें आंसुओं से भरी थीं। उनका गला बार-बार रुंध जा रहा था। उन्होंने कहा, “मेरी बेटी के साथ दरिंदगी करने की कोशिश की गई। जब हमने विरोध किया तो घर में घुसकर सब कुछ तहस-नहस कर दिया गया। हमें ही झूठे मुक़दमे में फंसा दिया गया।”

पीड़िता मुश्किल से बात करने के लिए तैयार हुई। बातचीत से पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। फूट-फूटकर रोते हुए उसने वारदात के बारे में जानकारी दी और कहा, “वो लोग दुकान में घुसे और मुझे पकड़ने की कोशिश करने लगे। मैंने शोर मचाया तो उन्होंने मुझ पर हमला किया। जब घरवालों ने विरोध किया तो पूरे घर को तोड़ डाला।”

पीड़ित परिवार का कहना है कि न्याय की लड़ाई में वे अकेले पड़ गए हैं। घटना के कई दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक पीड़ित की बेटी की ओर से की गई शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। परिवार भय और असुरक्षा के माहौल में जी रहा है। पीड़ितों की ओर से कई गंभीर साक्ष्य मुहैया कराए गए, कांवड़ियों को कटघरे में खड़ा करते हैं।

राजातालाब में घटना स्थल के बाहर जमीन पर स्थापित मूर्ति

पीड़िता के बयान और परिजनों के मोबाइल में रिकॉर्ड कई वीडियो इस बात की तस्दीक करते हैं कि हमला एकतरफा नहीं था। वीडियो में एक युवक जो कांवड़धारी के भेष में है और  किशोरी को दौड़ाता दिख रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद पुलिस ने अब तक कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की है।

राजातालाब से पलायन कर गए बच्चों और बुजुर्गों के चेहरों पर सिर्फ एक ही सवाल था, “क्या हम सुरक्षित हैं?” जिस मोहल्ले में आज तक भाईचारे की मिसाल दी जाती थी वहां अचानक से एक समुदाय खुद को अकेला और असहाय महसूस कर रहा है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जहां यह घटना हुई वह रास्ता कांवड़ियों की तय यात्रा मार्ग पर था ही नहीं। स्थानीय लोगों के अनुसार, कांवड़ियों का जुलूस काफी पीछे था और दो युवक पहले से सौ मीटर आगे जाकर जूते की दुकान में घुसे, जहां काउंटर पर एक किशोरी बैठी थी। पीड़ित किशोरी की मां शबनम परवीन कहती हैं, “हमने सीसीटीवी फुटेज दिए, वीडियो दिए, लेकिन पुलिस ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया। उल्टा हमारे घर के लोगों को ही उठाया जा रहा है।”

राजातालाब में घटना के बाद एकत्र कांवड़ियों का जत्था

वायरल हो रहे एक वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे दुकान के सामने डीजे बजाया जा रहा था और माहौल को उत्तेजक बनाने की कोशिश की गई। मुस्लिम पक्ष ने जो वीडियो और सीसीटीवी फुटेज मुहैया कराए हैं, वे एक अलग ही कहानी बयान करते हैं-एक भयावह शाम की जिसमें उनकी सुरक्षा तार-तार हो गई।

घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो और सीसीटीवी फुटेज वायरल हो रहे हैं, जिनमें पुलिस और आरएसएस नेताओं की भूमिका सवालों के घेरे में है। कुछ मीडिया वाले तो पुलिस की कहानी से चार कदम आगे बढ़कर इस घटना को सांप्रदायिकता के रंग में रंगने की कोशिश कर रहे हैं।

निशाने पर एक एक्टिविस्ट

इस पूरी घटना में सामाजिक कार्यकर्ता आबिद शेख का नाम उछाला गया। पुलिस उन्हें पकड़ने के लिए लगातार दबिश दे रही है, जबकि ‘जनचौक  को प्राप्त सीसीटीवी फुटेज में घटना के समय आबिद भदोही में एक दुकान के बाहर खड़े दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि क्या उन्हें जानबूझकर फंसाया जा रहा है? आबिद को पकड़ने के लिए पुलिस ने राजातालाब थाने बुलाकर कई लोगों से सख्त पूछताछ की।

एक्टिविस्ट आबिद का आरोप है, मेरे परिजनों और रिश्तेदारों की गिरफ्तारियां एकतरफा और पक्षपातपूर्ण हैं। बिना ठोस साक्ष्यों के निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जा रहा है और मामले को जानबूझकर सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है। घटना की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और कानून का इस्तेमाल न तो दबाव में और न ही भेदभावपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए। जिन लोगों ने तोड़फोड़ कीहमारे परिवार के सदस्यों को धमकायामारपीट की और उत्पात मचायाउनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।”

इस बीच राजातालाब पुलिस ने अल्पसंख्यक समुदाय के सात लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें नूर हसन (पुत्र स्व. रमज़ान), मुनकर (पुत्र शंकर शेख), अलाउद्दीन (पुत्र अलाउद्दीन शेख), मुनव्वर शेख उर्फ़ राजू उर्फ़ मोहम्मद गुलज़ार, महबूबा रोदा (निवासी–रानी बाजार, राजातालाब), रिज़वान (पुत्र कमालुद्दीन), शहाबुद्दीन, मेहदी (निवासी–मिर्ज़ामुराद, वाराणसी) और सलामुद्दीन (पुत्र स्व. हनीफ़) शामिल हैं। पुलिस का कहना है कि गिरफ्तार किए गए लोगों पर हिंसा भड़काने, पुलिसकर्मियों पर हमला करने और धर्मांतरण से जुड़े गंभीर आरोप हैं।

पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में भारतीय दंड संहिता की धारा 191(2), 115, 118(1), 333, 352, 351 और 309(4) सहित कई गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। साथ ही उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(3) को भी जोड़ा गया है, जिसमें आपराधिक षड्यंत्र, लोक सेवक को गंभीर चोट पहुंचाने, हाथापाई, आत्महत्या के प्रयास और जबरन धर्म परिवर्तन कराने जैसे आरोप लगाए गए हैं। सभी आरोपितों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

कितना सच है पुलिस का दावा

हालांकि, इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। गोमती ज़ोन के पुलिस उपायुक्त आकाश पटेल की ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया है कि यह केवल एक स्थानीय दुकानदार और कांवड़ यात्री के बीच विवाद था। प्रेस नोट में कहीं भी धर्म परिवर्तन या सामूहिक हमले का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, प्रथम दृष्टया धर्म परिवर्तन का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है।

जब इस विषय में एसीपी अजय कुमार से बात की गई तो उन्होंने स्वीकार किया कि धर्म परिवर्तन की बात निराधार है। यह बयान पुलिस द्वारा दर्ज रिपोर्ट के कुछ अंशों को खारिज करता है। अजय कहते हैंथाना पुलिस को जो तहरीर मिलेगीउसी के अनुसार पुलिस रिपोर्ट दर्ज करेगी। जांच चल रही है। धर्म परिवर्तन की बात झूठी और बेबुनियाद प्रतीत होती है। जांच में सारे साक्ष्य सामने आ जाएंगे। जो दोषी होगापुलिस उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी।”

दूसरी ओर, अल्पसंख्यक समुदाय का आरोप है कि विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस जैसे संगठनों के दबाव में पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की। घटना के तुरंत बाद विहिप के ज़िला अध्यक्ष नीरज पांडेय स्वयं हथियार लेकर घटनास्थल पर पहुंचे और पुलिस अधिकारियों से कथित रूप से बदसलूकी की। उन्हें थाने ले जाया गया, लेकिन वहां भी उन्हें विशेष सुविधा दी गई। बताया जाता है कि उन्हें थाने में पानी की बोतलों के साथ ठसक से बैठाया गया और बाद में बिना किसी कार्रवाई के छोड़ दिया गया। इस बात की पुष्टि एक खबरिया चैनल न्यूज नेटवर्क इंस्टा पर पर होती है। इस खबरिया चैनल ने विहिप नेता नीरज पांडेय की दबंगई की तस्वीरों के साथ पुलिस की नीति और नीयत पर कड़ा प्रहार किया है।

इधर, पुलिस द्वारा जारी प्रेस नोट और एफआईआर में दर्ज विवरणों के बीच विरोधाभास यह संकेत देता है कि प्रशासन और पुलिस पर राजनीतिक एवं संगठनात्मक दबाव है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि पीड़ित मुस्लिम समुदाय से होते तो अब तक न जाने कई गिरफ्तारियां हो चुकी होतीं और तमाम अल्पसंख्यकों के घरों पर बुल्डोजर चल गया होता। पुलिस की ओर से इस मामले में एकतरफा कार्रवाई की गई है।

बुलडोज़र का सच

वारदात के अगले दिन राजातालाब के रानी बाजार क्षेत्र में अल्पसंख्यक समुदाय के घरों के पास एक बुलडोज़र खड़ा दिखा। खबरिया चैनल सक्रिय हुए। मीडिया की रिपोर्टों में कहा गया कि पुलिस प्रशासन ने कांवड़ियों के साथ मारपीट करने वाले मुसलमानों के घर ढहाने के लिए बुलडोज़र भेजा है।

इस खबर के प्रसारित होते ही एपीसीआर (Association for Protection of Civil Rights) की वाराणसी इकाई ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पूरी संवेदनशीलता और कानूनी सतर्कता के साथ हस्तक्षेप किया। टीम ने सुनिश्चित किया कि पीड़ित पक्ष के साथ दोहरा अन्याय न हो और विधिक प्रक्रिया का पालन किया जाए।

एपीसीआर की ओर से वाराणसी के अधिवक्ता गोपाल कृष्ण और प्रेम प्रकाश यादव ने ज़िला न्यायालय में याचिका दायर की और प्रशासन की बुलडोज़र कार्रवाई को न्यायिक स्तर पर चुनौती दी। बाद में पुलिस प्रशासन की ओर से सफाई दी गई कि पुलिस की ऐसी कोई मंशा नहीं थी। मौके पर मौजूद एसीपी अजय कुमार ने जनचौक से कहा, बुलडोज़र पुलिस ने नहीं बुलवाया था। बुल्डोजर चालक पास में ही भोजन कर रहा था।”

बीजेपी के सक्रिय कार्यकर्ता मनीष जायसवाल की रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर पूर्व प्रधान रामजी जायसवाल और अनिल जायसवाल से मुलाक़ात हुई तो उन्होंने पुलिस के दावे के विपरीत तमाम कथाएं सुनाईं। उन्होंने दावा किया कि किसी भी कांवड़िए ने गलत काम नहीं किया। रामजी और अनिल के अनुसार, एक कांवड़िए ने गुटखा खाया थाजिसका छींटा दुकानदार पर चला गयाजिससे विवाद और मारपीट शुरू हुई। बुलडोज़र पुलिस प्रशासन ने ही मंगवाया था और उसमें 31 लीटर डीज़ल पास के पेट्रोल पंप से भरवाया गया था।” जनचौक इन दावों की पुष्टि नहीं करता, लेकिन पुलिसिया कहानी में विरोधाभास साफ़ दिखाई देता है।

31 जुलाई 2025 को गोमती ज़ोन के पुलिस उपायुक्त आकाश पटेल के सोशल मीडिया सेल द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि कांवड़ यात्रा के दौरान एक तीर्थ यात्री और स्थानीय दुकानदार के बीच वाद-विवाद हुआ था। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रित किया। उपलब्ध वीडियो साक्ष्यों के आधार पर कांवड़ यात्री की तहरीर पर मुकदमा दर्ज किया गया।

कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा इस घटना को तोड़-मरोड़ कर भ्रामक सूचनाएं फैलाई जा रही हैं, जिससे जनता में भ्रम और तनाव फैलाने की कोशिश हो रही है। चिन्हित सोशल मीडिया हैंडल्स के विरुद्ध थाना राजातालाब पर संबंधित धाराओं के अंतर्गत अभियोग पंजीकृत कर सख्त विधिक कार्रवाई की गई है।

पूरे घटनाक्रम को एक सामान्य बाज़ार क्षेत्र की घटना बताया गया है। प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि न तो कहीं आगजनी हुई, न तोड़फोड़, न घेराव और न ही जबरन घर में घुसने की कोई बात है। बुलडोज़र की कार्रवाई की खबर भी पूर्णतः असत्य है। पुलिस उपायुक्त आकाश पटेल के अनुसार, पुलिस द्वारा सभी पहलुओं की गहनता से जांच की जा रही है। आमजन से अपील है कि किसी भी अफवाह या भ्रामक जानकारी पर विश्वास न करें। सत्य और प्रमाणित जानकारी केवल आधिकारिक स्रोतों से प्राप्त करें। अफवाह फैलाने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाएगी।”

फैक्ट फाइंडिंग: आईने के पीछे

अधिवक्ता गोपाल कृष्ण की पहल पर एपीसीआर की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम 30 जुलाई 2025 को राजातालाब पहुंची और उस इलाके का दौरा किया जो हाल ही में हुई सांप्रदायिक हिंसा की घटना के कारण चर्चा में है। इस टीम में सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, अधिवक्ता और स्थानीय बुद्धिजीवी शामिल थे। टीम ने मौके पर जाकर न केवल घटनास्थल का जायज़ा लिया, बल्कि पीड़ित परिवारों से बातचीत की, चश्मदीदों से मुलाकात की और प्रशासनिक अधिकारियों से भी इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल किए।

एपीसीआर (Association for Protection of Civil Rights) की पड़ताल के मुताबिक, कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़ियों का एक समूह निर्धारित मार्ग से हटकर एक नई दिशा में निकलता हैजो राजातालाब क्षेत्र के मुस्लिम बहुल मोहल्लों से होकर गुजरती है। यह मार्ग पूर्व निर्धारित नहीं था और स्थानीय प्रशासन को इसकी पूर्व जानकारी नहीं थी। लेकिन सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यह बदलाव किसके निर्देश पर हुआइसका उत्तर अब तक सामने नहीं आया है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कुछ असामाजिक तत्वों ने माहौल को जानबूझकर बिगाड़ने की योजना रची थी।”

कांवड़ यात्रा के दौरान मुस्लिम समुदाय के कुछ घरों पर पथराव और तोड़फोड़ की गई तथा धार्मिक झंडों को जला दिया गया (जिसके वीडियो एपीसीआर के पास मौजूद हैं)। सबसे पीड़ादायक दृश्य यह था कि जिन घरों की दीवारों पर इस्लामी प्रतीक चिह्न बने थेउन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया। महिलाएं और बच्चे घरों में सहमे बैठे थे। एक बुज़ुर्ग महिला ने बताया, ‘हमने सोचा था कि कांवड़ यात्रा आस्था का प्रतीक होती हैलेकिन उस दिन हमने डर का चेहरा देखा।‘”

एपीसीआर की रिपोर्ट में कहा गया है, घटना के केंद्र में आबिद शेख नामक एक युवक का नाम प्रमुखता से सामने आता है। पुलिस ने उसे मुख्य आरोपी बतायाजबकि स्थानीय लोगों का कहना है कि घटना के समय आबिद मौके पर मौजूद नहीं था। उसकी गिरफ्तारी ने इलाके में भय और असुरक्षा की भावना को और गहरा कर दिया। आबिद के परिजनों ने फैक्ट फाइंडिंग टीम से कहा, “आबिद होनहार लड़का है। सच बोलता हैन्याय के लिए संघर्ष करता है। उसे इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे वह कोई आतंकवादी हो। जबकि घटना के समय वह घर पर मौजूद था। आखिर हमारे बेटे का क्या कसूर है?”

रिपोर्ट के अनुसार, सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस पूरी घटना में पुलिस की कार्रवाई एकतरफा नज़र आई। उपद्रवियों की पहचान होने के बावजूद उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। उल्टेजिनके घरों पर हमला हुआउन्हीं के लोगों को गिरफ्तार किया गया। घटना के बाद जो बुलडोज़र पहुंचावह काफी देर तक वहीं खड़ा रहाजबकि एपीसीआर के अधिवक्ता स्थानीय अदालत को इसकी सूचना दे चुके थे। सवाल यह है कि प्रशासन ने इतनी जल्दबाज़ी में यह निष्कर्ष कैसे निकाल लिया कि आरोपी दोषी हैक्या अब न्याय की कसौटी बुलडोज़र की धार पर तय होगी?”

एपीसीआर ने कई सवाल भी उठाए हैं। मसलनघटना के दौरान एक किशोरी का पीछा किए जाने का वीडियो सामने आया था। सीसीटीवी फुटेज में एक व्यक्ति उसे दौड़ाता नज़र आ रहा हैलेकिन अब तक उस व्यक्ति की पहचान नहीं हुई है और पुलिस इस पर चुप्पी साधे हुए है। किशोरी के बयान को झूठा बताकर फाइल बंद कर दी गईलेकिन क्या सच को इस तरह दफन किया जा सकता है?”

घटना की सच्चाई को उजागर करने वाली मीडिया रिपोर्ट्स पर भी पुलिस द्वारा दबाव बनाए जाने के आरोप सामने आए हैं। स्थानीय पत्रकार राजकुमार गुप्ता ने एपीसीआर को बताया, हमने केवल सच लिखालेकिन हमें धमकियां मिलने लगीं। पुलिस ने उन पत्रकारों को निशाना बनाना शुरू कर दिया जो सत्तापक्ष की नीति और नीयत पर सवाल उठा रहे थे। मेरी मांग है कि इस पूरे मामले में दोनों पक्षों का नार्को टेस्ट होताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। पुलिस अपनी असफलता को छिपाने के लिए मीडिया की आवाज़ को कुचल नहीं सकती। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। सच के साथ खड़े रहना लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।”

पत्रकार राजकुमार, जो बेनीपुर बाज़ार में रहते हैं। वो कहते हैं, “अगर घटना के नेपथ्य में झांकें तो सांप्रदायिकता का टाइमबम पहले से ही सुलग रहा था। अखिलेश सरकार के कार्यकाल में जब मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने ग्राम सभा की ज़मीन से ताज़िया निकालना शुरू किया, तो प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ लोगों ने चुपके से वहां हनुमान जी की मूर्ति स्थापित कर दी। इसके बाद अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से उसी स्थान पर धार्मिक झंडा गाड़ दिया गया। यह ज़मीन ग्राम सभा की है, लेकिन उस पर कुछ स्थानीय दबंग और ज़मीन माफिया की नज़रें हैं। वे पूरे इलाके को सांप्रदायिक तनाव की आग में झोंककर अरबों की सार्वजनिक ज़मीन हड़पना चाहते हैं। यह स्थल मुस्लिम आबादी के ठीक सामने स्थित है, और साजिश के तहत विवाद की ज़मीन बना दी गई है।”

अधिवक्ता गोपाल कृष्ण ने एपीसीआर की फैक्ट फाइंडिंग के आधार पर सरकार और प्रशासन से इस मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच की मांग की है। उन्होंने कहा है, “पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच होनी चाहिए। बुलडोज़र कार्रवाई के पीछे की मंशा स्पष्ट की जाए। आबिद शेख जैसे निर्दोष एक्टिविस्ट को निशाना बनाने वालों पर तत्काल कार्रवाई हो। मीडिया पर बने दबाव और धमकियों की जांच की जाए। पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा मिले और सुरक्षा प्रदान की जाए। जब तक सच सामने नहीं आएगा, न्याय नहीं मिलेगा। जब तक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक समाज में स्थायी शांति की उम्मीद भी अधूरी ही रहेगी।”

समुदायों के बीच बढ़ता अविश्वास

बनारस के एक्टिविस्ट और अधिवक्ता प्रेम प्रकाश यादव कहते हैं, राजातालाब कस्बे में भले ही अब शांति बनी होलेकिन दोनों समुदायों के दिलों में जो भयघाव और अविश्वास उत्पन्न हुआ हैवह प्रशासन की असंवेदनशीलता और पक्षपातपूर्ण रवैये का परिणाम है। विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के बीच यह भावना गहरी हो गई है कि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। पुलिस की लगातार दबिशघर-घर तलाशी और गिरफ्तारी की कोशिशें इस डर को और बढ़ा रही हैं।”

यह घटना केवल एक सांप्रदायिक झड़प नहीं थीबल्कि यह सुनियोजित रूप से माहौल बिगाड़ने और एक समुदाय को दबाने की कोशिश थी। प्रशासन की भूमिका निष्पक्ष नहीं रही। पुलिस ने अपनी जवाबदेही निभाने के बजाय मीडिया और सच बोलने वालों को दबाने का प्रयास किया। यह लोकतंत्र के लिए अत्यंत चिंताजनक संकेत हैं।”

अधिवक्ता प्रेम प्रकाश यह भी कहते हैं, “जहां एक ओर धार्मिक भावना के नाम पर हिंसा और धमकी दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर पुलिस निष्पक्ष जांच के बजाय मामले को दबाने में जुटी है। एक डरी हुई बेटी, टूटा हुआ परिवार और धर्म की आड़ में फैली हिंसा इस बात की गवाही है कि समाज में नफ़रत की आग कितनी गहरी हो गई है। यह मामला केवल एक एफआईआर या पुलिस जांच का नहीं, बल्कि यह उस आईने की तरह है जिसमें यह सवाल उभरता है कि जब न्याय की उम्मीद ही खत्म हो जाए, तब पीड़ित आखिर जाएं तो कहां?”

(विशेष टिप्पणी: यह ग्राउंड रिपोर्ट उपलब्ध वीडियो, सीसीटीवी  फुटेज, तथ्यों और दर्ज प्राथमिकी के आधार पर तैयार की गई है। इसमें पुलिस जांच की निष्पक्षता पर उठे सवालों को भी समाहित किया गया है। यदि किसी भी पक्ष की ओर से जरूरी साक्ष्य या आधिकारिक बयान प्राप्त होता है, तो उसे भी इस रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा।)

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं।)

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