उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 3 दिसंबर 2018 को गोकशी की अफवाह के बाद भड़की हिंसा में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी गई थी। अब कोर्ट ने छह साल, सात माह और 27 दिन बाद इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। बुलंदशहर के स्याना हिंसा मामले में शुक्रवार को कोर्ट ने 38 अभियुक्तों को दोषी करार दिया। पांच अभियुक्तों को हत्या के लिए उम्रकैद और 33 अभियुक्तों को जानलेवा हमले समेत 14 धाराओं में दोषी ठहराते हुए सात-सात साल की सजा सुनाई गई।
स्याना के चिंगरावठी चौकी क्षेत्र के महाव गांव के जंगल में 3 दिसंबर 2018 की सुबह गोवंश के अवशेष मिले थे। इसके विरोध में बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद समेत अन्य संगठनों के पदाधिकारी और कार्यकर्ता ग्रामीणों के साथ गोवंश के अवशेष को ट्रैक्टर-ट्रॉली में लादकर चिंगरावठी चौकी पहुंचे। वहां उन्होंने जमकर हंगामा किया।
दोपहर तक मामला इतना बढ़ गया कि उग्र प्रदर्शनकारियों ने चिंगरावठी चौकी और वहां खड़े माल बरामदगी के वाहनों में आग लगा दी। उग्र भीड़ को शांत करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। इस बलवे में तत्कालीन स्याना कोतवाली प्रभारी सुबोध कुमार सिंह और चिंगरावठी निवासी युवक सुमित कुमार की गोली लगने से मौत हो गई। सभी पर राजद्रोह की धाराएं लगाई गई थीं, लेकिन यह आरोप सिद्ध नहीं हुआ।
पुलिस ने 4 दिसंबर 2018 को कई नामजद और अज्ञात आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की थी। 44 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। एफआईआर में हिंसा में मारे गए युवक सुमित कुमार को भी आरोपी बनाया गया था। मामले की जांच के लिए बाद में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया गया। एसआईटी ने जांच पूरी कर आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट न्यायालय में दाखिल की।
प्रशांत नट, डेविड, राहुल, जॉनी और लोकेंद्र उर्फ मामा को हत्या का आरोपी बनाया गया था। योगेश राज समेत अन्य पर जानलेवा हमला, डकैती, आगजनी, बलवा, धमकी देने समेत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की 14 धाराएं लगाई गई थीं। सभी आरोपियों पर राजद्रोह की धारा भी लगाई गई थी। सुनवाई के दौरान पांच आरोपी-चंद्रपाल, अजय उर्फ दीवाला, कुलदीप, आशीष उर्फ छोटे और ओमेंद्र-की मृत्यु हो गई। एक आरोपी की पत्रावली पृथक कर बाल न्यायालय भेज दी गई, जो अभी विचाराधीन है।
शासन द्वारा नियुक्त विशेष काउंसिल अधिवक्ता ने बताया कि 3 दिसंबर 2018 को स्याना की चिंगरावठी चौकी पर गोवंश कटान के बाद हुए बलवे में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह और चिंगरावठी निवासी सुमित कुमार की मौत हो गई थी। करीब डेढ़ साल से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लगातार सुनवाई चल रही थी। बुधवार को न्यायालय ने सभी 38 अभियुक्तों को दोषी करार दिया और उन्हें हिरासत में लेकर जेल भेज दिया। एक अन्य बाल अपचारी की पत्रावली बाल न्यायालय में विचाराधीन है।
इससे पहले, बुलंदशहर के स्याना में 2018 की हिंसा में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या के मामले में कोर्ट ने 38 आरोपियों को दोषी ठहराया था। सजा का ऐलान 1 अगस्त 2025 को हुआ। सुबोध की हत्या ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में सनसनी फैला दी थी, खासकर इसलिए क्योंकि वे दादरी के चर्चित अखलाक हत्याकांड की जांच कर रहे थे।
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के स्याना थाना क्षेत्र में 3 दिसंबर 2018 को हुई हिंसा मामले में सात साल बाद अपर सत्र न्यायालय-12 के न्यायमूर्ति गोपाल जी ने फैसला सुनाया। इस हिंसा में स्याना कोतवाली के तत्कालीन प्रभारी इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह और स्थानीय युवक सुमित की गोली लगने से मौत हो गई थी।
3 दिसंबर 2018 को स्याना के महाव गांव के जंगल में गोवंश के अवशेष मिलने की खबर फैलने के बाद तनाव बढ़ गया था। बजरंग दल के तत्कालीन जिला संयोजक योगेश राज के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों की भीड़ ने चिंगरावठी पुलिस चौकी पर हमला बोल दिया। भीड़ ने पुलिस चौकी में आगजनी की, वाहनों को क्षतिग्रस्त किया और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया। इसी दौरान इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह को गोली मारकर हत्या कर दी गई। हिंसा में स्थानीय युवक सुमित की भी गोलीबारी में मौत हो गई।
पुलिस ने इस मामले में 27 नामजद और 50-60 अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या, दंगा, आगजनी और राजद्रोह जैसी गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज की थी। जांच के बाद पुलिस ने 44 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, जिनमें से पांच की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई और एक नाबालिग था, जिसकी सुनवाई किशोर न्याय बोर्ड में हुई। कोर्ट ने प्रशांत नट, डेविड, जॉनी, राहुल और लोकेंद्र उर्फ मामा को इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या का दोषी ठहराया, जबकि अन्य 33 आरोपियों को बलवा, हत्या का प्रयास, आगजनी और अन्य गंभीर धाराओं में दोषी पाया गया।
इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह अपनी हत्या से पहले 2015 में दादरी के बिसाहड़ा गांव में हुए अखलाक हत्याकांड की जांच कर रहे थे। 28 सितंबर 2015 को अखलाक को गोमांस रखने के संदेह में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था। सुबोध ने इस मामले में मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी की थी, लेकिन 9 नवंबर 2015 को उनकी जांच पूरी होने से पहले उनका तबादला कर दिया गया। एक अन्य अधिकारी ने बाद में चार्जशीट दाखिल की।
सुबोध के भाई अतुल कुमार ने बीबीसी को बताया था कि दादरी हत्याकांड की जांच और स्याना हिंसा के बीच संबंध हो सकता है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। सुबोध की पत्नी रजनी ने 2018 में पत्रकारों से कहा था, “मेरे पति को अक्सर जान से मारने की धमकियां मिलती थीं। वे अखलाक केस की जांच कर रहे थे, इसलिए उन पर हमला हुआ। मेरे पति पर हमला एक सोची-समझी साजिश थी।”
इंस्पेक्टर सुबोध की हत्या ऐसे समय में हुई थी, जब दादरी मामले में एक बार फिर जांच शुरू होने वाली थी और स्थानीय अदालत में इसके 18 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चल रही थी।
इस मामले में मुख्य आरोपी योगेश राज वर्तमान में जिला पंचायत सदस्य है। घटना के समय वह बजरंग दल का जिला संयोजक था। आरोप है कि बीजेपी ने जेल में रहते हुए उसे चुनाव लड़वाया, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। कुछ मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्टों के अनुसार, बीजेपी ने योगेश राज को स्थानीय चुनाव में समर्थन दिया था, लेकिन इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी। कई बार बीजेपी नेता मुख्य आरोपी के साथ देखे गए।
योगेश राज को हिंसा भड़काने का मुख्य आरोपी माना गया और उसे कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली थी। इसके अलावा, दोषियों में बीजेपी के बीबीनगर मंडल अध्यक्ष सचिन अहलावत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्याना नगर कार्यवाह पवन राजपूत और ग्राम प्रधान सतेंद्र भी शामिल हैं। इनके खिलाफ बलवा और हत्या के प्रयास जैसे आरोप सिद्ध हुए हैं।
इस मामले ने शुरुआत से ही सियासी रंग ले लिया था। विपक्षी दलों ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर हिंदूवादी संगठनों को संरक्षण देने का आरोप लगाया था। वहीं, मुख्यमंत्री योगी ने इसे “राजनीतिक साजिश” करार देते हुए कहा था कि उनकी सरकार ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। घटना के बाद विशेष जांच दल का गठन किया गया, जिसने गोकशी और हिंसा के अलग-अलग मामलों में चार्जशीट दाखिल की। गोकशी के आरोप में 11 लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई हुई।
सजा पाने वालों में प्रमुख नाम, बीजेपी और आरएसएस से संबंध:
- योगेश राज: घटना के समय बजरंग दल का जिला संयोजक, अब जिला पंचायत सदस्य।
- सचिन अहलावत: बीजेपी बीबीनगर मंडल अध्यक्ष।
- पवन राजपूत: आरएसएस के स्याना नगर कार्यवाह।
- शिखर अग्रवाल: निषाद पार्टी का स्थानीय नेता।
इस केस को लेकर शुरुआत से ही राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक शिथिलता की बातें सामने आईं। मुख्य आरोपी योगेश राज की गिरफ्तारी में भी देरी हुई थी। पुलिस ने पहले इसे “भीड़ का गुस्सा” बताया, लेकिन बाद में कोर्ट में पेश सबूतों और गवाहों ने पूरे मामले को पूर्व नियोजित हिंसा की शक्ल दी।
कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, “भीड़ द्वारा की गई हिंसा केवल स्वतःस्फूर्त नहीं थी। इसके पीछे योजनाबद्ध उकसावे और लापरवाही दोनों जिम्मेदार हैं।”
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं)