झारखंड के पलामू में “गांव छोड़ब नहीं, जंगल छोड़ब नहीं,” के तर्ज पर ग्रामीणों ने किया वन विभाग का जोरदार विरोध

गांव छोड़ब नहीं, जंगल छोड़ब नहीं।

माय माटी छोड़ब नहीं, लड़ाय छोड़ब नहीं।

बांध बनाए, गांव डुबोए, कारखाना बनाए।

जंगल काटे, खदान खोदे, सेंक्चुरी बनाए।

जल जंगल जमीन छोड़ी हमिन कहां कहां जाए,

विकास के भगवान बता हम कैसे जान बचाए॥

जमुना सुखी, नर्मदा सुखी, सुखी सुवर्णरेखा।

गंगा बनी गंदी नाली, कृष्णा काली रेखा।

तुम पियोगे पेप्सी कोला, बिस्लेरी का पानी।

हम कैसे अपना प्यास बुझाएं, पीकर कचरा पानी?

पुरखे थे क्या मूरख जो वे जंगल को बचाए।

धरती रखी हरी भरी नदी मधु बहाए।

तेरी हवस में जल गई धरती, लुट गई हरियाली।

मछली मर गई, पंछी उड़ गए जाने किस दिशाएं।

मंत्री बने कंपनी के दलाल हम से जमीन छीनी।

उनको बचाने लेकर आए साथ में पल्टनी।

हो….अफसर बने है राजा, ठेकेदार बने धनी,

गांव हमारी बन गई है उनकी कॉलोनी।

बिरसा पुकारे एकजुट होवो छोड़ो ये खामोशी।

मछुवारे आवो, दलित आवो, आवो आदिवासी।

हो खेत खलिहान से जागो, नगाड़ा बजाओ,

लड़ाई छोड़ी चारा नहीं सुनो देशवासी।

झारखंड के लोक गायक मधु मंसूरी के गाए उपर्युक्त गीत के तर्ज पर पलामू जिला अंतर्गत मनिका अंचल के पलामू ब्याघ्र परियोजना क्षेत्र नावरनागू के रैयतों को मनिका अंचल के पटना वन भूमि में स्वैच्छिक पुनर्वास परियोजना का पटना ग्राम सभा द्वारा तीव्र विरोध किया जा रहा है और ग्रामीण एक सुर में साफ कह रहे हैं कि – “गांव छोड़ब नहीं, जंगल छोड़ब नहीं।

माय माटी छोड़ब नहीं, लड़ाय छोड़ब नहीं।”…….

खबर के मुताबिक राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के प्रस्तावित स्वैच्छिक पुनर्वास परियोजना का क्रियान्वयन पलामू ब्याघ्र परियोजना के उप निदेशक द्वारा चोरी छिपे 2020 से तैयार किया जाता रहा है, जिसको लेकर पटना ग्रामवासियों में काफी आक्रोश है। 

इसी को लेकर ग्राम प्रधान लिलेश्वर सिंह की अध्यक्षता में पिछले दिनों जिले के पाटन ब्लॉक के उताकी पंचायत अंतर्गत बघवर गांव में धुमकुड़िया भवन में ग्रामीणों की एक बैठक संपन्न हुई। जिसमें लोकगायक मधु मंसूरी के गाए उपर्युक्त गीत को दोहराते हुए कहा गया कि हम अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे और किसी भी हाल में हम विभाग की मनमानी अफसरशाही नहीं चलने देंगे।

बैठक में सामाजिक कार्यकर्ता व नरेगा वॉच के राज्य समन्वयक जेम्स हेरेंज ने उप निदेशक द्वारा अब तक तैयार किए गए कागजातों को एक-एक कर पढ़कर समझाते हुए बताया कि इसी साल 11 जनवरी को नावरनागू गांव के 23 रैयतों ने पटना वन भूमि क्षेत्र का दौरा कर पुनर्वास हेतु जमीन पसन्द किया है। जिसमें सरकारी रिकॉर्ड बताता है कि वहां का ग्राम प्रधान भी शामिल था। प्रस्तावित पुनर्वास स्थल में प्रथम चरण में नावरनागू गांव के 19 परिवारों को पुनर्वासित करने की योजना है। जिसमें पटना गांव की कुल 97.27 एकड़ वनभूमि का अपयोजन की जाएगी।

जेम्स ने बताया कि वहीं दूसरे चरण में पटना एवं बरवैया कला मिलाकर 98.21 एकड़ वनभूमि का अपयोजन होगा। ये सारा खेल पलामू से किया जा रहा है, इस निर्णय प्रक्रिया में लातेहार वन विभाग की कोई भूमिका नजर नहीं आ रही है।

इतना सुनते कि उनके गांव में दूसरी जगह से लाकर लोगों को बसाया जा रहा है, ग्रामीणों ने वन विभाग के इस कुकृत्य पर नाराजगी जाहिर करना शुरू कर दिया। और वे “वन विभाग मुर्दाबाद” के नारे लगाने लगे। ग्रामीणों ने कहा कि हम किसी भी कीमत पर वन विभाग के इस मंसूबे को पूरा नहीं होने देंगे। इसके लिए ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि इसके खिलाफ जल्द ही आन्दोलन तेज करने की तैयारी शुरू की जाएगी। 

वहीं बैठक में तय किया गया कि आन्दोलन के प्रथम दौर में ग्राम सभा से अपने वन क्षेत्र में किसी को नहीं बसने देने का संकल्प पारित कर नावरनागू गांव के ग्राम प्रधान, जिले के उपायुक्त व वन प्रमण्डल अधिकारी लातेहार सहित उप निदेशक, पलामू ब्याघ्र परियोजना मेदिनीनगर को अपने वनभूमि का सामुदायिक दावा समर्पित किया जाएगा और दूसरे चरण में प्रस्तावित वन भूमि को अमीन से मापी कराकर वन सम्पदा का आकलन किया जायेगा। अंत में उप निदेशक के कार्यालय के समक्ष जोरदार आन्दोलन चलाया जाएगा।

विदित हो कि ग्राम सभा पटना ने अपने सम्पूर्ण वनभूमि का सामुदायिक दावा 2020 में ही अनुमण्डल को समर्पित कर दिया है। जिसकी समीक्षा गत वर्ष 14 जून, 2024 को अनुमण्डल स्तरीय समिति द्वारा की गई है और कुछ त्रुटि निराकरण हेतु ग्राम वन अधिकार समिति को वापस की गई है। वनाधिकार कानून की धारा 4 (5) स्पष्ट कहता है कि जब तक समर्पित दावों पर प्राधिकृत समितियों का यथोचित निर्णय नहीं हो जाता है तब तक अधिभोगाधीन वन भूमि से कोई उनको बेदखल नहीं करेगा। 

पीटीआर नावरनागू एवं पटना दोनों गांवों के मामले में इस कानून का घोर उल्लंघन कर रहा है। सिर्फ इतना ही नहीं इसी वर्ष मनिका के जेरुआ, लंका, कोपे में वन विभाग पौधारोपण के नाम पर ऐसे ही गैरक़ानूनी हस्तक्षेप कर रहा था, जहां से ग्रामीणों ने वन विभाग के कर्मियों को खदेड़ा। उन गांवों में आज तक वन विभाग ने आगे काम कराने का दुस्साहस नहीं कर सका।

बैठक में पटना ग्राम प्रधान लिलेश्वर सिंह सहित उच्च वाल के ग्राम प्रधान महावीर परहिया और वनाधिकार समिति के सभी पदाधिकारीगण, लक्ष्मण सिंह, मंजू देवी, रामेश्वर सिंह और आन्दोलन में सहयोग करने हेतु जेरुआ से जननेता भूखन सिंह, सधवाडीह की श्यामा सिंह, सोमवती देवी, जुगेश्वर सिंह, औरंगा बांध विरोधी संघर्ष समिति के जितेन्द्र सिंह, राजकुमार, सहित आस-पास के गांवों से करीब 200 महिला पुरुष शामिल थे जिसमें महिलाओं की संख्या अधिक थी।

(विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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