कहने को तो कुछ भी कहा जा सकता है लेकिन हकीकत यही है कि इस बार के बिहार चुनाव में सबसे ज्यादा किसी पार्टी की प्रतिष्ठा अगर चुनावी खेल में फंसी हुई है तो वह पार्टी है जदयू। वही जदयू जिसका नेतृत्व नीतीश कुमार करते आ रहे हैं। पिछले हर चुनाव में बाजी मारने वाले और सत्ता की शीर्ष कुर्सी पर बैठने वाले नीतीश कुमार भीतर ही भीतर कितने लाचार हो गए हैं उसका प्रमाण इसी बात से लग रहा है कि जहाँ एक तरफ वोट चोरी का नारा देते हुए राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव और माले प्रमुख दीपंकर भट्टाचार्य बिहार को मथ रहे हैं वहीं नीतीश कुमार मुसलमानों के साथ बैठक करते नजर आ रहे हैं।
नीतीश कुमार को इस बार बिहार की सियासी जमीन और हवा-पानी का जितना अनुमान हो गया है, शायद एनडीए के बाकी दलों को नहीं है। बीजेपी को तो लग रहा है कि सभी जातियों में उसका वोट बैंक है और चाहे सियासी हवा-पानी जितना भी उसके खिलाफ हो जाए सबसे ज्यादा सीटें तो वह जीत ही सकती है भले ही उसे विपक्ष में ही क्यों न बैठना पड़े। बीजेपी को यह भी पता है कि बिहार में उसकी जमीन दरक तो सकती है लेकिन ख़त्म नहीं हो सकती है। बाकी एनडीए दलों का चाहे जो हाल हो जाए, बीजेपी का खेल चलता रहेगा। जदयू कमजोर भी होता है या ख़त्म भी होता है तो वह दूसरे दलों को भी अपने पाले में ला सकता है। प्रशांत किशोर की पार्टी पर भी दांव लगा सकता है।
लेकिन जदयू के नेता और खासकर नीतीश कुमार की चिंता तो कुछ और ही है। नीतीश कुमार की पार्टी के बहुतेरे नेता भले ही बीजेपी के साथ जा सकते हैं और इसकी संभावना भी बनी हुई है लेकिन नीतीश कुमार को दो बातों की चिंता खाये जा रही है। नीतीश कुमार जानते हैं कि भले ही उनकी पार्टी बीजेपी के साथ मिलकर बिहार की सत्ता लम्बे समय से चली रही है लेकिन वे यह भी जानते हैं कि अगर उनकी पार्टी इस चुनाव में पैदल हो जाती है तो बीजेपी का खुला राज बिहार में हो जाएगा और फिर बिहार जैसा सेक्युलर राज्य भी बीजेपी के खेल से प्रभावित होगा और ऐसा होता है तो बिहार का एक बड़ा तबका मुस्लिम समाज के साथ बहुत कुछ हो सकता है। इसलिए नीतीश कुमार कतई नहीं चाहते कि बिहार में सत्ता की बागडोर बीजेपी के पास जाए और वह यह भी नहीं चाहते कि बिहार का मुसलमान कोई दबाव झेले।
यही वजह है कि पिछले दिनों जब नीतीश कुमार मुसलमानों के साथ बैठकी कर रहे थे तो वे काफी अलग अंदाज में थे और मन से दुखी भी। पटना स्थित सम्राट अशोक कन्वेंशन केंद्र के बापू सभागार में बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड की ओर से शताब्दी समारोह का आयोजन था जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शामिल हुए। अपने संबोधन में उन्होंने दावा किया कि वह मुस्लिम समुदाय के साथ खड़े हैं। सीएम ने कहा कि हमने शुरू से ही सभी तबकों के हित में काम किया है। वर्ष 2005 से जब राज्य की जनता ने नेतृत्व का अवसर दिया तो नई सरकार के गठन के बाद से मुस्लिम समुदाय के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की गईं। सीएम नीतीश ने दावा किया कि ”हमने मुसलमानों के लिए बहुत सा काम किया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि 2005 में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के बजट 2004-05 में मात्र 3 करोड़ 54 लाख रुपये था, जो अब बढ़कर 1080 करोड़ हो गया है। कब्रिस्तानों की घेराबंदी शुरू की गई। साल 2006 से मदरसों का निबंधन किया गया और उन्हें सरकारी मान्यता दी गई। मदरसों के शिक्षकों को सरकारी शिक्षकों के बराबर वेतन दिया गया। बच्चों की पढ़ाई से लेकर रोजगार और तलाकशुदा महिलाओं के लिए सहायता राशि देने का भी प्रावधान किया”।
बता दें कि जब नीतीश कुमार मुसलमानों के बीच बोल रहे थे, सुनने वाले सभी मुसलमान मौन ही थे। कोई कुछ नहीं कह रहा था। लेकिन उनकी बातों पर सब एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे। कुछ फुसफुसा रहे थे तो कुछ बगले झाँक रहे थे। जदयू के बाकी नेता सब समझ रहे थे। जदयू वाले यह मान कर चल रहे थे कि मुसलमानों की चुप्पी सिर्फ इसलिए है कि आखिर नीतीश कुमार बीजेपी के साथ क्यों खड़े हैं? ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार यह सब नहीं समझ रहे हैं। लेकिन यह सब उनकी मज़बूरी ही है जो बीजेपी के साथ भी हैं और और आज मुसलमानों के बीच अपनी बात कह रहे हैं। नीतीश कुमार को पता है कि एनडीए के पक्ष में अभी तक 12 फीसदी वोट मुसलमानों के पड़ते रहे हैं और इसमें अधिकतर वोट जदयू के पक्ष में ही जाते रहे हैं। लेकिन इस बार क्या होगा यह कोई नहीं बता सकता।
बिहार में मुसलमानों का वोट बैंक करीब 17 से 18 फीसदी है। इस वोट बैंक में जदयू को भी हिस्सा मिलता रहा है। लेकिन जिस तरह से इस बार राहुल गाँधी, तेजस्वी और दीपंकर बिहार को मथ रहे हैं और मुस्लिम बहुल इलाके में जिस तरह से मुसलमानों ने महागठबंधन के साथ एकता दिखाई है वह नीतीश कुमार को परेशान करने वाला है। और यही वजह है कि नीतीश कुमार बाकी जाति-बिरादरी के लोगों से मुलाकात करें या न करें लेकिन मुसलमान नेताओं के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं। वे जानते हैं कि अगर यह वोट बैंक उनके हाथ से निकल गया तो खेल ख़त्म हो जाएगा।
जदयू समाप्त हो जाएगी और उनकी राजनीति भी दफ़न हो जाएगी। वे यह भी जानते हैं कि इस बार के चुनाव में बिहार के मुसलमान ही किंग मेकर की भूमिका में खड़े हैं क्योंकि उनका दखल 80 से ज्यादा सीटों पर है और सीमांचल की अधिकतर सीटें उनकी मर्जी के बिना कोई जीत नहीं सकता। सीमांचल के पांच जिलों में मुस्लिम आबादी 40 से 60 फीसदी के बीच है और इस इलाके में जहाँ जदयू को बढ़त मिलती थी अब राजद और कांग्रेस की बढ़त देखी जा रही है और मुसलमानों का भरोसा कांग्रेस में बढ़ता जा रहा है।
यह भी बता दें कि पहले मुसलमानों का वोट राजद, कांग्रेस और जदयू में बंट जाता था लेकिन अब मुस्लिम बहुल इलाके में ओवैसी की पार्टी की भी मजबूत दखल हो गई है और ऐसे में जदयू के लिए स्पेस कमतर होता जा रहा है। मार्के की बात तो यह भी है कि जदयू के भीतर आज कोई भी ऐसा नेता नहीं बचा है जिसके ऊपर मुस्लिम समाज का एतबार हो सिवाय नीतीश कुमार के। लेकिन नीतीश कुमार को लेकर मुसलमानों में अब दूसरी कई नाराजगी भी बैठ गई है।
बिहार की 17.7 फीसदी मुस्लिम आबादी में 10 फीसदी अति पिछड़ा (पसमांदा), 3 फीसदी पिछड़ा और 4 फीसदी अशराफ (सवर्ण) मुस्लिम हैं। हाल के सालों में पसमांदा पर एनडीए की विशेष नजर है। वक्फ संशोधन कानून के बाद बीजेपी और जेडीयू को लगता है कि पसमांदा मुसलमानों का समर्थन मिल सकता है। बिहार सरकार की ओर से जातीय गणना में मुसलमान को तीन वर्गों में बांटा गया है। इनमें अगड़ी जाति, पिछड़ी जाति और अत्यंत पिछड़े शामिल हैं। इसमें पिछड़ी जाति के मुस्लिम सबसे ज्यादा हैं। 17 करोड़ 70 लाख मुस्लिम आबादी में 4% उच्च जाति है और शेष पिछड़ी और अत्यंत पिछड़ी जाति आती हैं। अगड़ी जातियों में शेख 3.8217%, पठान 0.7548% और सैय्यद 0.2279 फीसदी हैं।
सीमांचल में 2020 विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने 24 उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें 17 सीटों पर जीत मिली। लालू की पार्टी को 7 सीटों का नुकसान हुआ। इन 7 सीटों में से 5 ओवैसी के पास गईं। असल में एआईएमआईएम के साथ-साथ एनडीए ने भी खासकर सीमांचल और पसमांदा मुसलमानों के बीच पकड़ बनाने की कोशिश की, जिसकी वजह से कुछ सीटों पर वोट बंटा और लालू की पार्टी आरजेडी को नुकसान हुआ। हालांकि कुछ समय बाद ओवैसी के 5 में से 4 विधायक आरजेडी में शामिल हो गए।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुसलमानों की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह बीजेपी के साथ गठबंधन करना है। अल्पसंख्यक समुदाय बीजेपी के साथ सहज नहीं महसूस करता है। जब नीतीश 2015 में लालू के साथ थे, तब भरपूर समर्थन मिला था लेकिन 2019 और 2020 में दूर हो गए हैं। वहीं वक्फ संशोधन विधेयक पर जेडीयू के समर्थन के फैसले से भी नाराजगी है। इसके साथ ही बड़ी संख्या में मदरसा को ग्रांट नहीं मिलना भी नाराजगी का एक कारण है।
बिहार में 14 फीसदी से ज्यादा यादव और 17.7 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। दोनों को मिला दें तो यह 32 फीसदी हो जाता है, जो किसी भी गठबंधन की सरकार बना सकता है और समीकरण बिगाड़ सकता है राजद की पूरी राजनीति इस फैक्टर पर जुड़ी हुई है और माना जा रहा है कि इस बार इस समीकरण में और भी इजाफा हो सकता है।
2020 में दोनों गठबंधनों को 38 फीसदी वोट मिले, जिसमें माय (मुस्लिम+यादव) तेजस्वी को नंबर वन की पार्टी बनाई थी। तेजस्वी एक बार फिर 32 फीसदी वोट बैंक को मजबूत करने में जुटे हैं लेकिन ओवैसी की एंट्री और एनडीए की पसमांदा मुसलमान को साधने की रणनीति आरजेडी के लिए मुश्किल बन सकती है। ऐसे में बिहार के मुसलमान वोटर किस ओर जाएंगे, इसके लिए चुनावी नतीजों का इंतजार करना होगा। यह वोटर जिधर जाएगा उसकी जीत निश्चित मानी जा रही है।
(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)