अपराध का स्वरूप और अपराध की गंभीरता- ये दोनों ही ऐसे महत्वपूर्ण तत्व हैं जिनसे यह निर्धारित किया जाता है कि किसी व्यक्ति को जमानत पर स्वतंत्रता दी जा सकती है या नहीं। समय के साथ-साथ क़ानून निर्माताओं और न्यायपालिका के सामने नई चुनौतियां आती रही हैं। गम्भीर अपराधों में जहां माननीय न्यायालयों को अभियुक्त की स्वतंत्रता और समाज की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना पड़ता है, वहां क़ानून ने न्यायालय को अपार विवेकाधिकार प्रदान किया है।
अनेक निर्णयों में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया है कि इस विवेकाधिकार का प्रयोग सोच-समझकर और सभी आवश्यक कारकों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। परन्तु प्रश्न यह है कि “जमानत देने के लिए कारावास की पर्याप्त अवधि क्या मानी जाए”? यह आज भी एक महत्वपूर्ण विषय है। जब बड़ी संख्या में लोग बिना दोष सिद्धि के जेलों में बंद हैं, या केवल आरोपपत्र दाखिल हो चुका है, तब “पर्याप्त अवधि” का प्रश्न और भी अहम हो जाता है।
Union of India बनाम K.A. Najeeb (2021) के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया कि यदि कोई अभियुक्त लंबे समय से निरुद्ध है और मुकदमे के शीघ्र निपटारे की कोई संभावना नहीं है, तो न्यायालय पर यह दायित्व है कि वह सांविधिक प्रतिबंधों की परवाह किए बिना अभियुक्त को जमानत दे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि लम्बी कैद और मुकदमे की अनिश्चितता है, तो UAPA की धारा 43-D(5) के अंतर्गत लगाए गए प्रतिबंध संवैधानिक न्यायालय को जमानत देने से रोक नहीं सकते। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता का अधिकार और शीघ्र न्याय पाने का अधिकार निहित है, और सांविधिक प्रतिबंध संविधान के भाग-III के उल्लंघन पर न्यायालय की शक्ति को सीमित नहीं कर सकते।
सतही तौर पर, जो भी विधि का सामान्य ज्ञान रखता है, वह इस निर्णय को प्रगतिशील मानेगा- एक ऐसा निर्णय जिसने पुनः यह स्थापित किया कि संविधान सर्वोच्च है। विशेष दण्ड कानून, जो सामान्यतः “अपवाद” के रूप में बनाए जाते हैं, को हमेशा अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है, और इसी कारण इन कानूनों में जमानत की शर्तें साधारण दण्ड कानूनों से कहीं अधिक कठोर होती हैं। परन्तु यहाँ यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्या विशेष कानून, विशेषकर आतंक निरोधक कानून, भारत की संवैधानिक नैतिकता को निरस्त कर सकते हैं?
इसका उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक होना चाहिए। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्याएँ अक्सर “अपवाद” के पक्ष में दिखाई देती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि हम जिन अपराधों से सम्बंधित हैं, वे अत्यन्त गंभीर हैं, परन्तु निर्दोषपन की अनुमानित धारणा (presumption of innocence) को इस तरह सामान्य बना देना न्यायसंगत नहीं है।
UAPA से संबंधित अनेक मामलों में न्यायालय का ध्यान अपराध की गंभीरता पर रहा है, अभियुक्त की वास्तविक संलिप्तता पर नहीं। सामान्यतः जांच एजेंसियां निर्धारित समय सीमा में जांच पूरी नहीं करतीं और पूरक आरोपपत्र दाखिल कर प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से खींचती रहती हैं। परन्तु न्यायालय इस गंभीर पहलू की अनदेखी नहीं कर सकते कि बिना आरोप तय किए अथवा दोष सिद्ध किए किसी व्यक्ति को वर्षों तक जेल में रखना न्याय के विपरीत है।
Union of India बनाम सलीम ख़ान के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अभियुक्त को इस आधार पर जमानत दी कि केवल किसी संगठन की बैठक में भाग लेना, जब वह संगठन UAPA के अंतर्गत प्रतिबंधित न हो, अपराध नहीं माना जा सकता। उल्लेखनीय है कि सलीम तीन वर्षों से अधिक समय तक केवल इसलिए कैद रहा क्योंकि राज्य ने यह अनुमान लगाया था कि ‘अल-हिन्द’ संगठन आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त है। अर्थात राज्य ने अपनी ओर से एक अनुमान लगाया और उसके आधार पर व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली। यदि न्यायालय इस प्रवृत्ति पर कठोर रुख नहीं अपनाएंगे तो क्या यह संदेश नहीं जाएगा कि न्यायालय राज्य के “अनुमान के अधिकार” को ही वैधता प्रदान कर रहे हैं?
जमानत संबंधी न्यायशास्त्र (bail jurisprudence) का स्वरूप निरंतर बदलता रहा है। परन्तु इस परिवर्तन की दिशा को समझना अत्यंत आवश्यक है। संविधान की आकांक्षाओं और वास्तविकता के बीच का अंतर इतिहास में साफ देखा जा सकता है। एक ओर Zahoor Ahmad Shah Watali (2019) और दूसरी ओर K.A. Najeeb (2021)- दोनों को एक साथ न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। 1960-70 के दशक में सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत की उदार व्याख्याएँ दीं। परन्तु उसके बाद विभिन्न सरकारों ने कई विशेष कानून बनाए जिनमें कठोर जमानत शर्तें थीं और अभियुक्त के लिए जमानत लगभग असंभव हो गई। NDPS अधिनियम इसका उदाहरण है, जहाँ सांविधिक भाषा ही अभियुक्त की जमानत को अस्वीकार करने जैसी है और केवल कुछ तकनीकी आधारों पर ही अभियुक्त जमानत पा सकता है।
अतः सर्वोच्च न्यायालय को इस “अपर्याप्त समय सिंड्रोम” (Insufficient Time Syndrome) पर गंभीरता से हस्तक्षेप करना चाहिए, क्योंकि “पर्याप्त समय” अपने-आप में एक अमूर्त अवधारणा है।
(निशांत आनंद पेशे से एडवोकेट हैं और लिखने का भी काम करते हैं।)