जस्टिस विपुल पंचोली का कॉलेजियम द्वारा 4:1 के बहुमत के साथ सहमति देने का मामला अब जोर पकड़ता जा रहा है। इसमें जो सबसे अहम बात है वह यह है कि पांच जजों द्वारा जब 2 न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में स्वीकार करने की अनुमति दी उस समय जस्टिस नागरत्ना द्वारा अपनी असहमति दर्ज की गई। यह मामला बड़ा तब बन गया जब कैंपेन फॉर ज्यूडिशिय
ल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स द्वारा नागरत्ना के असहमति के नोट्स को पब्लिक में लाने हेतु एक स्टेटमेंट जारी किया गया। इसके बाद बड़ा सवाल जो हम सबके सामने आ रहा है वह यह है कि न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता को कैसे समझा जाए। हालांकि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई निर्णयों में ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी के होने पर जोर दिया है, परंतु कॉलेजियम का मामला अभी भी एक बड़ा मुद्दा है।
हाल ही में दिल्ली और पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मुरलीधर ने अपनी किताब इनकंप्लीट जस्टिस को पब्लिक किया है। इस किताब के लॉन्च के दौरान भी यह मुद्दा सामने आया जब सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कार्यक्रम में आए मुख्य अतिथि, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अभय एस ओका से इस मामले पर सवाल करते हुए पूछा कि ” आज के समय में देश की एक मात्र महिला जज जो सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही हैं उन्होंने जस्टिस पंचोली की नियुक्ति पर न केवल बड़े सवाल खड़े किए हैं बल्कि उनकी नियुक्ति का विरोध भी किया है। क्या तरीका है जजों की नियुक्ति का? मेरा मानना है यह एक वैचारिक विषय ज्यादा है।”
जिस पर जवाब देते हुए पूर्व न्यायाधीश अभय ओका ने असहमति को आम जनता के बीच में लाने की हिमायत करते हुए कहा कि ज़ितनी पारदर्शिता जरूरी है उतना ही निजता के भी सवाल को महत्व देना है। इसके आगे बढ़ते हुए जस्टिस ओका ने बताया कि निजता का बड़ा सवाल इसलिए भी है क्योंकि उन्हीं जजों को दुबारा अपने पुराने कोर्ट में जाकर न्याय व्यवस्था देखनी है इसलिए जो चुन लिए गए कॉलेजियम द्वारा वो तो ठीक है पर जो नहीं चुने गए उसके कारण को बता कर हम उस कोर्ट की व्यवस्था को भंग कर सकते हैं। इसलिए एक संतुलन की जरूरत है। परंतु असहमति को पब्लिक में लाने को लेकर ओका ने सहमति दर्ज की।
इंदिरा जयसिंह ने एक और बड़ा मुद्दे पर ध्यान आकृष्ट कराया जब उन्होंने बताया कि 2021 से लेकर अब तक लगभग 28 जजों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई है जिसमें जस्टिस नागरत्ना को मिला कर केवल 3 महिला जजों को चुना गया है। हालांकि यह मुद्दा न्यायाधीश नागरत्ना ने भी अपनी असहमति में उठाया था कि देश के सर्वोच्च न्यायालय में महिला जजों का प्रतिनिधित्व काफी कम है जिसे बढ़ाने के बजाए लगातार एक ही राज्य से तीसरे जज की नियुक्ति की जा रही है।
योग्य जजों के नाम बताते हुए जयसिंह ने इस बात का जिक्र किया कि जस्टिस सुनीता अग्रवाल (गुजरात हाई कोर्ट), जस्टिस रेवती मोहिते (बॉम्बे हाई कोर्ट) और जस्टिस लीसा गिल (पंजाब व हरियाणा हाइ कोर्ट) के ऊपर ध्यान नहीं दिया गया। अगर तत्कालीन आंकड़ों की बात करें तो जहां सुप्रीम कोर्ट में 34 जजों में केवल एक महिला जज हैं वहीं सभी हाई कोर्ट के आंकड़े भी कुछ ज्यादा अच्छे नहीं जान पड़ रहे। फरवरी, 2025 के आंकड़ों के अनुसार कुल 755 हाईकोर्ट जजों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल 14% का है। यह बात सही है कि उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय का जज होना बड़ी जिम्मेदारी की बात है और योग्य लोगों को चुने जाने की जरूरत है परंतु जब योग्य महिला जजों की उपस्थिति के बावजूद वरीयता नहीं दी जा रही है तो ऐसे में इंदिरा जयसिंह का सवाल फिर से अहम हो जाता है कि ये नियुक्तियां वैचारिक रूप से ज्यादा प्रभावित हैं, बनिस्पत योग्यता के।
बहरहाल, कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स द्वारा उठाए गए एक महत्वपूर्ण सवाल पर दोबारा वापस आते हैं जहां छिड़े जस्टिस संजीव खन्ना द्वारा उठाए गए कदम को कैंपेन ने फोकम में लाने का प्रयास किया जब जस्टिस खन्ना ने पारदर्शिता को वरीयता देते हुए कारणों को पब्लिक डोमेन में लाने को लागू किया था। “सीजेएआर (CJAR) ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा सर्वोच्च न्यायालय कोलेजियम द्वारा स्वीकृत न्यायिक नियुक्तियों के प्रस्तावों के प्रकटीकरण का स्वागत किया था। उस समय सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड किए गए दस्तावेज़ों में महत्वपूर्ण विवरण शामिल थे, जिनमें उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि, क्या वे किसी वर्तमान/सेवानिवृत्त न्यायाधीश से संबंधित हैं और कोलेजियम द्वारा स्वीकृत उन नियुक्तियों का विवरण भी था जो सरकार के पास लंबित हैं। इस स्तर की पारदर्शिता ने कुछ हद तक कोलेजियम प्रणाली में जनता का विश्वास बढ़ाया था। हमें उम्मीद थी कि यह स्तर का प्रकटीकरण भविष्य की हर नियुक्ति के लिए एक मानक बन जाएगा।”
हालांकि मामला सिर्फ कॉलेजियम में असहमति का सवाल जस्टिस नागरत्ना का केवल सर्वोच्च न्यायालय तक सीमित नहीं है उन्होंने इसे आगे बढ़ाते हुए यह भी जानने की बात कही है कि आखिर जस्टिस पंचोली का तबादला पटना हाई कोर्ट में क्यों किया गया था इसका भी स्पष्टीकरण अभी तक शेष है। इन सारे सवालों के साथ फिर से यह बात पूरे देश के मानसिक पटल पर चलनी चाहिए कि क्यों न्यायाधीशों की नियुक्ति का मामला योग्यता से ऊपर उठकर वैचारिक है? मैं इंदिरा जयसिंह की बात से इत्तफाक रखता हूं कि हां इस पर कहीं हद तक राजनीतिक प्रभाव तो अवश्य होता है।
(निशांत आनंद पेशे से एडवोकेट हैं।)