भारत में पेंटिंग, चित्र उकेरने का इतिहास यहां की सभ्यता के विकास के साथ जुड़ा हुआ है। आमतौर पर गुफा चित्रों में इसकी शुरुआत देखी जाती है। उनका अध्ययन उस समय के समाज और जीवन को सामने तो लाता ही है, यह सौंदर्यबोध की विकसित होती विधा को भी अभिव्यक्ति करती है। भीम बेटिका की गुफाओं के आरम्भिक चित्र बेहद सरल रेखाओं में अभिव्यक्त होते हैं।
बाद के समय के चित्र जटिल रेखाओं के साथ सामने आते हैं। आरम्भिक दौर के चित्रों में रंग का प्रयोग भी सरल है जो बाद के समय में विकसित होते हुए दिखते हैं। इन संदर्भों में अजन्ता गुफा के चित्र, जिसमें जातक कथाओं को उकेरा गया, एक शानदार उपलब्धि है। गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़े चित्रों को रचने में कलाकारों ने मानवीय भाव को ठोस रूप दे दिया है।

पिछले दो दशक में भारत की पेंटिंग की दुनिया में एक उहापोह की स्थिति बनी हुई है। एक ओर अल्ट्रा-रियलिज्म की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है और वहीं दूसरी ओर चटख रंगों में हिंदू देवताओं के चित्र दिखाई दे रहे हैं। ऐसा लग रहा है, पेंटिंग मांग और पूर्ति के नियम पर चल पड़ा है। यह सच है कि पेंटिंग बाजार के बाहर नहीं होता और अमूमन इसके खरीददार धनिक समूह ही होता है। लेकिन, सभी धनिक समूह इसके खरीददार नहीं होते हैं। इसी तरह भारत का निम्न-मध्यवर्ग और गरीब समुदाय भी पेंटिंग की दुनिया से बाहर नहीं होता। वह अपने घरों में किसी न किसी चित्र और कला से घर को सजाता ही है। इन सबका स्रोत बाजार ही होता है।

आज भी बहुत सारे घरों में ध्यानस्थ बुद्ध की प्रतिमा, फोटो को देखा जा सकता है। गौतम बुद्ध की कला के तौर पर उपस्थिति उनकी ध्यानस्थ शांत मुद्रा ही मुख्य है। इस कला को चाहने वाले जरूरी नहीं है कि वे उनके जीवन से परिचित हों। इन्हीं संदर्भों में, वर्षों बाद नीलम श्रीवास्तव ने कैनवास, ब्रश और रंग को उठाया। उन्होंने गोरखपुर से कला में एमए किया था और बाद के समय में वह शिक्षक बनीं। फिर वह दिल्ली चली आईं। यहां जितनी दिल्ली की विशाल दुनिया है, उतनी ही फैली हुई कला की भी दुनिया है। वह लंबे समय तक ब्रश को एक किनारे ही रखीं रहीं। फिर बात और बहस के सिलसिले के साथ उन्होंने गौतम बुद्ध के जीवन को कैनवास पर उतारने का निर्णय लिया।

उन्होंने एक के बाद एक कुल दस पेंटिंग बनाया। यह पेंटिंग श्रृंखला गौतम बुद्ध से जुड़े थलों पर आधारित है। गौतम बुद्ध का जीवन और उनका अंत समय से जुड़े स्थल पवित्र और ऐतिहासिक स्थल बन चुके हैं। बुद्ध के संदेश, उनकी अपने शिष्यों से चर्चा, जीवन जीने की शैली और निर्वाण भारत की भूमि पर आज भी स्मारकों की तरह स्थापित हैं। गौतम बुद्ध की उपस्थिति बौद्ध धर्म के रूप में आज भी दुनिया के स्तर पर, खासकर दक्षिण एशिया में उपस्थित है। बौद्ध धर्म के दर्शन और धर्म की यह निरंतरता भारत के संदर्भों के बिना संभव नहीं है।
यह पेंटिंग श्रृंखला गौतम बुद्ध के इन्हीं संदर्भों को चिन्हित करती है। लुम्बिनी में बुद्ध का जन्म हुआ। कपिलवस्तु में उनका बचपन गुजरा। गया में उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया। सारनाथ में उन्होंने अपने शिष्यों को पहला प्रवचन दिया। श्रावस्ती में उन्होंने सबसे अधिक समय तक वास किया। राजगीर उनकी पसंदीदा जगह थी, जहां उन्होंने अपने चहेते बिम्बिसार का सानिध्य मिला। कुशीनगर में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। बुद्ध से जुड़े दो प्रमुख स्थल नालंदा और चंपारण हैं।

नालंदा भारत की शिक्षा व्यवस्था का सिरमौर माना जाता रहा है और यहां बौद्ध धर्म की गहन अध्ययन करने की सुविधा थी। दुनिया भर के बौद्ध चिंतकों के लिए यह सर्वप्रमुख स्थल रहा है। वहीं भारत की ऐतिहासिक परम्परा में चंपारण जिले का केसरिया बौद्ध स्तूप बुद्ध के अवशेषों को लेकर बनाया गया। यह भारत के सबसे ऊंचे स्तूपों में से एक है। यह स्तूप भारत बौद्ध अवशेषों से भी पहले प्रसिद्ध व्यक्तित्वों के अवशेषों को लेकर बनाये गये स्तूपों की परम्परा पर स्थापित किया गया था।
कहा जाता है कि गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद उनके पवित्र अवशेषों पर कई सारे दावे किये गये। और, उन्हें लेकर स्तूपों का निर्माण हुआ। सम्राट अशोक ने इन अवशेषों को एक बार फिर से विभाजित किया और उन पर अलग-अलग स्थलों पर 84 हजार स्तूपों का निर्माण किया। लेकिन, इन स्तूपों के अलावा गौतम बुद्ध के संदेश और उनके जीवन से जुड़े स्थल महत्वपूर्ण हैं।

इस पेंटिंग श्रृंखला में ऐसे ही महत्वपूर्ण स्थलों को चित्रित किया जिससे गौतम बुद्ध के जीवन का बोध हो सके और उन्हें जानने की जिज्ञासा पैदा हो। ये स्थल भारत के ऐतिहासिक स्थल हैं जिनके माध्यम से भारत के इतिहास से रूबरू हुआ जा सकता है। इसकी अर्थवत्ता यह नहीं है कि इससे बौद्ध धर्म का बोध होता है। भारत के धार्मिक इतिहास में निश्चित ही बौद्ध धर्म का इतिहास उन सभी धाराओं की याद दिलाता है, जिन्हें हिंदुत्व की अवधारणा चबाकर खत्म कर देना चाहती है।
दुनिया के इतिहास की तरह भारत में भी प्राचीन भारत में राज्य धर्म की अवधारणा के साथ जुड़ा हुआ था। बौद्ध धर्म ने वर्णाश्रम आधारिक संकीर्ण और दमन कारी सामाजिक और राजनीतिक संरचना को तोड़कर नये तरह के नगरों और राज्यों को उभरने का रास्ता साफ किया। इसने ऐसे राजाओं को धार्मिक वैधानिकता प्रदान किया जिन्हें ब्राम्हण ग्रंथ, शुद्र, सूत और मलेच्छ की संज्ञा देते थे। इसने राज्य की अवधारणा पर गहरा प्रभाव डाला जिसका असर 13 वीं शदी तक बना रहा और जिसकी अनुगूंज आधुनिक भारत पर भी बनी रही है।
इस पेंटिंग श्रृंखला में कुल दस चित्र हैं। नीलम श्रीवास्तव के रंगों और ब्रशों के साथ चित्र उकेरने में जो कोमलता वह आपको गौतम बुद्ध के जीवन के करीब ले जाने का माध्यम बनेगी। उन्होंने चटख रंगों और गहरी रेखाओं की बजाय एक दूसरे में घुल जाने वाले सतत रंगों और रेखाओं का प्रयोग किया है। जो उनके इस पेंटिंग के कथ्य के अनुकूल है। आप उनके यह चित्र इस लेख में देख सकते हैं।
(अंजनी कुमार लेखक और टिप्पणीकार हैं।)