क्या घात-प्रतिघात के बीच चुने जाएंगे नए उप-राष्ट्रपति ?   

आज हो रहा उप राष्ट्रपति का चुनाव बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। हालांकि संख्या के लिहाज से चीजें एनडीए-बीजेपी प्रत्याशी सीपी राधाकृष्णन के पक्ष में हैं।लेकिन बीजेडी और बीआरएस के अनुपस्थित रहने के फैसले और बीजेपी-एनडीए के भीतर जारी खींचतान ने इंडिया ब्लाक प्रत्याशी पी सुदर्शन रेड्डी के लिए भी नई संभावनाएं तैयार कर दी हैं। जिसके चलते दिल्ली की राजनीति गरम हो गयी है। 

यह बात अलग है कि सत्तारूढ़ भाजपा सरकार अपने सांसदों की संख्या के बदौलत जीत सकती है किंतु यह भाजपा यानि एनडीए और संघ के बीच उपजे विवाद के फलस्वरूप संकट में घिरी नज़र आ रही है। जब प्रधानमंत्री को खुद अपनी सत्ता अधबीच में जाने का खतरा सामने हो और खुद के सांसदों के बीच हाथापाई की नौबत आ गयी हो तो दूसरे दलों पर यकीन कैसे किया जा सकता है? पूर्व उपराष्ट्रपति को जिस तरह सत्यवादी रुख अख्तियार करने की सज़ा षड्यंत्र पूर्वक बीमार बताकर दी गई उस पर अब यकीन कौन करेगा?

जो सरकार पिछले दो साल से थोपे हुए अध्यक्ष से काम चला रही है। अपना पार्टी अध्यक्ष नहीं बना पाई। उससे हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। लगता तो यही है कि अपना बना बनाया उप-राष्ट्रपति खोकर अब वह शायद ही अपने व्यक्ति को जिता पाए।

हालांकि इस पद पर किसी भी व्यक्ति की जीत पार्टी की जीत नहीं मानी जाती वह तो एक निष्पक्ष पद है जो राज्यसभा का सभापति होता है और सदन में सभी सदस्यों से समभाव से सम्मानपूर्वक बात सुनता है किंतु भाजपा शासनकाल में उपराष्ट्रपति ही नहीं, लोकसभा स्पीकर और महामहिम राष्ट्रपति भी कठपुतली बना दिए गए। इसलिए यदि विपक्ष का उम्मीदवार विजयी होता है तो यह संवैधानिक और सजग उपराष्ट्रपति होगा।

इसी डर से भाजपा सरकार इस जीत के लिए पहली बार वोटिंग का प्रशिक्षण देने के नाम पर सांसदों को एक बने रहकर एनडीए उम्मीदवार को जिताने के लिए जी जान से जुटी है।

बताया ये जा रहा है कि तेलुगू देशम पार्टी के सांसद मलेशिया में घूमने के बहाने इस कार्यशाला से दूर हो गए हैं। राहुल गांधी के मलेशिया दौरे से भी इस बात  की पुष्टि हो जाती है। सूत्र बता रहे हैं कि राहुल गांधी उन सांसदों से संपर्क बनाने ही वहां गए हैं तफरी करने नहीं।

मुश्किल जो आ रही है भाजपा के सामने वह यह है कि मोदी शाह की हां में हां मिलाने वाले सांसद ही अब उनसे किनारा करने लगे हैं। सच ही है डूबते का सहारा कोई नहीं बनता। उधर संघ मोदी को हटाने पर तत्पर है। नितिन गडकरी को पीएम बनाने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। उपराष्ट्रपति कोई बन जाए वहां उसका ध्यान नहीं वह तो भाजपाध्यक्ष पद पर संजय जोशी और नितिन गडकरी को पीएम बनाने की कोशिश में ही मोदी-शाह को उपराष्ट्रपति चुनाव हराने का ठीकरा फोड़ हटाने प्रतिबद्ध है।

इन परिस्थितियों में यदि कोई सुलह समझौता अंतिम प्रयास में नहीं होता है तो वे उपराष्ट्रपति पद से नहीं बल्कि प्रधानमंत्री और भाजपाध्यक्ष पद से भी हाथ धो बैठेंगे।

फिर भी यदि विपक्ष की स्थिति तीन सौ सीट तक पहुंचती है उपराष्ट्रपति नहीं बना पाती है,तो वह सरकार बनाने राष्ट्रपति के यहां दस्तक दे सकती है।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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