धनबाद: कोयले का अवैध उत्खनन कर रहा है आम लोगों का जीना मुहाल


धनबाद। 5 सितंबर शिक्षक दिवस के अवसर पर झारखंड सहित जहां देश के अन्य क्षेत्रों में भी शैक्षणिक संस्थानों सहित कई अन्य जगहों पर कई कार्यक्रम हो रहे थे, वहीं झारखंड के धनबाद जिला अंतर्गत कतरास के कोलियरी क्षेत्र में भू-धंसान के कारण कई जानें गईं और कई लोग बेघर हो गए। वैसे तो इस भू-धंसान से मानवीय संवेदना को झकझोरने वाली तीन घटनाएं हुईं, लेकिन प्राथमिकता के तौर पर मीडिया में केवल दो घटनाओं का कवरेज देखने को मिला। 

सबसे बड़ी व अमानवीय जो घटना हुई, उसका काफी हल्के में जिक्र देखने को मिला। क्योंकि उक्त घटना पर कोई आधिकारिक बयान या पुष्टि नहीं की गई और न ही कोई इस पर कुछ कहने को तैयार हुआ। जबकि इस घटना में 200 से अधिक लोगों की मौत की संभावना दबे जुबान से क्षेत्र में तैर रही है।

पहली घटना उस वक्त हुई जब आउटसोर्सिंग के आधार पर खनन करने वाली मां अम्बे कंपनी की दो सर्विस वैन खदान नंबर चार के पास मजदूरों को लेकर खदान क्षेत्र से बाहर निकल रही थीं कि अचानक मिट्टी खिसक गई और दोनों वाहन करीब 400 फीट पानी से भरी गहरी खाई में गिर पड़े। रेस्क्यू टीम ने दो दिनों की मशक्कत के बाद 8 शव बरामद किए, जिसमें 6 लोगों की पहचान आउटसोर्सिंग कर्मियों के रूप में हुई थी और 2 शव की पहचान नहीं हो सकी थी। 

लेकिन हादसे के तीसरे दिन सातवें शव की पहचान 28 वर्षीय संतोष तुरी के रूप में उसकी बहन पुनपुन देवी ने की। पुनपुन देवी ने बताया कि उसका भाई संतोष और भाभी सोनिया देवी, लकड़का बस्ती नंबर 14 के निवासी हैं। सोनिया घर से बच्चों को यह कहकर निकली थी कि “दो बोरा कोयला चुनकर बेच देंगे तो शाम को राशन लेकर लौटेंगे।” उसी दिन से केशलपुर मुंडा धौड़ा में भू-धंसान व आउटसोर्सिंग पैच में घटना के बाद से लापता है। परिजनों का मानना है कि संभव है कि सोनिया भी हादसे की चपेट में आई हो। कहीं मलबे के नीचे दबी हो सकती हैं। 

संतोष व सोनिया के 11 वर्षीय बेटे और 6 वर्षीय बेटी का रो-रोकर बुरा हाल है। परिजन प्रशासन से राहत की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन अभी तक प्रशासन की ओर से किसी तरह का आश्वासन नहीं मिल सका है। संभावना व्यक्त की जा रही है कि संतोष व सोनिया नीचे कोयला चुनकर जमा कर रहे होंगे तभी ऊपर से गिरती वैन की चपेट में आ गए होंगे। 

संतोष तुरी इत्तेफाक से रेस्क्यू टीम के दायरे में आ गया होगा, जबकि सोनिया नीचे पानी भरी गहरी खाई में अंदर कहीं फंस गई होगी। वैसे भी कई और आउटसोर्सिंग कर्मी गायब बताए जा रहे हैं, तो ऐसे में इन बाहरी लोगों को कौन पूछता है। आउटसोर्सिंग कर्मियों में जिनकी लाशें मिली हैं उनके परिजनों को बीसीसीएल प्रबंधन ने मुआवज़ा देने की घोषणा कर दी है।

वहीं दूसरी घटना बीसीसीएल एरिया के कतरास के केशलपुर मुंडा पट्टी में हुए भू-धंसान ने स्थानीय लोगों की जिंदगी तबाह कर दी। कई घर भू-धंसान से जमींदोज हो गए। केशलपुर मुंडा पट्टी में सुबह 11 बजे के आसपास अचानक धरती फट गई और जोरदार आवाज के साथ कई घर और मवेशियों के खटाल लगभग 20 फीट नीचे धंस गए। अचानक हुए इस घटना से पूरे इलाके में अफरातफरी मच गई और लोगों में दहशत फैल गई। लोग समझ ही नहीं पाए कि यह सब कैसे हुआ। जब तक लोग कुछ समझ पाते, देखते-ही-देखते उनकी आंखों के सामने आधा दर्जन से अधिक मकान धंस गए।

जमीन में एक विशाल गोफ बन गया, जिसके अंदर घरों का सारा सामान और मवेशी समा गए। हादसे के वक्त जो लोग अपने घरों के अंदर मौजूद थे, अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। इस हादसे में विजय यादव, अर्जुन यादव, अशोक यादव, नागेश्वर यादव, गंगा कुमार यादव, महादेव यादव, सुनील कुमार, रूखी कुमारी और मुन्नी कुमारी घायल हो गए। 

जिन्हें कतरास के एक निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया। घटना में आधा दर्जन से अधिक मवेशी भी जमीन के अंदर समा गए। लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर कुछ मवेशियों को बचाने की कोशिश की, लेकिन कई मवेशी भू-धंसान की चपेट में आ गए। साबो देवी की गाय व गहने सहित घर का सारा सामान जमीन में समा गया। इस घटना के बाद साबो देवी का रो-रोकर बुरा हाल था।

जिन लोगों ने अपने घरों को वर्षों की मेहनत से बनाया था, वे बेघर हो गए। अपनी आंखों के सामने सबकुछ खत्म होते देखने के बाद उनकी जुबान से छलकते दर्द को बयां करने के शब्द नहीं मिल रहे हैं। भुक्तभोगी सुनील यादव बताते हैं – “मेरा सब कुछ खत्म हो गया। जमीन धंसने से मेरे दो मवेशी, जेवर और घर का सारा सामान अंदर चला गया है। बड़ी मुश्किल से पैसे जमा करके जेवर खरीदे थे, आज सबकुछ बर्बाद हो गया। अब कैसे गुजारा करेंगे, कुछ समझ में नहीं आ रहा।”

पीड़िता सोनिया देवी रोते हुए कहती हैं – “अब हम अपने बच्चों का पालन-पोषण कैसे करेंगे? जिस घर से हमारा गुजारा चल रहा था, वह अब नहीं रहा। दुर्गापूजा नजदीक है और हमारी छत ही छिन गई। पूरा परिवार आज दूसरे के घर में शरण लिए हुए है। कहां सिर छिपाएं, यह समझ में नहीं आ रहा।”

नागेश्वर यादव ने बताया – “मेरी दो गाय और उनके बछड़ों के साथ-साथ कई जरूरी सामान भी गोफ में समा गए हैं। यह हादसा लगातार हो रहा है। यह सबकुछ अवैध उत्खनन की वजह से हुआ है। हम प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही।”

तीसरी घटना, जो सबसे बड़ी व अमानवीय घटना कही जा सकती है, उसका कोई आधिकारिक बयान या पुष्टि नहीं होने के कारण उसे काफी हल्के में लिया गया है। जबकि इस घटना में 200 से अधिक लोगों की मौत की संभावना दबे जुबान में क्षेत्र के लोगों में चर्चा का केंद्र बनी हुई है। बावजूद इसके कोई खुले रूप से इस पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। क्योंकि जो भू-धंसान की घटना हुई है उसके केंद्र में अवैध उत्खनन है।

नाम नहीं छापने की शर्त पर एक मजदूर संगठन के एक आला नेता ने बताया कि अवैध उत्खनन में जो मजदूर लगाए जाते हैं, उनकी दो शिफ्ट यानी दो पालियां होती हैं – रात की पाली और दिन की पाली। रात की पाली में उत्खनन करने वाले मजदूर सुबह नौ बजे तक उत्खनन करते हैं तथा दिन की पाली नौ बजे से शुरू होकर शाम छह बजे तक चलती है। घटना के दिन दूसरी पाली के मजदूर सुबह नौ बजे उत्खनन में लग गए थे और भू-धंसान की घटना दो घंटे बाद करीब 11 बजे हुई। 

यानी उत्खनन का काम करने वाले मजदूर खदान के काफी भीतर तक जा चुके होंगे और भू-धंसान के बाद अंदर ही फंस गए होंगे। जबकि इस बात की जानकारी अवैध उत्खनन कारोबारी सहित बीसीसीएल प्रबंधन और प्रशासन को भी होगी, लेकिन इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। उल्टे उत्खनन वाले ओपन माइन्स के मुंह को बाहर से बंद कर दिया गया। मतलब साफ है कि अवैध उत्खनन में लगे सारे के सारे मजदूर ओपन माइन्स के भीतर अकाल मौत के शिकार हो गए।

वैसे माइन्स के मुंहाने से तीन लोगों की मौत होने की बात भी दबी जुबान से बाहर आई, वहीं कई लोगों के घायल होने की बात भी सामने आई। कुछ घायलों का इलाज पास के अस्पताल में चला, लेकिन किसी की पहचान नहीं बताई गई। प्रत्यक्षदर्शी इतना तो बताते हैं कि घटना के बाद घटनास्थल पर रात की पाली वाले सैकड़ों खनन मजदूर और कोयले का हजारों बोरा मौजूद था, जो रात की पाली में निकाला गया होगा। लेकिन पुलिस प्रशासन के आने के बाद वहां कोयले का न तो एक भी बोरा नजर आया और न ही कोई मजदूर।

तीसरी घटना का कोई आधिकारिक बयान या पुष्टि नहीं है जबकि उक्त दो हादसों का मूल कारक अवैध उत्खनन है। कहना न होगा कि आधिकारिक तौर पर इसका कोई जिक्र इसलिए नहीं हुआ कि इलाके में अवैध उत्खनन के कारण ही भू-धंसान हुआ और उपर्युक्त दो घटनाएं सामने आईं। चूंकि यह घटना अवैध उत्खनन से जुड़ी है इसलिए स्थानीय प्रशासन और बीसीसीएल प्रबंधन ने इसे हाईलाइट होने ही नहीं दिया।

उल्लेखनीय है कि अवैध उत्खनन में जो मजदूर लगाए जाते हैं वे स्थानीय मजदूर नहीं होते हैं। क्योंकि अवैध कारोबारियों के लिए स्थानीय मजदूरों का होना उनके गले की फांस बन सकता है। इस तरह की घटनाओं से स्थानीय मजदूरों का होना बड़ा हंगामा खड़ा कर सकता है। इसलिए ये कारोबारी काफी दूर-दराज के मजदूरों को इस काम में लगाते हैं, जो पश्चिम बंगाल या काफी दूर के आदिवासी समुदाय के मजदूर होते हैं। 

यही कारण है कि इन मजदूरों की मौत के बाद भी उस पर कोई हंगामा नहीं होता है। दूसरी तरफ कारोबारियों द्वारा मजदूरों के परिवार वालों को चेतावनी दे दी जाती है कि अगर कोई हंगामा किया तो पुलिस प्रशासन उन्हें ही धर दबोचेगा और जेल भेज दिया जाएगा। इसी डर से अपने पालनहार को खोने के बाद भी उनके परिजन खामोश रहते हैं।

कहना न होगा, इतना कुछ जानते हुए भी अगर मजदूर इस अवैध उत्खनन का हिस्सा बनते हैं तो बस पेट की आग ही इसकी असली वजह है। आज़ादी के इतने सालों बाद भी आम लोगों को न तो दो जून की रोटी उपलब्ध हो पाई है, न ही सिर ढकने का कोई स्थायी आशियाना।

बता दें कि यह इलाका पहले से ही डेंजर जोन में शामिल है। पहले भी यहां हादसा हो चुका है। पहली बार जब यहां हादसा हुआ था, तो उस वक्त क्षेत्र के सांसद सी.पी. चौधरी ने तस्करों के खिलाफ यहां से अभियान शुरू किया था। उस वक्त एक घायल बच्ची के संबंध में राष्ट्रीय स्तर पर जांच हुई थी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वर्तमान सदस्य और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने यहां आकर जांच-पड़ताल की थी। 

लेकिन अंततः मामला ढाक का तीन पात ही साबित हुआ। इसका कारण यह है कि अवैध उत्खनन करने वाले लोगों को राजनीतिक वरदहस्त हासिल है, या यूं कहें तो इस धंधे पर इनका ही वर्चस्व है, सामने दिखने वाला चेहरा इनका केवल कर्ता-धर्ता होता है। यही वजह है कि बीसीसीएल प्रबंधन भी इस अवैध उत्खनन के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेता है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय पुलिस प्रशासन भी चुप्पी साधे रहता है।

इस हालात के सबूत पर बियाडा के पूर्व अध्यक्ष, समाजसेवी और चर्चित वकील विजय कुमार झा बताते हैं कि वे इस अवैध खनन को रोकने को लेकर कतरास एरिया के तत्कालीन जीएम से मिले और उन्होंने उनको बताया कि “अवैध खनन को रोकने का सार्थक उपाय है ड्रोन से एरिया की निगरानी करना। जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि कौन-कौन लोग इस अवैध खनन में लगे हैं? इस आधार पर कार्रवाई होगी, तो अवैध खनन स्वतः रुक जाएगा।” विजय झा ने जीएम से कहा कि “ड्रोन से इस तरह की निगरानी दिन भर होती रहेगी और शाम को सारा कोयला बीसीसीएल कंपनी अपने स्टॉक में ले लेगी।” 

इस पर जीएम ने श्री झा के समक्ष हाथ जोड़ते हुए कहा कि ऐसा करके हम अपनी जान पर खतरा पैदा नहीं कर सकते। इस पर विजय कुमार झा ने अपने स्तर से ड्रोन उपलब्ध कराने की भी बात कही तो जीएम ने पहले चुप्पी साध ली और फिर कहा कि “ऐसा संभव नहीं है।” इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन अवैध धंधेबाजों से बीसीसीएल के अधिकारी कितने आतंकित हैं।

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विजय झा कहते हैं – “कोयले का अवैध कारोबार रोकने का यह बेहतर सरल उपाय है, लेकिन बीसीसीएल प्रबंधन किसी बड़े दबाव में चुप्पी साधे रहता है और जब कभी बड़ी घटना होती है तो उस पर केवल औपचारिक तौर पर कार्रवाई कर, कार्रवाई का कोरम पूरा कर लेता है।” वे बताते हैं कि “उन्होंने ड्रोन से निगरानी सहित कोयला ढोने वाले तमाम वैध-अवैध वाहनों में जीपीएस लगाने की भी सलाह दी थी। 

जिससे कौन-कौन वाहन किधर-किधर जाते हैं, पता चलता और जिससे डीओ धारक कोयला वाले वाहनों का पता चलने के साथ-साथ अवैध कोयला वाले वाहनों का भी पता चलता, जिसे जब्त कर लिया जाता। जब इस तरह की कार्रवाई होती तो कोई भी वाहन मालिक अपना वाहन अवैध कारोबारियों को नहीं देता।” झा ने बताया – “बीसीसीएल प्रबंधन इस पर भी चुप्पी साधे रहा है जो इस बात का सबूत है कि इस अवैध कारोबार में काफी ऊपर तक की राजनीतिक पैठ है।”

बता दें बुटू बाबू बंगले के पास बाहरी मजदूरों को लाकर अवैध उत्खनन कराने की जानकारी लगातार तत्कालीन सीएमडी समीरन दत्ता को दी जाती रही है, उनके मोबाइल पर अवैध खनन के वीडियो और संदेश भी भेजे जाते रहे हैं, लेकिन वे मौन धारण किए रहे। जो इस कारोबार में ऊपर तक की राजनीतिक पैठ को उजागर करता है।

वैसे सर्वविदित है कि स्थानीय स्तर पर कौन-कौन से राजनीतिक चेहरे इस अवैध कारोबार में संलिप्त हैं, लेकिन किसी की जुबान कई कारणों से नहीं खुलती है। स्थानीय लोग दबे जुबान में इतना तो कहते हैं कि यहां लंबे समय से अवैध कोयला खनन जारी है, जिसके कारण ही भू-धंसान जैसी घटनाएं होती हैं। वे भू-धंसान में बड़ी संख्या में लोगों के दबे होने की आशंका भी जताते हैं लेकिन खुलकर कुछ नहीं बोलते।

उल्लेखनीय है कि कोयलांचल क्षेत्र धनबाद में अवैध कोयला खनन के कारण इस तरह की घटनाओं का यह कोई नया मामला नहीं है। हर साल लगातार इस तरह की घटनाएं अवैध कोयला खनन के दौरान होती रहती हैं, जिसके कारण केवल कोयला खनन में लगे मजदूरों को ही नुकसान नहीं उठाना पड़ता बल्कि वहां बसे लोगों को भी भुगतना पड़ता है।

(विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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