सुप्रीम कोर्ट अयोध्या जजमेंट, प्रस्तावित धन्नीपुर मस्जिद और जस्टिस चंद्रचूड़ की खामोशी

सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवम्बर, 2019 को अयोध्या के राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। विवाद और आलोचना से परे न होने के बावजूद उस फैसले को देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों,  समुदायों और सिविल सोसायटी ने स्वीकार किया। फैसले के तहत अयोध्या में मंदिर बन गया। देश की बड़ी सामाजिक और राजनीतिक हस्तियों की मौजूदगी में नवनिर्मित राम मंदिर का 22 जनवरी, 2024 को उद्घाटन भी हो गया।

इसके साथ ही वहां पूजा-पाठ और तीर्थ यात्रियों का आना-जाना शुरू हो गया। मंदिर परिसर और आसपास के इलाकों को सुसज्जित और भव्यता प्रदान करने करने के लिए सरकारी विभागों ने कई कदम उठाये। लेकिन अचरज की बात ये कि 9 नवम्बर 2019 के सुप्रीम कोर्ट के उसी फैसले में अयोध्या से 25 किमी दूर धन्नीपुर गांव में जो मस्जिद बनायी जानी थी, वह आज तक नहीं बनी। क्यों नहीं बनी? इसका जवाब तो एक आरटीआई से मिल गया। लेकिन इस बात का जवाब आज तक नहीं मिला कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के एक हिस्से के क्रियान्वयन न होने का अब तक संज्ञान क्यों नहीं लिया?

कोर्ट के आदेश के बावजूद उक्त गांव में मस्जिद क्यों नहीं बनी, इसका जवाब एक स्थानीय पत्रकार ओ पी सिंह की आरटीआई से मिला। अयोध्या से 25 किमी दूर धन्नीपुर गांव में पांच एकड़ जमीन मस्जिद ट्रस्ट को दी गई थी। यहां एक मस्जिद, एक अस्पताल और एक पुस्तकालय भी बनना था। आरटीआई के जवाब से पता चला कि अयोध्या विकास प्राधिकरण धन्नीपुर मस्जिद ट्रस्ट के ‘ले-आउट प्लान’ को खारिज कर चुका है। इस ‘ले-आउट’ के लिए शासन ने लोक निर्माण विभाग, प्रदूषण नियंत्रण विभाग, नागरिक उड्डयन विभाग, अग्निशमन विभाग, सिंचाई विभाग और नगर निगम जैसे विभागों से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) मांगा था। ज्यादातर ने कोई टिप्पणी ही नहीं की। सरकारी विभागों ने एनओसी भेजा ही नहीं।

ट्रस्ट के सदस्यों के प्रयास के बावजूद शासकीय विभाग पर कोई असर नहीं पड़ा। इसके बाद अयोध्या विकास प्राधिकरण ने मस्जिद के प्रस्तावित नक्शे को खारिज कर दिया। देश के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने कुछ दिन पहले इस खबर को अपने पहले पेज पर छापा। खबर छपने के कई दिन बीत गये पर किसी भी प्रशासनिक निकाय या न्यायालय की तरफ से इस मामले में संज्ञान नहीं लिया गया। आखिर उस सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान क्यों नहीं लिया, जिसने अयोध्या से कुछ दूरी पर उक्त मस्जिद के निर्माण का फैसला दिया था? इस मामले में कुछ स्थानीय पत्रकारों ने जब मस्जिद ट्रस्ट के सचिव अतहर हुसैन से पूछा तो उन्होंने दुखी मन से सिर्फ इतना ही कहा: “हमें पता नहीं कि सरकारी विभागों ने मस्जिद के उक्त नक्शे को अपनी एनओसी क्यों नहीं दी?” 

इस बीच पता चला है कि अग्निशमन विभाग ने मस्जिद की जगह तक चौड़ी सड़क न होने के चलते अपनी आपत्ति जताई थी। अन्य विभागों के बारे में कुछ भी नहीं मालूम पड़ा। एक नयी बात यह भी सामने आई है कि दो महिलाओं ने उक्त जमीन पर अपना दावा ठोका है।

सवाल उठता है कि जमीन का स्वामित्व अगर विवादों में था तो अयोध्या के तत्कालीन जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की रोशनी में मस्जिद के लिए वहां पांच एकड़ जमीन क्यों अलॉट की? जिलाधिकारी, जो जिले का सबसे बड़ा राजस्व अधिकारी होता है; वह कोर्ट के आदेश की रोशनी में मस्जिद के नाम ऐसी विवादास्पद जमीन क्यों अलॉट करेगा? 

अचरज की बात यह भी है कि सन् 2019 के बहुचर्चित अयोध्या जजमेंट देने वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच के सदस्य-जज रहे श्रीमान डीवाई चंद्रचूड़ ने (रिटायर होने के काफी समय बाद) पिछले दिनों अयोध्या सहित अपने ‘न्यायिक जीवन’ के कुछ महत्वपूर्ण फैसलों की बड़े विस्तार से चर्चा की लेकिन उसमें धन्नीपुर में बनने वाली मस्जिद का जिक्र न तो माननीय पूर्व न्यायाधीश ने किया और न ही सवाल पूछने वाले पत्रकारों ने किया! क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि बीते सप्ताह जस्टिस चंद्रचूड़ अपने लिखे फैसले के अलग-अलग पहलुओं पर खूब बोले और खूब फंसे। पर वे फैसले के एक अहम् हिस्से-मस्जिद निर्माण के प्रोजेक्ट के क्रियान्वयन न होने पर बिल्कुल खामोश रह गये! 

यह बात फैसले के समय ही उजागर हुई थी कि सुप्रीम कोर्ट के उस बहुचर्चित फैसले के लेखक स्वयं जस्टिस चंद्रचूड़ ही थे। उस समय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई थे। बेंच के अन्य सदस्य थे: जस्टिस एसए बोबडे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर! बेंच ने सर्व सम्मति से यह फैसला किया था। सेवानिवृत्त होने के कुछ समय बाद  मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा का मनोनीत सदस्य बनाया गया और जस्टिस नजीर आंध्र प्रदेश के राज्यपाल बनाये गये। जस्टिस गोगोई के सेवानिवृत्त होने के बाद नवम्बर, 2019 में जस्टिस बोबडे और नवम्बर, 2022 में जस्टिस चंद्रचूड देश के मुख्य न्यायाधीश बने थे।  

यह भी गौरतलब है कि अयोध्या के धन्नीपुर में बनने वाली उक्त मस्जिद के ट्रस्ट की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय का अब तक दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया गया? अगर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान नहीं लिया तो मस्जिद ट्रस्ट फौरन कोर्ट क्यों नहीं गया?

(उर्मिलेश लोखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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