चुनाव आयोग ने डंके की चोट पर अपने आकाओं की मुराद पूरी करके दिखाया है। ‘बिहार SIR, 2025’ के दौरान ‘योग्य वोटर छूटे नहीं, अयोग्य जुड़े नहीं’ का जाप करते हुए वो आख़िरकार, 69 लाख 29 हज़ार से ज़्यादा वोटर्स के नाम निगल गया। BLO, BLA, जनता, राजनेता, एक्टिविस्ट, वकील और सुप्रीम कोर्ट सभी तमाशा देखते रह गये।
30 सितम्बर 2025 वाले Final Electoral Roll के आँकड़ों से साफ़ है कि 1 अगस्त 2025 को काटे गये 65.63 लाख नाम में अब 3.66 लाख और बढ़ गये। इस तरह, 25 जून 2025 से जारी बिहार SIR को अब तक 7.89 करोड़ में से 69.29 लाख यानी 6 प्रतिशत वोटर अयोग्य मिले हैं। पहले हटाये गये 65.63 लाख नाम में से 22 लाख मृत थे, 36 लाख ग़ैर-मौजूद और 7 लाख डुप्लीकेट थे। बाद वाले 3.66 लाख में 60 हज़ार और मृत मिल गये, 2 लाख और अन्यत्र जा बसे और 80 हज़ार और डुप्लीकेट भी धरे गये। इस तरह, हटाये गये कुल 69.29 लाख में से 22.8 लाख मृत, 38 लाख ग़ैर-हाज़िर और 7.8 लाख डुप्लीकेट निकले। तो बाक़ी बचे 68-69 हज़ार में से कितने घुसपैठिये हैं? हैं भी या नहीं?
फ़ॉर्म-6 के ज़रिये 21.53 लाख नये नाम भी जुड़े। लेकिन ये गोपनीय है कि इनमें किस आयु वर्ग के कितने लोग हैं? बहरहाल, सारा जोड़-घटाव करके तय हुआ कि बिहार में अब 7.42 करोड़ योग्य मतदाता हैं। बाक़ी, यदि अब भी कोई योग्य छूट गया है तो उसके पास मतदान के 10 दिन पहले तक अपना नाम जुड़वाने का मौक़ा है। बाक़ी ‘खेल ख़त्म, पैसा हज़म’।
2023 की बिहार जाति जनगणना में राज्य की आबादी 13.07 करोड़ थी। अभी 13.43 करोड़ का अनुमान है। सर्वाधिक युवा अनुपात वाले बिहार में 58% लोग 25 साल से बड़े हैं तो 62% यानी 8.32 करोड़ लोग वयस्क और मतदाता बनने योग्य हैं। लेकिन मतदाता सूची तो 7.42 करोड़ पर सिमट गयी। तो बाक़ी 90 लाख कहाँ रह गये? SIR से छूट क्यों गये? कहीं ऐसा तो नहीं कि यही 90 लाख सुशासन बाबू की 20 साल लम्बी थकान के लिए ख़तरा बन रहे थे? लिहाज़ा, इनकी सफ़ाई ज़रूरी थी! क्या इसीलिए 24 जून 2025 को ‘यदा-यदा ही धर्मस्य…’ की तर्ज़ पर Special Intensive Revision (SIR) ने पृथ्वी पर अवतार लिया?
अनोखा नियम भी बना कि 2003 में हुए पिछले Intensive Revision के बाद जुड़े सभी नाम, मतदाता सूची से हटाये जाएँगे। पहले चुनाव आयोग का काम था, ‘घर-घर जाकर नये वोटर्स को जोड़ना, मृत को हटाना और अन्यत्र जा बसे लोगों का नाम मिटाना’। अब फ़रमान था कि जो ‘काग़ज़ दिखाएगा’ सिर्फ़ उसी का नाम जोड़ा जाएगा। पहली बार ऐसे नियम बने। SIR भी तो पहला अवतार है। संविधान के अघोषित वरदान से निर्मित ये चुनाव आयोग का अजेय ब्रह्मास्त्र बना।
फ़िल्मी पटकथा की तरह SIR के आगे सुप्रीम कोर्ट अर्ध-मूर्छा में रहा। उसे ‘आधार कार्ड’ के सिवाय कुछ नहीं सूझा। बक़ौल ‘दिनकर’, ‘जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है’। SIR नहीं होता तो अभी 8.32 करोड़ वोटर होते। SIR शुरू होने से पहले 7.89 करोड़ वोटर थे। लोकसभा चुनाव में 7.65 करोड़ वोटर थे। SIR पूरा होने के बाद अब 7.42 करोड़ वोटर हैं। SIR नहीं होता तो विधानसभा चुनाव के लिए 43 लाख वोट बढ़ जाते। लोकसभा से जोड़ें तो 67 लाख का इज़ाफ़ा होता। लेकिन SIR ने 67 लाख की वृद्धि को लोकसभा से भी 16 लाख कम कर दिया!
सबसे रोचक तथ्य है कि अभी हटाये गये 69.29 लाख लोगों में से ज़्यादातर ने 2024 में बिहार के 40 सांसदों के निर्वाचन में अहम योगदान दिया था। तब ‘शायर’ राजीव कुमार अग्रवाल फ़िल्म के मुख्य फ़नकार थे। ज़्यादा प्रतिभावान होने के बावजूद ज्ञानेश कुमार गुप्ता को संगत कलाकार की भूमिका मिली। उस्ताद के जाते ही इनके पिटारे से SIR निकाला। क्योंकि 2024 में 7.65 करोड़ में से 4.33 करोड़ यानी 56.62% लोगों ने ही वोट डाला। इनमें से NDA को 2.04 करोड़ यानी 47.2% वोट मिले। उसे 40 में से 30 सीट मिली। BJP ने 17 लड़कर 12 जीतीं। उसे 88.8 लाख यानी 20.5% वोट मिले। JDU ने 16 लड़कर 12 जीतीं। उसे 80.2 लाख यानी 18.5% वोट मिले।
2024 में महागठबन्धन को 4.33 करोड़ वोटर्स में से 1.7 करोड़ यानी 39.2% के वोट मिले। इसे 40 में से 9 सीटें मिलीं। RJD ने 23 सीटें लड़ी, 4 जीतीं। उसे 95.8 लाख यानी 22.1% वोट मिले। जो बीजेपी से 7 लाख ज़्यादा थे, हालाँकि RJD की 6 सीट ज़्यादा थी। काँग्रेस ने 9 सीटें लड़ीं, 3 जीतीं। उसे 3.98 लाख यानी 9.2% वोट मिले। CPI-ML ने भी 3 सीटें लड़ीं, 2 जीतीं। इसे 1.29 लाख यानी 3 प्रतिशत वोट मिले। पूर्णिया के निर्दलीय पप्पू यादव, अब काँग्रेस के साथ हैं।
ये आँकड़े बताते हैं कि ‘मोदी 3.0’ के लिए महज 34.65 लाख वोट ज़्यादा बटोरकर उस बिहार से 30 सांसद जुटाये गये जहाँ अब 69.29 लाख वोटर अयोग्य मिले। क्या वोट चोरों के अलावा कोई जानता है कि ‘34.65 लाख’ की बढ़त के पीछे कितने चेहरे ‘69.29 लाख’ वाले थे? अयोग्य वोटर्स का हाथ नहीं होता तो क्या 2024 में NDA के हाथ से ऐसी 10 सीट खिसक जाती जहाँ जीत का अन्तर कम था? बिहार में औसतन हर लोकसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा सीटें हैं। लोकसभा में ज़्यादा अयोग्य वोटर्स के होने से जैसा फ़ायदा था वैसा ही विधानसभा में वोटर्स के घटने से होगा। यही चुनाव आयोग चाहता है।
(मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)