पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में जन विद्रोह: बगावत 15 लोग मारे गए, आखिर वजह क्या है?

कश्मीर के कब्जे वाले पाकिस्तान की राजधानी मुजफराबाद में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। बीते सोमवार से लेकर अब तक यह प्रदर्शन चल रहा है, कल पांचवा दिन था। अन्य जगहों पर भी लोगों ने प्रदर्शन किया। सुरक्षा बलों और प्रदर्शकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई। वैश्विक मीडिया के स्रोतों के अनुसार कम से कम 15 लोग अब मारे गए हैं, जिसमें तीन सुरक्षा बल हैं। कई सारे लोग घायल हुए हैं।

जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट एक्शन कमेटी (जेएएसी) के नेतृत्व में हो रहा है। इसका नेतृत्व नागरिक कार्यकर्ता शौकत नवाज मीर कर रहे हैं। प्रदर्शन और तालाबंदी 29 सितंबर को शुरू हुई और इसने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर (जिसे स्थानीय रूप से आज़ाद जम्मू और कश्मीर (एजेके) के नाम से जाना जाता है) के कई ज़िलों को पूरी तरह से ठप कर दिया है।

इस बीच पाकिस्तान सरकार ने पूरी तरह से संचार व्यवस्था ठप कर दी है, जिससे 28 सितंबर से निवासियों के मोबाइल और इंटरनेट कनेक्शन बंद हैं।

मुज़फ़्फ़राबाद में, आमतौर पर चहल-पहल वाले बाज़ार बंद रहे हैं, जबकि सड़कों से रेहड़ी-पटरी वाले और सार्वजनिक परिवहन गायब हैं। इसके चलते यहां के लगभग 40 लाख निवासियों की जिंदगी ठप्प सी पड़ गई है।

सरकार ने एक बयान में कहा कि अधिकारी व्यवस्था बहाल करने के लिए काम कर रहे हैं और जनता से आग्रह किया है कि वे सोशल मीडिया पर किसी “विशिष्ट एजेंडे” के तहत प्रसारित हो रहे दुष्प्रचार और “फर्जी खबरों” से प्रभावित न हों।

जेएससी के नेतृत्व में यह विरोध प्रदर्शन पिछले तीन वर्षों से चल रहा है। यह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में कश्मीरियों का तीसरा बड़ा प्रदर्शन है। पाकिस्तान की सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच इन 38 सूत्रीय मांगों पर कोई सहमति नहीं बन पाई है। इन 38 मांगों में निशुल्क शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा की मांग भी शामिल है।

2023 पहला बड़ा प्रदर्शन बिजली बिलों में बेहतहाशा वृद्धि के खिलाफ हुआ था, लोग सड़कों पर उतर आए थे। मई 2024 में यह आंदोलन अपने पहली बार चरम पर पहुंच गया, जब प्रदर्शनकारियों ने मुज़फ़्फ़राबाद की ओर एक लंबा मार्च शुरू किया। इसके बाद हिंसक झड़पें हुईं, जिनमें एक पुलिस अधिकारी समेत कम से कम पांच लोगों की मौत हो गई।

पाकिस्तान सरकार की तमाम कोशिशों के बाद अभी लोगों का आक्रोश-असंतोष शांत नहीं हुआ है। व्यापार, यातायात और स्कूल ठप्प पड़े हैं। पाकिस्तान सरकार ने संघर्षों के कारणों की जांच करने और लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनकारियों से निवेदन किया है कि वे संघर्ष का रास्ता चुनने की जगह बात-चीत करें।

यह प्रदर्शन अवामी लीग एक्शन कमेटी (Jammu Kashmir Joint Awami Action Committee (JAAC)) के बैनर तले हो रहा है। प्रदर्शन करने वाले लोग किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता नहीं हैं। न ही कोई धार्मिक-साम्प्रदायिक समूह हैं, बल्कि पाकिस्तान के कब्जे वाले आम कश्मीरी हैं। जिन्हें हम नागरिक समाज कहते हैं। इसमें ट्रेड यूनियन भी शामिल हैं।

सड़क पर उतरे प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी दो मांगे हैं,जिस पर कोई सहमति नहीं बन पाई है। पहली तो यह है कि कश्मीर के राजनेता, नौकरशाह और अन्य सरकरी पदों पर कायम लोगों की विलासितापूर्ण जिंदगी और उन्हें सरकार की तरफ से मिली तमाम सुविधाएं हैं। इस सुविधाओं में वरिष्ठ अधिकारियों, मंत्रियों और आदि को दो सरकारी वाहन, अंगरक्षक सहित निजी स्टाफ तथा सरकारी कार्य के लिए इस्तेमाल होने वाले दो वाहनों के लिए जितनी चाहें उतनी तेल आदि शामिल है।

एक तरफ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के ये नेता, नौकरशाह और उच्च पदस्थ सरकारी कर्मचारी सरकारी सुविधाओं और छूटों के बल पर राजशाही की जिंदगी जी रहे हैं, दूसरी तरफ आम अवाम अपनी बुनियादी जरूरतों और सुविधाओं के लिए जूझ रही है। प्रदर्शकारियों का सबसे अधिक गुस्सा इस गैर-बराबरी की स्थिति के प्रति है। जैसे नेपाल में लोगों के आक्रोश का एक बड़ा कारण नेताओं-नौकरशाहों की विलासितापूर्ण जिंदगी और आम अवाम की बदहाली रही है।

प्रदर्शनकारियों की दूसरी बड़ी मांग राजनीतिक है। प्रदर्शनकारी यह मांग कर रहे हैं कि कश्मीर की विधान सभा में जो 12 सीटें तथाकथित उन कश्मीरों लोगों के लिए आरक्षित हैं, जो कश्मीर में नहीं, बल्कि पाकिस्तान की किसी और हिस्से में रहते हैं। प्रदर्शनकारियों की इस मांग के समझने के लिए एक निगाह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की राजनीतिक व्यवस्था पर डालनी होगी।

पाकिस्तान कहता है कि कश्मीर के जिस हिस्से पर उसका कब्जा है, वह आजाद कश्मीर है। इसी चीज को साबित करने के लिए उसने अपने हिस्से वाले कश्मीर को अपना प्रांत नहीं घोषित किया है, क्योंकि उसे दुनिया को यह दिखाना है कि यह हिस्सा आजाद है। इसके चलते वहां पाकिस्तान के अन्य प्रांतों की तरह मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री होता है। पाकिस्तान यह कहता है कि यह आजाद कश्मीर इस बात के लिए स्वतंत्र है कि भारत के कब्जे वाले कश्मीर के साथ मिलकर वह एक आजाद देश बन सकता है या पाकिस्तान में शामिल हो सकता है।

पर सच्चाई पाकिस्तानी शासक वर्ग के कहने से उलट है। सच यह है कि स्वयं पाकिस्तान की संविधान इन कश्मीरियों को पाकिस्तान से अलग होने, आजाद होने या भारत में शामिल होने की इजाजत नहीं देता है। पाकिस्तान आजाद कश्मीर का सारा नाटक सिर्फ दुनिया को दिखाने पर और भारत के कश्मीरियों के वह साथ है, यह दिखाने के लिए करता है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीरियों की आजादी की बात ही छोड़ दीजिए। इस तथाकथित आजाद कश्मीर में राजनीतिक प्रतिनिधित्व की ऐसी व्यवस्था पाकिस्तानी शासक वर्ग ने की है कि उनकी स्थिति पाकिस्तान के किसी प्रांत से भी बदत्तर है। इस राजनीतिक व्यवस्था को बदलने की मांग कश्मीरी लोग कर रहे हैं।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की विधान सभा में कुल 53 सीटें हैं। इसमें 45 सीटों पर वहां के कश्मीरियों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है। इन 45 सीटों में 12 सीटें तथाकथित कश्मीरियों के लिए आरक्षित हैं, जो इस कश्मीर में नहीं रहते हैं। जो पाकिस्तान के किसी अन्य हिस्से में रहते हैं। पाकिस्तानी शासक वर्ग यह तर्क देता है कि यह सीटें उन कश्मीरियों के लिए आरक्षित हैं, जो भारत के कब्जे वाले कश्मीर से भागकर शरण लेने के लिए पाकिस्तान आए हैं। पाकिस्तानी शासक वर्ग कहता है कि इन्हें आरक्षण इस लिए दिया गया है, ताकि तथाकथित आजाद कश्मीर की विधान सभा सभी कश्मीरियों की प्रतिनिधि विधान सभा बन सके। उस कश्मीर की भी जो भारत के पास है।

जबकि व्यवहार में सच्चाई इसके बिलकुल उलट है। इन तथाकथित भारतीय कश्मीरियों को तथाकथित आजाद कश्मीर में प्रतिनिधित्व देने के नाम पाकिस्तानी शासक वर्ग ऐसे 12 लोगों को प्रतिनिधि बना देता है, जिनका वहां के कश्मीरियों से कोई लेना-देना नहीं। वे किसी तरह उनके प्रति जबावदेह नहीं होते हैं। यहां तक कि वे उस कश्मीर में रहते भी नहीं है।

इस सब का नतीजा यह होता है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले तथाकथित कश्मीर की 53 सदस्यों वाली विधान सभा में 12 लोग ऐसे विधायक हो जाते हैं, जो पाकिस्तानी शासक वर्ग के पिट्ठू होते हैं, मनचाहे लोग हैं। जैसा कि ऊपर जिक्र कर चुका हूं। 53 सदस्यों में 8 पहले की मनोनित होते हैं या किसी अन्य तरीके से सदस्य बनते हैं। इस तरह कुल 53 सदस्यों में 20 लोगो ऐसे होते हैं, जिनकी तथाकथित इस आजाद कश्मीर के वाशिंदों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती है।

प्रहसन यह है कि पाकिस्तानी शासक वर्ग कहता है कि उसके कब्जे वाले कश्मीर आजाद है, जबकि सच यह है कि इस तथाकथित आजाद कश्मीर को उतना भी राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं है, जितना पाकिस्तान के पंजाब, सिंध या अन्य प्रांतों को प्राप्त है। दूसरी तरफ जैसा ऊपर जिक्र कर चुका हूं कि इस तथाकथित आजाद कश्मीर का कोई वाशिंदा पाकिस्तान से अलग होने या आजाद होने की बात नहीं कर सकता है। पाकिस्तानी संविधान इस पर रोक लगा रखा है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के वाशिंदे अपनी बुनियादी सुविधाओं, वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधि चुनने के अधिकार और राजनेताओं-नौकरशाहों की मिली मनमानी लूट की छूट के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं।

डॉ सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं

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