सनातनी जूता और मनुस्मृति सोच

“सनातन का यह अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान” और सह भी कैसे सकता है भाई….जब सत्ता के निचले पायदान से ऊपरी पायदान तक मनुस्मृति सोच वाले विराजमान हों।

बताते चलें कि, विष्णु की मूर्ति पुनर्स्थापना से जुड़े एक मामले में चीफ जस्टिस बीआर गवई की उस टिप्पणी से नाराज़ होकर अधिवक्ता राकेश किशोर ने जूता फेंका। जिस मामले को सुनते हुए मुख्य न्यायाधीश गवई ने अपनी टिप्पणी (आदेश नही) में कहा जाइये और स्वयं भगवान से कुछ करने को कहिए।

यदि आप भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हैं तो प्रार्थना कीजिए और थोड़ा ध्यान भी कीजिए।” इस टिप्पणी को वकील ने “सनातन धर्म की अवहेलना” माना और “सनातन का अपमान नहीं सहेगा” कह कर कोर्ट में जूता फेंकने की कोशिश की। एक आम नागरिक इस तरह की हरकत करता तो बात समझ में आती या कोई साधु-संत व महात्मा करता तो भी। पर एक वकील वो भी युवा नहीं 71 वर्षीय बुज़ुर्ग।

ज़ूता फेंकने का इतिहास कितना पुराना है यह तो पता नहीं और यह भी कि सबसे पहले किसने किस पर ज़ूता फेंका था। हालांकि प्राचीन या मुगल काल में इस तरह की घटनाओं का दस्तावेजी करण नहीं हुआ पर जूता फेंकने का ज़िक्र रोमन सम्राटों के संदर्भ में आता है, जहाँ इसे ‘युद्ध का संकेत’ माना जाता था। राजनीतिक हस्तियों पर इसकी शुरुआत 2008 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश पर एक पत्रकार द्वारा जूता फेंकने से मानी जाती है।

भारत के राजनीतिक इतिहास में अरविंद केजरीवाल, मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम, लाल कृष्ण आडवाणी, अखिलेश यादव, राहुल गांधी, बी एस येदियुरप्पा, नीतीश कुमार, प्रकाश सिंह बादल, नर सिंह राव, नितिन गडकरी, उमर अब्दुल्ला, जीतन राम मांझी, स्वामी प्रसाद मौर्य आदि पर उनके या उनकी राजनीति के विरोधियों ने ज़ूता फेंका था। पर न्यायाधीश पर इस तरह की पहली घटना है। वह भी किसी वकील के द्वारा। इसके पहले भी एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट के बाहर सहारा प्रमुख सुब्रत राय के ऊपर स्याही फेंकी थी।

उसने इसलिए स्याही फेंकी कि वह सहारा का निवेशक था और उसका धन डूब गया था और ऐसा नहीं कि इस तरह की घटनाएं सुब्रत राय जैसे गैर राजनीतिक व्यक्ति से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म हो गई। इसके पहले और बाद में भी स्याही आदि योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण पर फेंकी गई थी केजरीवाल तो अनेक बार थप्पड़बाज़ों के निशाने पर आए। 

ताज़ा मामला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गवई का है। इस मामले में ज़ूता फेंकने वाले ने न तो माफ़ी मांगी और न ही किसी तरह का कोई ख़ेद व्यक्त किया। बल्कि थेथरई का परिचय देते हुए उसे सही ठहराया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ज़ूता फेंकने वाले राकेश किशोर ने कहा कि जज की टिप्पणी के बाद वह ठीक से सो भी नहीं पाया। उसने बरेली की घटना का भी उल्लेख किया और हल्द्वानी का भी। यानी दूसरे सम्प्रदाय के प्रति उसके मन में घनघोर घृणा थी। उसने जस्टिस गवई के बुल्डोजर संबंधित बयान पर भी टिप्पणी की। यानी एक वकील होते हुए भी वह बुल्डोजर संस्कृति का हिमायती था। ऐसी स्थिति में क्या वह बुल्डोजर से घर ढहाये जाने वाले व्यक्ति का मुक़दमा लड़ता। 

एबीपी न्यूज़ से हल्द्वानी की घटनाओं का विशेष रूप से चर्चा करते हुए एक समुदाय विशेष के प्रति अपनी नफ़रत को सार्वजनिक रूप से प्रकट करता है कि सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद से रेलवे ट्रैक के दोनों ओर की ज़मीन आज़ भी उस समुदाय विशेष के पास है। राकेश किशोर ने भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के हज़रत मुहम्मद साहब पर की गई टिप्पणी का भी हवाला देते हुए कहा कि, उसने कुछ भी ग़लत नहीं कहा। यह न्याय प्रक्रिया से जुड़े व्यक्ति की राय है तो बहुत ही ख़तरनाक है।

यही नहीं इस कथित वकील ने अपनी इस हरकत पर शर्मिंदगी भी नहीं जताई। एबीपी न्यूज़ के संवाददाता से कहा कि, मैं बहुत बड़ा अहिंसक हूं, गौतमबुद्ध को मानता हूं, उनकी शिक्षा-दीक्षा पर चलता हूं। तो बुद्ध ने कहा है मारने-पीटने की बात कहीं? और इसे एक एक्शन का रिएक्शन बताते हुए एक कुत्ते का उदाहरण दिया कि, कुत्ता भी रिएक्शन करेगा। मुझे पछतावा नहीं है क्योंकि मैंने कुछ किया नहीं, मुझसे भगवान ने करवाया, परमात्मा ने जो कराया मैंने किया। यानी परमात्मा ने कहा था कि, तुम सीजेआई पर ज़ूता फेंको। और एक न्यायमूर्ति गवई साहब हैं उन्होंने बड़ा दिल दिखाते हुए माफ़ कर दिया। यही नहीं उसका जूता भी लौटवा दिया और आधार कार्ड आदि भी। मुकदमा भी न चलाने का निर्देश अपनी रजिस्ट्री के माध्यम से दिया।

प्रसंगवश एक और सीजेआई थे चंद्रचूड़। राम मंदिर का फैसला उन्होंने भगवान से पूछकर (कुछ ऐसा ही) लिखा था। गर ऐसे व्यक्ति न्यायमूर्ति होंगे तो? 

जूता फेंकना/मारना कानूनी रूप से अधिक गंभीर अपराध है क्योंकि यह शारीरिक हमले की श्रेणी में आता है और इसमें बल का प्रयोग होता है। किसी की शारीरिक सुरक्षा पर हमला सबसे पहले देखा जाता है।

गाली देना भी एक गंभीर अपराध हो सकता है (विशेषकर अगर यह धमकी या मानहानि के दायरे में आए), लेकिन इसका मुख्य प्रभाव भावनात्मक या सामाजिक होता है, न कि शारीरिक।

अपराध की गंभीरता का निर्धारण मुख्य रूप से इस बात से होता है कि कृत्य शारीरिक बल का उपयोग करता है या नहीं। बात माफी की हो तो जस्टिस गवई ने खुद पर हमला करने वाले को माफ़ कर दिया और पीएम मोदी ने कथित तौर पर मां को गाली देने के संदर्भ में कहा कि मैं अगर माफ़ कर भी दूं तो बिहार की जनता माफ़ नहीं करेगी। गाली के मुद्दे को बिहार से जोड़ दिया। भाजपा ने बिहार बंद का आह्वान किया तो गया में पिंडदान करने की बात भी आई। 

बात मुद्दे कि, एक राजनीतिक व्यक्ति पर जूता फेंकना और न्यायमूर्ति पर जूता फेंकना दोनों में अंतर है। राजनीतिक व्यक्ति पर इस तरह की घटनाएं कई बार हुई हैं। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति से लेकर क्षेत्रीय दल के ज़ीनत राम मांझी तक पर इस तरह की घटना हुई। पर ये राजनीतिक नफा-नुकसान के लिए हुई। न्यायमूर्ति पर इस तरह का हमला संविधान पर हमला कहा जाएगा। अगर यहीं पर इस तरह की वारदात किसी अब्दुल या ख़ान ने की होती और ‘अल्लाह हू अकबर’ का नारा लगाया होता तो…। 

( लेखक अरुण श्रीवास्तव देहरादून में रहते हैं।)

Leave a Reply